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क्या ‘ब्रांड मोदी’ का तिलिस्म टूट रहा है? सवालों के घेरे में प्रधानमंत्री, जवाबों की तलाश

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अखिलेश अखिल

एक दशक से अधिक समय तक भारतीय राजनीति में “ब्रांड मोदी” सिर्फ एक नेता का नाम नहीं, बल्कि एक राजनीतिक नैरेटिव रहा है—मजबूत नेतृत्व, निर्णायक फैसले, वैश्विक मंच पर विश्व गुरु की कथित छवि और घरेलू स्तर पर करिश्माई संप्रेषण वाला नेता। बीजेपी की तो ताकत रहे ही है मोदी भक्तो को भी खूब जचते रहे और और मोदी के इस काल में मोदी की भक्ति में डूबता रहा। बड़ी बात तो यह है कि मोदी का यह अमृत काल उन लोगों को भी ख़ास तौर से प्रभावित किया जो पहले बीजेपी और संघ से परे थे। वाम  और समाजवादी सोंच रखने वाले लोग भी मोदी के झांसे में आएं .यह झांसा भले ही कथित राष्ट्रवाद ,हिन्दू -मुसलमान और विश्व गुरु के कथित नैरेटिव के तहत से दिया गया हो लेकिन सच तो यही है कि पीएम मोदी ने बड़े स्तर पर लोगों को अपने आभा मंडल से प्रभावित किया और उसका चुनावी लाभ भी लेते रहे। मोदी का यह करिश्मा कमतर नहीं रहा। आज भी अंधभक्तों के बीच वे दक्षिण भारत के बड़े फिल्मकारों की तरह पूजनीय हैं। और इस खेल में भारतीय मीडिया की बड़ी भूमिका रही। बीजेपी और मोदी के लोग समझ गए थे कि मीडिया पर कब्ज़ा करके देश को वही सब दिखाया और बताया जा सकता है जो वे चाहते हैं। और ऐसा अभी तक चलता भी रहा। लेकिन 2026 की दहलीज पर यह सवाल अधिक मुखर हो रहा है: क्या यह तिलिस्म अब दरक रहा है? क्या प्रधानमंत्री कई मोर्चों पर सवालों के घेरे में हैं—और क्या जवाब उतने स्पष्ट नहीं दिख रहे?

1.⁠ ⁠विदेश नीति: दोस्ती की तस्वीरें बनाम रणनीतिक यथार्थ

मोदी युग की सबसे बड़ी उपलब्धियों में विदेश नीति को गिना गया—क्वाड, जी-20, खाड़ी देशों से निकटता, अमेरिका के साथ रक्षा समझौते। लेकिन हालिया घटनाक्रमों ने इस चमक को चुनौती दी है।

अमेरिका–पाकिस्तान समीकरण: वॉशिंगटन में पाकिस्तान की सक्रियता और अमेरिकी नेतृत्व के बयान—जिनमें भारत-पाक तनाव में मध्यस्थता के दावे शामिल हैं—नई दिल्ली की आधिकारिक “द्विपक्षीय समाधान” की लाइन से टकराते हैं। यदि तीसरे पक्ष की भूमिका के दावे बार-बार दोहराए जाते हैं, तो भारत की रणनीतिक स्वायत्तता पर प्रश्न उठते हैं।

FATF और IMF: कभी पाकिस्तान को वैश्विक मंच पर अलग-थलग करने की नीति को बड़ी सफलता बताया गया था। लेकिन पाकिस्तान का FATF ग्रे-लिस्ट से बाहर आना और IMF सहायता का बहाल होना यह संकेत देता है कि “डिप्लोमैटिक आइसोलेशन” स्थायी नहीं रहा।यहां सवाल उठता है—क्या विदेश नीति में “व्यक्तिगत समीकरण” की चमक, दीर्घकालिक रणनीतिक संतुलन का विकल्प बन सकती है?

2.⁠ ⁠राष्ट्रीय सुरक्षा: नैरेटिव और तथ्य

2016 (उरी) और 2019 (बालाकोट) के बाद सरकार ने “सर्जिकल स्ट्राइक” और “एयर स्ट्राइक” को निर्णायक कार्रवाई के रूप में प्रस्तुत किया। इससे “मजबूत नेता” की छवि और सुदृढ़ हुई। चुनावी राजनीति में बीजेपी को इसका खूब लाभ भी मिला। लगातार चुनावी जीत में अगर मोदी मशीनरी और नैरेटिव की कहानी ज्यादा लाभप्रद रही हो तो सर्जिकल स्ट्राइक की बी भूमिका भी कमतर नहीं रही है।

लेकिन हाल के वर्षों में सीमाई तनाव, चीन के साथ गतिरोध, और सैन्य हताहतों के आंकड़ों पर अस्पष्टता ने विपक्ष को सवाल उठाने का मौका दिया है। यदि बाहरी नेतृत्व यह दावा करे कि उसने संघर्ष रोका या सैन्य नुकसान अधिक हुआ, और सरकार खुलकर उसका खंडन न करे, तो यह राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करता है।ब्रांड मोदी की शक्ति हमेशा स्पष्ट और दृढ़ जवाबों में रही है। यदि जवाब धुंधले दिखें, तो नैरेटिव कमजोर होता है।

  इसके साथ ही हालिया पूर्व सेना अध्यक्ष नरवणे की किताब का विवाद मोदी के इकबाल को और भी कमजोर किया है। मोदी के लोग चाहे जो भी तर्क दे और नैरेटिव गढ़े लेकिन देश -दुनिया अब जान गई है कि दाल में कुछ काला ही नहीं पूरी दाल ही काली है। चीन में मामले में मोदी सरकार की चुप्पी कई सवाल खड़े करते हैं।

 विकास की रफ्तार बनाम रोज़गार का संकट

सरकार GDP वृद्धि, डिजिटल भुगतान क्रांति, इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार और स्टार्टअप इकोसिस्टम को अपनी उपलब्धि बताती है। भारत दुनिया की शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो चुका है।लेकिन दूसरी ओर बेरोज़गारी के आंकड़े चिंता पैदा करते हैं।कृषि आय और ग्रामीण मांग में सुस्ती के संकेत मिलते हैं। और अभी अमेरिका के साथ ट्रेड डील में जिस तरह की कहानी खेती और किसानी को लेकर आयी है उससे साफ़ हो गया है कि मोदी सरकार सिर्फ अमेरिका को खुश करने के लिए कुछ दाव लगाने को तैयार है। भारत के किसान और मजदुर वर्ग इससे काफी नाराज हैं। इसके साथ ही एपस्टीन फाइल ने मोदी सरकार को काफी कमजोर किया है। यह बात और है कि भारत के काईन बड़े नेताओं ,मंत्रियों और कॉर्पोरट घराने के नाम एपस्टीन फाइल में आने के बाद भी अगर मोदी केवल अपनी लाज बचाने के लिए कोई कार्रवाई नहीं कर रहे हैं तो जाहिर है मोदी का इकबाल अब पहले जैसे नहीं रहा।

       इसके साथ ही महंगाई और असमानता पर बहस जारी है।जब “5 ट्रिलियन इकोनॉमी” का लक्ष्य राजनीतिक नारा बनता है, तो आम नागरिक रोज़गार और आय में ठोस सुधार देखना चाहता है। यदि यह अंतर बना रहे, तो करिश्माई ब्रांड पर असर पड़ता है।

‘ऑप्टिक्स’ की राजनीति बनाम संस्थागत सवाल

विपक्ष बार-बार “ऑप्टिक्स” शब्द का प्रयोग करता है—भव्य आयोजन, अंतरराष्ट्रीय समिट, बड़े-बड़े स्लोगन। हाल में AI समिट को भारत की टेक-लीडरशिप के रूप में पेश किया गया।लेकिन आलोचक पूछते हैं:

क्या टेक-डिप्लोमेसी जमीनी रोजगार सृजन से जुड़ रही है?क्या संस्थानों की स्वायत्तता—चुनाव आयोग, जांच एजेंसियां, विश्वविद्यालय—संतुलित और निष्पक्ष दिख रही हैं?जब सुप्रीम कोर्ट को मतदाता सूची या अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं की निगरानी का आदेश देना पड़े, तो यह संकेत देता है कि संस्थागत भरोसे में दरारें हैं।ब्रांड मोदी की मजबूती “सिस्टम से ऊपर एक निर्णायक नेतृत्व” की छवि में रही है। लेकिन लोकतंत्र में संस्थानों की विश्वसनीयता भी उतनी ही अहम है।

कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल अब सीधे प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत छवि पर सवाल उठा रहे हैं। 

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