अखिलेश अखिल
बिहार की राजनीति एक बार फिर बड़े मोड़ पर खड़ी है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन दाखिल करने की खबरों ने सत्ता गलियारों में हलचल तेज कर दी है। नीतीश कुमार ने आज राज्यसभा के लिए अपना नामांकन भी भर दिया है। आज अंतिम तारीख जो थी। नामांकन के समय अमित शाह भी मौजूद थे। ऐसे में साफ़ हो गया है कि बिहार का यह सत्ता परिवर्तन बड़े कैनवास का हिस्सा है। इसमें कई तरह की राजनीति भी छुपी हुई है। अगर नीतीश कुमार राज्यसभा के लिए चुने जाते हैं, तो यह उनके लंबे मुख्यमंत्री कार्यकाल का अंत हो सकता है। वे बिहार के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले नेता रहे हैं। 2025 के विधानसभा चुनाव में एनडीए की जीत के बाद यह अटकलें तेज हुईं कि सत्ता हस्तांतरण की तैयारी पहले से चल रही थी।राज्यसभा की पांच सीटों पर 16 मार्च को चुनाव होना है। विधानसभा में मौजूदा संख्या बल के आधार पर ये सभी सीटें एनडीए के खाते में जाने की संभावना है
अगर नीतीश कुमार पद छोड़ते हैं, तो बिहार को पहली बार भाजपा का मुख्यमंत्री मिल सकता है। हिंदी पट्टी के अन्य बड़े राज्यों में भाजपा पहले से मुख्यमंत्री पद पर है, लेकिन बिहार अब तक अपवाद रहा है। ऐसे में यह बदलाव केवल नेतृत्व परिवर्तन नहीं, बल्कि एनडीए के भीतर शक्ति संतुलन के नए अध्याय की शुरुआत माना जा रहा है।

राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि नीतीश कुमार अपने बेटे निशांत कुमार को सक्रिय राजनीति में ला सकते हैं। कुछ अटकलें यह भी हैं कि जेडीयू भाजपा को मुख्यमंत्री पद दे और बदले में उपमुख्यमंत्री पद या राज्यसभा सीट के रूप में अपने हित सुरक्षित करे। हालांकि इस पर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है।
नीतीश के आवास के बाहर जेडीयू समर्थकों का जुटना और “हमें केवल नितीश ही चाहिए” जैसे नारे इस बात का संकेत हैं कि पार्टी के भीतर भी भावनात्मक दबाव है। वहीं कुछ नेता यह भी कह रहे हैं कि यदि उन्होंने फैसला कर लिया है तो पार्टी उसका सम्मान करेगी।
नीतीश कुमार 75 वर्ष के हो चुके हैं। हाल के महीनों में सार्वजनिक कार्यक्रमों के कुछ वीडियो वायरल हुए, जिन पर विपक्ष ने उनकी सेहत को लेकर सवाल उठाए। आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने इसे मुद्दा बनाने की कोशिश की।ऐसे में राज्यसभा जाना एक रणनीतिक कदम माना जा रहा है—जहां कार्यपालिका की रोजमर्रा की प्रशासनिक जिम्मेदारियों का दबाव कम होगा और वे राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका निभा सकेंगे।
दरअसल, 2022 में नीतीश कुमार ने खुद संकेत दिया था कि वे लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे, लेकिन राज्यसभा जाने से उन्हें परहेज नहीं है। उनके कई समकालीन नेता—लालू प्रसाद यादव, स्वर्गीय सुशील कुमार मोदी, रामविलास पासवान और शरद यादव—राज्यसभा का हिस्सा रह चुके हैं। दिलचस्प यह है कि नीतीश अब तक विधानसभा, विधान परिषद और लोकसभा के सदस्य रह चुके हैं, लेकिन राज्यसभा में कभी नहीं गए।अगर वे अब उच्च सदन में जाते हैं, तो वे उन चुनिंदा नेताओं में शामिल हो जाएंगे जिन्होंने संसद और राज्य की चारों प्रमुख विधायी संस्थाओं में सदस्यता हासिल की है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह अचानक लिया गया फैसला नहीं है। 2025 की जीत के बाद से ही भाजपा और जेडीयू के बीच भविष्य की रणनीति पर बातचीत चल रही थी। भाजपा राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत कर रही है और बिहार में भी संगठनात्मक रूप से सशक्त हुई है।
ऐसे में नीतीश कुमार का राज्यसभा जाना एनडीए के भीतर पीढ़ी परिवर्तन और शक्ति संतुलन की सुनियोजित प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है—जहां नितीश मार्गदर्शक की भूमिका में हों और भाजपा राज्य में नेतृत्व संभाले।फिलहाल आधिकारिक घोषणा का इंतजार है, लेकिन इतना तय है कि अगर यह कदम उठता है तो बिहार की राजनीति में एक नए दौर की शुरुआत होगी।






