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अचानक ऐसा क्या हो गया कि मोदी ने खुद को और देश को भी शर्मसार कराने वाली खामोशी ओढ़ ली

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अनिल जैन

भारत और ईरान के बीच बहुत घनिष्ठ व्यापारिक, रणनीतिक और सांस्कृतिक संबंध रहे हैं। भारत अपनी जरूरत का 15 फीसदी तेल ईरान से आयात करता था, वह भी बेहद वाजिब दाम पर लेकिन अमेरिका के दबाव में भारत को तेल का आयात बंद करना पड़ा। भारत के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण चाबहार पोर्ट का मामला भी ताजा ही है। भारत की आजादी के आठ दशक में यह पहला मौका है जब उसके एक बेहद भरोसेमंद और मददगार मित्र देश पर दुनिया के दो शक्तिशाली देशों ने अपने निहित स्वार्थों के चलते हमला कर दिया है। इसमें उसके सर्वोच्च नेता की मौत हो गई है और भारत सरकार मूकदर्शक बनी हुई है। उसने न तो हमले की निंदा की है और न ही मित्र देश के सर्वोच्च नेता की मौत पर शोक जताने का राजनयिक शिष्टाचार निभाया है। यह स्थिति तब है जब भारत में एक ऐसी पार्टी की सरकार है जो अपने को भारतीय संस्कृति और परंपरा की एकमात्र वाहक और भारत को विश्वगुरू मानती है। भारतीय संस्कृति और परंपरा हमें सिखाती है कि हम किसी के सुख में भले ही शरीक न हों लेकिन दुख या संकट की घड़ी में जरूर उसके साथ खड़े होना चाहिए।

ईरान पर अमेरिका और इज़राइल के निर्मम हमले और उसमें ईरान के वयोवृद्ध सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह खामेनेई के मारे जाने पर भारत सरकार और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की चुप्पी बेहद शर्मनाक है। इस चुप्पी से मोदी देश में इस्लामोफोबिया से ग्रस्त अपने समर्थक वर्ग की निगाहों में भले ही और ऊंचे चढ़ जाएं, लेकिन उनका यह रवैया दुनिया भर में भारत को शर्मसार कराने वाला है। यह भी कम शर्मनाक नहीं है कि ईरान पर हमले से दो दिन पहले ही मोदी ने इज़राइल की यात्रा की। इज़राइल ने मोदी को ऐसे समय में अपने यहां आमंत्रित किया जब वह अमेरिका के साथ मिलकर ईरान पर हमले की योजना बना चुका था।

कहने को तो इज़राइल ने मोदी को ‘स्पीकर ऑफ द कनेसेट मेडल’ स्वीकार करने के लिए आमंत्रित किया था, लेकिन हकीकत यह है कि इज़राइल के प्रधानमंत्री बिन्यामीन नेतन्याहू ने मोदी की यात्रा का इस्तेमाल हमले की तैयारी पर पर्दा डालने के लिए किया। उन्हें सर्वोच्च संसदीय सम्मान देना तो महज एक बहाना था। दिलचस्प बात यह भी है कि यह सम्मान मोदी से पहले किसी को भी नहीं दिया गया। इसे वैसा ही सम्मान कहा जा सकता है जैसे 2019 में मोदी को किसी ने ‘फिलिप कोटलर प्रेसिडेंशल अवॉर्ड’ दिया था, जिस पर मोदी की जगहंसाई हुई थी। वह अवॉर्ड भी न तो मोदी से पहले किसी को दिया गया था और न ही उनके बाद किसी को दिया गया।

PM being conferred with the highest honour of the Knesset “Speaker of the Knesset Medal” at the Knesset of Israel on February 25, 2026.

बहरहाल ईरान पर हमले की तैयारी के बीच मोदी की इस यात्रा से साबित हुआ कि भारतीय विदेश नीति पूरी तरह दिशाहीन हो चुकी है। मोदी और उनकी सरकार राष्ट्रीय हितों को लेकर पूरी तरह बेखबर और बेसुध है और भारतीय खुफ़िया तंत्र पूरी तरह नाकारा। पिछले 12 वर्षों के दौरान मोदी ने विदेशी राष्ट्राध्यक्षों से गले मिलने, उनसे लिपटने और उनके साथ बात-बेबात ठहाके लगाने को ही सफल कूटनीति माना है। इस इज़राइल यात्रा के दौरान भी उन्होंने यही किया। वे इज़राइल पहुंचने पर भी मेजबान नेतन्याहू से गले मिले और वहां से लौटते वक्त तो वे नेतन्याहू से लिपटकर इस तरह सिसक रहे थे जैसे बेटी ससुराल जाने से पहले अपने पिता से लिपट कर रोती है। रही बात खुफ़िया तंत्र की, तो उसका नाकारापन पुलवामा, पठानकोट, पहलगाम आदि में हुए भीषण आतंकवादी हमलों के अलावा भी कई मामलों में जाहिर हो चुका है।

लोकतांत्रिक देशों में सरकारें बदलती रहती हैं। जो नई सरकारें आती हैं, वे अपने हिसाब से बहुत कुछ बदलाव करती हैं लेकिन देश की विदेश नीति की निरंतरता कमोबेश बनी रहती हैं। हालांकि कोई भी देश तात्कालिक परिस्थितियों के हिसाब से जरूरी होने पर अपनी विदेश नीति में बदलाव भी करता है। वह अपने राष्ट्रीय हितों के हिसाब से नए अंतरराष्ट्रीय दोस्त बनाता है और किसी पुराने मित्र देश से धीरे-धीरे किनारा भी कर लेता है। मगर अपने हितों को गहरे तक प्रभावित करने वाले किसी अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम से बेखबर नहीं रह सकता, खास कर भारत जैसा देश; और वह भी ईरान जैसे भरोसेमंद दोस्त को लेकर। ईरान कोई सुदूरवर्ती छोटा-मोटा देश नहीं है। वह भौगोलिक रूप से तो नहीं, फिर भी एक तरह से भारत का पड़ोसी है। उससे भारत के रिश्ते भी कोई बीस-पच्चीस साल नहीं, बल्कि सदियों पुराने रहे हैं। खुद मोदी ने 2016 में अपनी ईरान यात्रा के दौरान अयातुल्लाह खामेनेई को करीब 1300 साल पुरानी यानी सातवीं सदी में कुफिक लिपि में लिखी हुई कुरआन शरीफ की दुर्लभ पांडुलिपि उपहार के तौर पर भेंट की थी और कहा था कि, ‘ईरान से भारत के रिश्ते उतने ही पुराने हैं, जितना पुराना दुनिया का इतिहास है।’ यही नहीं, दो साल पहले ईरान के राष्ट्रपति की मौत पर भारत सरकार ने राजकीय शोक भी घोषित किया था। भारत और ईरान के बीच बहुत घनिष्ठ व्यापारिक, रणनीतिक और सांस्कृतिक संबंध रहे हैं। भारत अपनी जरूरत का 15 फीसदी तेल ईरान से आयात करता था, वह भी बेहद वाजिब दाम पर लेकिन अमेरिका के दबाव में भारत को तेल का आयात बंद करना पड़ा। भारत के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण चाबहार पोर्ट का मामला भी ताजा ही है। वही चाबहार पोर्ट जिसके लिए ईरान से समझौता होने को प्रधानमंत्री मोदी ने 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान अपने एक भक्त टीवी चैनल के कीर्तनकारों के सामने बैठ कर डींग हांकते हुए अपना ‘कूटनीतिक कौशल’ बताया था। उन्होंने कहा था कि उनकी सरकार कोई भी फैसला इस आधार पर नहीं लेती कि कोई तीसरा देश क्या सोचेगा। भारत उस परियोजना पर लगभग 12 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च कर चुका था लेकिन दो महीने पहले ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के धमकी भरे दबाव में उस महत्वाकांक्षी परियोजना से भारत को अलग होना पड़ा।

ईरान ने कई महत्वपूर्ण और नाजुक मौकों पर दुनिया के शक्तिशाली देशों के विरोध को दरकिनार करते हुए भी भारत की मदद की है, जिसके किस्से इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं। ऐसे किस्सों में उल्लेखनीय किस्सा 1990 के दशक के शुरुआती सालों का है जब कश्मीर को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच हालात बेहद तनावपूर्ण थे। पाकिस्तान ने इस मसले पर मुस्लिम देशों के संगठन इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) में भारत के खिलाफ प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित कराने के लिए अभियान छेड़ रखा था। हुर्रियत कांफ्रेन्स के कुछ नेताओं ने नई दिल्ली में ईरानी राजदूत से भी मुलाकात कर समर्थन मांगा था। तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव ने महसूस कर लिया था कि यदि ओआईसी में कश्मीर पर भारत के खिलाफ प्रस्ताव पारित हो गया तो भारत के लिए कितनी मुश्किलें खड़ी हो जाएंगी। दरअसल पाकिस्तान और आईओसी के कई सदस्य देशों ने भारत के खिलाफ़ ऐसा चक्रव्यूह रचा था, जिसमें कश्मीर मुद्दे के बहाने पश्चिमी देश भारत पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाने के लिए तैयार हो गए थे। उस समय विदेश मंत्री दिनेश सिंह बीमार होने की वजह से अस्पताल में भर्ती थे लेकिन हालात की नज़ाकत को भांपते हुए उन्होंने बीमारी की हालत में ही व्हील चेयर पर विशेष विमान से तेहरान की आपातकालीन यात्रा की थी। उनकी वह यात्रा बेहद गोपनीय रखी गई थी और वे प्रधानमंत्री नरसिंह राव का एक व्यक्तिगत संदेश लेकर गए थे। तेहरान में उन्होंने अपने ईरानी समकक्ष और राष्ट्रपति अली अकबर हाशमी रफसंजानी से मुलाकात कर भारत का पक्ष विस्तार से रखा। उसके बाद ईरान ने अपने रुख पर पुनर्विचार कर पाकिस्तान के प्रस्ताव को समर्थन देने से अपने हाथ खींच लिए। ईरान के इस रुख से आईओसी में भारत के खिलाफ प्रस्ताव पारित नहीं हो सका था। पाकिस्तान को मुंह की खानी पड़ी थी और उसने तिलमिला कर ईरान को ‘धोखेबाज’ तक कह दिया था। अपने मिशन में कामयाब रहे दिनेश सिंह को किसी ने ‘जेम्स बांड’ या उनकी यात्रा को किसी ने ‘मास्टर स्ट्रोक’ या नरसिंह राव को किसी ने ‘विश्वगुरू’ नहीं कहा। ऐसी मूर्खतापूर्ण उपमाएं देने की जरुरत भी नहीं थी।

अब सवाल है कि आखिर ऐसे भरोसेमंद दोस्त देश को लेकर अचानक ऐसा क्या हो गया कि मोदी ने खुद को और देश को भी शर्मसार कराने वाली खामोशी ओढ़ ली है। देश ही नहीं, दुनिया भर को पता है कि जिनजिन देशों के नेता दुर्दांत यौन अपराधी जेफरी एपस्टीन से किसी न किसी रूप में जुड़े रहे हैं, वे ही सारे देश आज ईरान पर अमेरिका और इजराइल के हमले का समर्थन कर रहे हैं या खामोश बने हुए हैं। दुर्भाग्य से भारत को भी ऐसे ही देशों में शुमार किया जा रहा है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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