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आग के गोले पर बैठा दक्षिण एशिया: भारत-पाक तनाव के बीच अनिश्चित भविष्य

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अखिलेश अखिल 

दक्षिण एशिया इस समय मानो आग के गोले पर बैठा है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष, ईरान-अमेरिका-इज़राइल के बीच बढ़ती तल्ख़ी और युद्ध , अफगानिस्तान में अस्थिरता, और अब भारत-पाकिस्तान के बीच फिर से गहराता अविश्वास—इन सबने पूरे क्षेत्र को असुरक्षा और आशंका के घेरे में ला खड़ा किया है।

बीते एक वर्ष में घटनाओं की रफ्तार ने यह संकेत दिया है कि क्षेत्रीय संतुलन बेहद नाज़ुक हो चुका है। अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले और उसके बाद भारत द्वारा चलाए गए “ऑपरेशन सिंदूर” ने दोनों परमाणु शक्ति संपन्न पड़ोसियों को सीधे सैन्य टकराव की दहलीज़ पर ला खड़ा किया था। पाकिस्तान की जवाबी ड्रोन कार्रवाई और नियंत्रण रेखा पर चार दिन तक चले तनाव ने यह स्पष्ट कर दिया कि हालात कितनी जल्दी बिगड़ सकते हैं।

      अब पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी का यह बयान कि “भारत एक और युद्ध की तैयारी कर रहा है”, नई बहस छेड़ रहा है। हालांकि उन्होंने वार्ता की अपील भी की, लेकिन सैन्य चेतावनी ने माहौल को और संवेदनशील बना दिया है। भारत की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया भले संयमित रही हो, पर सुरक्षा प्रतिष्ठान किसी भी संभावना को हल्के में लेने के मूड में नहीं है।

 संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए जरदारी ने कहा कि “भारत एक और युद्ध की तैयारी कर रहा है”, लेकिन साथ ही कश्मीर मुद्दे पर बातचीत की पेशकश भी की। उनके इस भाषण में एक तरफ सैन्य चेतावनी थी तो दूसरी ओर कूटनीतिक संवाद का आग्रह, जिसे भारतीय खुफिया सूत्र आंतरिक राजनीतिक दबावों के बीच की गई ‘राजनीतिक बयानबाज़ी’ मान रहे हैं।

         ज़रदारी ने अपने संबोधन में कहा, “मेरा संदेश भारत के लिए है कि वह युद्ध के मंच से हटकर सार्थक वार्ता की मेज पर आए, क्योंकि क्षेत्रीय सुरक्षा का यही एकमात्र रास्ता है।” हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पाकिस्तान किसी भी संभावित आक्रामक कदम के लिए तैयार है। “कोई गलतफहमी न पाले, हम तैयार हैं। पाकिस्तान के खिलाफ किसी भी नई आक्रामकता का कड़ा जवाब दिया जाएगा,” उन्होंने चेतावनी दी।

          उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब दोनों देशों के बीच संबंध पहले से ही बेहद तनावपूर्ण हैं। 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 26 भारतीय पर्यटकों की मौत हो गई थी। भारत ने इस हमले के लिए पाकिस्तान आधारित लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े संगठन ‘द रेसिस्टेंट फ्रंट’ को जिम्मेदार ठहराया था। इसके जवाब में भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के तहत पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकी ठिकानों पर कार्रवाई की थी।

            भारत की इस कार्रवाई के बाद पाकिस्तान ने ड्रोन हमलों के जरिए जवाबी कदम उठाए। नियंत्रण रेखा  और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर चार दिनों तक चले सैन्य टकराव ने हालात को युद्ध जैसे माहौल में बदल दिया था। भारत ने एहतियातन कई सीमावर्ती इलाकों में ब्लैकआउट लागू किया। हालांकि बाद में दोनों देशों ने तनाव कम करने के संकेत दिए, लेकिन अविश्वास की खाई बरकरार रही।

           अपने भाषण में ज़रदारी ने कश्मीर के लोगों को “पूर्ण कूटनीतिक और नैतिक समर्थन” देने की बात दोहराई। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से भी इस मुद्दे पर ध्यान देने की अपील की। लेकिन भारत का रुख स्पष्ट रहा है कि जम्मू-कश्मीर उसका आंतरिक मामला है और सीमा पार से प्रायोजित आतंकवाद ही क्षेत्रीय शांति में सबसे बड़ी बाधा है।

          ज़रदारी ने अफगानिस्तान को भी अपने संबोधन में शामिल किया। उन्होंने काबुल से कहा कि वह “किसी दूसरे देश की महत्वाकांक्षाओं का युद्धक्षेत्र” न बने। उनका संकेत भारत की ओर था, हालांकि भारत ने हमेशा अफगानिस्तान में किसी भी तरह की सैन्य या अस्थिरकारी भूमिका से इनकार किया है। भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने हालिया घटनाक्रम पर कहा था, “पाकिस्तान अपने आंतरिक संकटों के लिए पड़ोसियों को दोष देने की पुरानी आदत से बाज नहीं आ रहा है।”

          विशेषज्ञों का मानना है कि ज़रदारी का बयान पाकिस्तान की आंतरिक राजनीतिक और आर्थिक चुनौतियों की पृष्ठभूमि में आया है। महंगाई, सुरक्षा संकट और तालिबान से बढ़ते तनाव ने इस्लामाबाद की सरकार पर दबाव बढ़ाया है। ऐसे में भारत के खिलाफ सख्त रुख अपनाना घरेलू समर्थन जुटाने की रणनीति भी हो सकती है।

 कुल मिलाकर, ज़रदारी के बयान में दोहरा संदेश दिखता है—एक तरफ युद्ध की चेतावनी, दूसरी ओर वार्ता की अपील। लेकिन जब तक सीमा पार आतंकवाद और आपसी अविश्वास की समस्याएं दूर नहीं होतीं, तब तक दक्षिण एशिया में स्थायी शांति की राह आसान नहीं दिखती।

          इधर दक्षिण एशिया का संकट केवल भारत-पाक तक सीमित नहीं है।अफगानिस्तान में तालिबान शासन और पाकिस्तान के बीच बढ़ते टकराव ने सीमा क्षेत्रों को अस्थिर किया है।श्रीलंका अभी भी आर्थिक पुनर्निर्माण के दौर से गुजर रहा है।बांग्लादेश में राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ा है। और नेपाल और मालदीव में चीन-भारत प्रभाव की प्रतिस्पर्धा जारी है।इन सबके बीच भारत-पाक तनाव क्षेत्रीय अस्थिरता को कई गुना बढ़ा देता है, क्योंकि दोनों देशों के पास परमाणु हथियार हैं और लंबा संघर्ष इतिहास है।

          विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान की ओर से कड़े बयान आंतरिक राजनीतिक और आर्थिक दबावों से भी प्रेरित हो सकते हैं। आर्थिक संकट, बढ़ती महंगाई और आतंरिक सुरक्षा चुनौतियाँ सरकार को राष्ट्रवाद की ओर झुकने के लिए प्रेरित कर सकती हैं।

        वहीं भारत में भी सुरक्षा को लेकर सख्त रुख घरेलू राजनीति का अहम हिस्सा बन चुका है। सीमा पार आतंकवाद के मुद्दे पर सरकार की नीति स्पष्ट है—“आतंक और वार्ता साथ-साथ नहीं चल सकते।” ऐसे में संवाद की संभावनाएँ सीमित दिखती हैं, जब तक ठोस भरोसा बहाली के कदम न उठें।

           अमेरिका, चीन और रूसतीनों की दक्षिण एशिया में अलगअलग रणनीतिक दिलचस्पी है। चीन पाकिस्तान का करीबी साझेदार है, जबकि भारत अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ रणनीतिक संबंध मजबूत कर रहा है। यदि भारतपाक तनाव बढ़ता है, तो यह वैश्विक शक्तियों को भी अप्रत्यक्ष रूप से खींच सकता है।साथ ही, पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का असर ऊर्जा आपूर्ति और आर्थिक स्थिरता पर पड़ रहा है, जिसका सीधा प्रभाव दक्षिण एशियाई अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ सकता है।

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