back to top

ईरान पर हमला : कूटनीतिक तौर पर अलग पड़ता अमेरिका और भारत की चुनौती 

Must Read

अखिलेश अखिल 

ईरान पर अमेरिकी कार्रवाई के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में जो हलचल पैदा हुई है, उसने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या अमेरिका अपने पारंपरिक सहयोगियों के बीच पहले जैसी स्वीकार्यता और नेतृत्व की स्थिति बनाए रख पा रहा है? ताज़ा घटनाक्रम में पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों को लेकर न सिर्फ़ पश्चिम एशिया, बल्कि यूरोप और नाटो के भीतर भी मतभेद खुलकर सामने आते दिख रहे हैं। कई विश्लेषकों का मानना है कि ईरान के खिलाफ सख्त सैन्य कदम ने अमेरिका को कूटनीतिक रूप से अपेक्षाकृत अलग-थलग कर दिया है।

नाटो देशों की सतर्क दूरी

नाटो ऐतिहासिक रूप से अमेरिका के नेतृत्व में काम करता रहा है, लेकिन ईरान को लेकर हालिया घटनाओं के बाद यूरोपीय देशों का रुख पहले की तुलना में अधिक सतर्क दिख रहा है। जर्मनी और फ्रांस जैसे प्रमुख यूरोपीय देश लंबे समय से ईरान परमाणु समझौते को बचाए रखने के पक्षधर रहे हैं। उनका मानना है कि कूटनीति और बहुपक्षीय वार्ता ही स्थायी समाधान का रास्ता है।
इस पृष्ठभूमि में जब अमेरिका ने ईरान के खिलाफ सख्त रुख अपनाया, तो नाटो के कई देशों ने सीधे समर्थन देने से परहेज़ किया। उन्होंने बयानबाज़ी में संयम बरता और “तनाव कम करने” की अपील की। इससे यह संकेत गया कि यूरोप इस मुद्दे पर अमेरिका के साथ बिना शर्त खड़ा होने को तैयार नहीं है।

स्पेन और नॉर्वे का खुला विरोध

कुछ रिपोर्टों के अनुसार, स्पेन और नॉर्वे ने अमेरिकी कार्रवाई को लेकर खुलकर चिंता जताई है। स्पेन, जो नाटो का सदस्य है, ने मध्य पूर्व में सैन्य तनाव बढ़ने को लेकर आशंका व्यक्त की और क्षेत्रीय स्थिरता को प्राथमिकता देने की बात कही। वहीं नॉर्वे, जो शांति वार्ताओं में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए जाना जाता है, ने सैन्य कार्रवाई के बजाय कूटनीतिक समाधान पर जोर दिया।
इन देशों का तर्क है कि एकतरफा सैन्य कदम पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर सकते हैं और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर भी असर डाल सकते हैं। यूरोप पहले ही यूक्रेन युद्ध के कारण ऊर्जा संकट झेल चुका है, ऐसे में पश्चिम एशिया में नया मोर्चा खुलना उसके आर्थिक हितों के खिलाफ माना जा रहा है।

ईरान-इराक का असामान्य समीकरण

इस घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू ईरान और इराक के बीच बढ़ती निकटता है। इतिहास में 1980 के दशक का ईरान-इराक युद्ध दोनों देशों के रिश्तों की कड़वाहट की गवाही देता है। लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में दोनों देशों का अमेरिका के खिलाफ एक मंच पर आना भू-राजनीतिक बदलाव का संकेत है।
इराक की राजनीति में ईरान समर्थक समूहों का प्रभाव पहले से ही मजबूत रहा है। अमेरिकी कार्रवाई के बाद बगदाद में ऐसे स्वर तेज़ हुए हैं जो अमेरिकी सैन्य मौजूदगी पर सवाल उठा रहे हैं। यदि इराक खुलकर ईरान के साथ खड़ा होता है, तो यह अमेरिका के लिए रणनीतिक झटका हो सकता है, क्योंकि इराक लंबे समय से अमेरिकी सैन्य और कूटनीतिक रणनीति का अहम केंद्र रहा है।

अमेरिका की रणनीतिक चुनौती

ट्रंप प्रशासन की विदेश नीति का एक प्रमुख तत्व “अमेरिका फर्स्ट” रहा है। इस नीति के तहत कई बार पारंपरिक सहयोगियों की चिंताओं को दरकिनार करते हुए एकतरफा फैसले लिए गए। ईरान परमाणु समझौते से अमेरिका का बाहर निकलना भी इसी कड़ी का हिस्सा था।
हालिया कार्रवाई को लेकर आलोचकों का कहना है कि इससे अमेरिका की विश्वसनीयता पर असर पड़ सकता है। यदि सहयोगी देश खुद को फैसलों से अलग-थलग महसूस करते हैं, तो वे भविष्य में सामूहिक सुरक्षा ढांचे के भीतर कम सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं।

मध्य पूर्व में व्यापक असर

ईरान पर कार्रवाई का असर केवल अमेरिका-ईरान संबंधों तक सीमित नहीं है। यह पूरे मध्य पूर्व की शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है। सऊदी अरब, इज़राइल और खाड़ी देशों का रुख भी इस समीकरण में महत्वपूर्ण है। इज़राइल लंबे समय से ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं को लेकर चिंतित रहा है और अमेरिकी सख्ती का समर्थन करता रहा है।
दूसरी ओर, यदि क्षेत्रीय संघर्ष बढ़ता है, तो तेल की कीमतों में उछाल, समुद्री व्यापार मार्गों पर खतरा और शरणार्थी संकट जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। यूरोप इन संभावित परिणामों को लेकर पहले से सतर्क है, इसलिए वह खुलकर किसी सैन्य कार्रवाई का समर्थन करने से बच रहा है।

वैश्विक राजनीति में बदलता समीकरण

यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब वैश्विक राजनीति पहले ही बहुध्रुवीय (multipolar) होती जा रही है। चीन और रूस जैसे देश अमेरिका के हर कदम पर नजर रखे हुए हैं। यदि अमेरिका अपने पारंपरिक सहयोगियों को साथ नहीं रख पाता, तो इससे चीन और रूस को कूटनीतिक अवसर मिल सकते हैं। रूस पहले ही ईरान के साथ सैन्य और रणनीतिक सहयोग बढ़ा चुका है। चीन भी पश्चिम एशिया में अपनी आर्थिक और कूटनीतिक उपस्थिति मजबूत कर रहा है। ऐसे में अमेरिका के लिए संतुलन बनाए रखना आसान नहीं होगा।

घरेलू राजनीति का प्रभाव

ट्रंप की विदेश नीति को अमेरिकी घरेलू राजनीति के चश्मे से भी देखा जा रहा है। चुनावी माहौल में सख्त रुख अपनाना उनके समर्थक वर्ग को संदेश देने का एक तरीका माना जाता है। लेकिन यदि यह नीति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलगाव का कारण बनती है, तो इसका राजनीतिक असर भी हो सकता है।
अमेरिका के भीतर भी इस मुद्दे पर मतभेद हैं। कुछ नेता इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी कदम बताते हैं, जबकि अन्य इसे अनावश्यक उकसावा मानते हैं।
वर्तमान परिस्थिति में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अमेरिका और उसके सहयोगी इस तनाव को कूटनीतिक रास्ते से कम करने की कोशिश करेंगे, या फिर टकराव की राजनीति आगे बढ़ेगी। यदि नाटो के भीतर मतभेद गहराते हैं, तो यह संगठन की एकजुटता के लिए चुनौती बन सकता है।
ईरान और इराक का साथ आना एक प्रतीकात्मक और रणनीतिक संकेत है कि क्षेत्रीय राजनीति तेजी से बदल रही है। स्पेन और नॉर्वे जैसे देशों का खुला विरोध यह दर्शाता है कि पश्चिमी जगत में भी अमेरिका के हर कदम को स्वाभाविक समर्थन नहीं मिल रहा।

- Advertisement -spot_imgspot_img

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisement -spot_imgspot_img
Latest News

जनजातीय कार्य मंत्रालय मार्च 2026 में कई ऐतिहासिक राष्ट्रीय पहलों का आयोजन कर रहा है-केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री श्री जुएल ओराम

पीआईबी/ नई दिल्ली/छायाकार -आरबी यादव  केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री श्री जुएल ओराम ने जनजातीय विरासत के संरक्षण, रचनात्मक उत्कृष्टता को...
- Advertisement -spot_imgspot_img

More Articles Like This

- Advertisement -spot_imgspot_img