अखिलेश अखिल/ नई दिल्ली
भारतीय लोकतंत्र में संसद केवल कानून बनाने की जगह नहीं, बल्कि सरकार से जवाबदेही तय करने का सबसे बड़ा मंच है। लेकिन पिछले कुछ समय से एक पैटर्न साफ दिखाई देता है—जब भी ऐसे मुद्दे उठते हैं जो सत्ता के केंद्र को असहज करते हैं, सरकार सीधे जवाब देने के बजाय बहस को टालने, मोड़ने या शोर में दबाने की रणनीति अपनाती है। एपस्टीन फाइल, पूर्व सेना प्रमुख एम.एम. नरवणे की किताब से जुड़े राहुल गांधी के सवाल और भारत-अमेरिका ट्रेड डील—तीनों मामले इसी प्रवृत्ति की ओर इशारा करते हैं।

एपस्टीन फाइल: नामों की गूंज और चुप्पी
अमेरिका में जेफ्री एपस्टीन से जुड़े दस्तावेज़ों के सार्वजनिक होने के बाद दुनिया भर में हलचल मची। इन फाइलों में कई ताकतवर लोगों के नाम सामने आने के दावे किए गए। भारत में विपक्ष ने सवाल उठाया कि क्या इनमें किसी भारतीय उद्योगपति या सत्ता से जुड़े व्यक्ति का नाम है? और यदि है, तो सरकार इस पर क्या कार्रवाई करेगी? लेकिन सरकार का जवाब? लगभग शून्य है । बड़ी बात तो यह है कि सरकार सवाल उठाने वाले को ही घेर रही है और इतिहास का जिक्र कर गाँधी परिवार पर ही हमला कर रही है। इस खेल का शानदार पहलू यह है कि अब देश का बच्चा -बच्चा भी समझ रहा है कि आखिर संसद में राहुल के सवाल का जवाब सरकार क्यों नहीं दे रही है ? अगर कोई स्कूली बच्चा ही अपने टीचर से कोई सवाल करे तो भला टीचर बच कैसे सकता है ? और यहाँ तो कूटनीति ,व्यापार नीति से लेकर रक्षा नीति का मसला है। और लगे हाथ दुनिया के सबसे बड़े कामुक व्यक्ति के साथ भारतीय नेताओं ,मंत्रियों के बातचीत से जुड़े सवाल है। लेकिन सरकार को ये सारे सवाल ठीक नहीं लग रहे। सरकार का तर्क है कि वह जो कह रही है वही अंतिम सच है और मोदी की सरकार इसी सच के साथ आगे बढ़ रही है। फिर ये सारे सवाल क्यों उठ रहे हैं इसका जवाब आखिर कौन देगा ?
इस मसले पर न तो संसद में कोई स्पष्ट बयान आया, न ही विदेश मंत्रालय या गृह मंत्रालय ने कोई ठोस स्थिति रखी। उल्टा, सवाल पूछने वालों पर “अफवाह फैलाने” का आरोप लगाया गया। लोकतंत्र में सरकार का दायित्व होता है कि वह आशंकाओं को तथ्यों से दूर करे, लेकिन यहां तथ्यों के बजाय चुप्पी दिखाई दी।
यह चुप्पी इसलिए भी खतरनाक है क्योंकि एपस्टीन मामला केवल व्यक्तिगत आचरण का नहीं, बल्कि मानव तस्करी, यौन शोषण और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से जुड़ा है। अगर भारत से जुड़ा कोई कोण है, तो जनता को सच जानने का अधिकार है।

नरवणे की किताब और राहुल गांधी के सवाल
पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की पुस्तक में सरकार और सेना के रिश्तों, रणनीतिक फैसलों और राजनीतिक हस्तक्षेप को लेकर कथित रूप से कई संवेदनशील बातें कही गई हैं। राहुल गांधी ने संसद में इन्हीं अंशों का हवाला देकर सरकार से पूछा कि क्या सेना को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया गया?सरकार ने इस सवाल का जवाब देने के बजाय, पुस्तक के कथित “लीक” होने को मुद्दा बना दिया। एफआईआर दर्ज हुई, बहस भटक गई, लेकिन मूल सवाल—क्या किताब में लिखी बातें सही हैं या नहीं—अनुत्तरित रह गया।यह रणनीति नई नहीं है: संदेशवाहक पर हमला करो, संदेश पर नहीं। अगर किताब में गलत है, तो सरकार तथ्यों के साथ खंडन करे। अगर सही है, तो जवाबदेही तय करे। दोनों में से कुछ भी न करना, संदेह को और गहरा करता है।
भारत-अमेरिका ट्रेड डील
भारत-अमेरिका अंतरिम ट्रेड डील को लेकर विपक्ष और किसान संगठनों ने आशंका जताई है कि इससे कृषि, डेयरी और छोटे उत्पादकों को नुकसान होगा। राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं ने संसद में पूछा कि क्या सरकार ने किसानों से परामर्श किया? क्या शून्य शुल्क पर अमेरिकी कृषि उत्पाद भारत में आएंगे?
सरकार का जवाब फिर वही—“किसानों के हित सुरक्षित हैं।” लेकिन कैसे सुरक्षित हैं? किन शर्तों के साथ? कौन से दस्तावेज़ हैं? इन सवालों पर स्पष्टता नहीं। जब सरकार समझौते की शर्तें सार्वजनिक नहीं करती और संसद में विस्तृत चर्चा से बचती है, तो स्वाभाविक है कि अविश्वास पैदा होगा।
इन तीनों मुद्दों में एक समानता है:संवेदनशील सवाल विपक्ष द्वारा उठाए गए। सरकार का सीधा जवाब नहीं
और मुद्दा भटकाने की कोशिश की गई। यह केवल राजनीतिक रणनीति नहीं, बल्कि संस्थागत कमजोरी का संकेत है। मजबूत सरकार सवालों से नहीं डरती, बल्कि उनका सामना करती है।
लोकतंत्र की कीमत
जब संसद में सवालों का जवाब नहीं मिलता, तो संदेश जाता है कि सत्ता जवाबदेह नहीं है। इससे लोकतंत्र कमजोर होता है और जनता का भरोसा टूटता है।एपस्टीन फाइल हो या नरवणे की किताब या ट्रेड डील—ये सभी मुद्दे अलग-अलग दिखते हैं, लेकिन मूल प्रश्न एक ही है:क्या सरकार जनता को सच बताने के लिए तैयार है? मोदी सरकार की चुप्पी या टालमटोल यह संकेत देती है कि या तो वह असहज है, या फिर उसे लगता है कि बहुमत के बल पर जवाबदेही की जरूरत नहीं।लेकिन इतिहास गवाह है—जो सरकारें सवालों से भागती हैं, वे अंततः जनता के सवालों से घिर जाती हैं।लोकतंत्र में सबसे बड़ा खतरा विपक्ष नहीं, बल्कि जवाब न देने वाली सत्ता होती है।
अब असली सवाल यही है कि मोदी सरकार जवाब देने से “क्यों बच रही है?” यह सवाल किसी एक घटना से नहीं, बल्कि बीते कुछ वर्षों में उभरे एक पूरे राजनीतिक व्यवहार-पैटर्न से पैदा हुआ है। अगर इसे ठंडे दिमाग से देखा जाए, तो इसके पीछे कई स्तरों पर काम कर रही रणनीति दिखती है।
बड़ी बात यही है कि सरकार द्वारा यह जवाबदेही से बचने की संगठित राजनीति है। आज की सत्ता-शैली में संसद को बहस का मंच कम और औपचारिकता ज्यादा माना जा रहा है।संवेदनशील मुद्दों पर सरकार का तरीका अक्सर यह रहता है:सवाल को “अफवाह” बताओ ,सवाल उठाने वाले की नीयत पर हमला करो,
मुद्दे को देश भक्ति बनाम देश द्रोह में बदल दो और इससे असली प्रश्न पीछे छूट जाता है






