अखिलेश अखिल (वरिष्ठ पत्रकार )
लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव के बीच अब भारतीय राजनीति का टकराव एक और संवैधानिक संस्था तक पहुंचता दिखाई दे रहा है। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और इंडिया गठबंधन के अन्य दल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अविश्वास या महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहे हैं। यह कदम मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन को लेकर चल रहे विवाद के बीच सामने आया है। विपक्ष का आरोप है कि इस प्रक्रिया का इस्तेमाल राजनीतिक लाभ के लिए किया जा रहा है, जबकि सरकार और भाजपा इसे चुनावी प्रक्रिया को साफ करने की नियमित कवायद बता रही हैं।
भारतीय लोकतंत्र में चुनाव आयोग को सबसे विश्वसनीय और स्वतंत्र संस्थाओं में से एक माना जाता रहा है। संविधान ने इसे चुनावों की निष्पक्षता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी दी है। इसलिए जब चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर राजनीतिक विवाद खड़ा होता है, तो उसका असर केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े होते हैं।
विपक्ष का मुख्य आरोप यह है कि मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन की प्रक्रिया कई राज्यों में इस तरह लागू की जा रही है कि इससे बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जा सकते हैं। विपक्षी नेताओं का दावा है कि बिहार में शुरू हुई यह प्रक्रिया अब कई अन्य क्षेत्रों तक फैल चुकी है और इसका इस्तेमाल उन इलाकों में ज्यादा किया जा रहा है जहां भाजपा के खिलाफ मजबूत वोट बैंक मौजूद है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी पहले ही आरोप लगा चुके हैं कि चुनाव आयोग “मतदाता चोरों की रक्षा कर रहा है और लोकतंत्र को नुकसान पहुंचा रहा है।”
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी इस मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और सार्वजनिक तौर पर कहा कि अगर मतदाता सूची से नाम हटाकर चुनावी फायदा लेने की कोशिश की गई तो इसका विरोध किया जाएगा। ममता बनर्जी का कहना है कि लोकतंत्र का मूल सिद्धांत यह है कि हर नागरिक को मतदान का अधिकार मिले, और किसी भी प्रशासनिक प्रक्रिया के जरिए इस अधिकार को सीमित नहीं किया जाना चाहिए।

हालांकि चुनाव आयोग और केंद्र सरकार इन आरोपों को खारिज कर रहे हैं। आयोग का कहना है कि मतदाता सूची का समय-समय पर पुनरीक्षण एक नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य फर्जी या डुप्लीकेट नामों को हटाना और सूची को अधिक सटीक बनाना है। भाजपा नेताओं का कहना है कि विपक्ष चुनाव आयोग को बदनाम करने की कोशिश कर रहा है ताकि चुनावी हार का ठीकरा पहले से ही किसी संस्था पर फोड़ा जा सके। भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि संवैधानिक संस्थाओं की आलोचना करते समय राजनीतिक दलों को अपनी सीमाओं का ध्यान रखना चाहिए।
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाना बेहद कठिन प्रक्रिया है। 2023 के कानून के अनुसार सीईसी को उसी प्रक्रिया से हटाया जा सकता है, जिस तरह सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाया जाता है। इसके लिए संसद के दोनों सदनों में महाभियोग प्रस्ताव पारित होना जरूरी है, जिसमें कुल सदस्यता का बहुमत और उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई समर्थन चाहिए। मौजूदा संसद में एनडीए के पास पर्याप्त संख्या बल होने के कारण यह प्रस्ताव पारित होना लगभग असंभव माना जा रहा है।
फिर भी इस प्रस्ताव की राजनीतिक अहमियत कम नहीं है। विपक्ष के लिए यह कदम चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर सार्वजनिक बहस खड़ी करने का एक तरीका है। वहीं सत्ता पक्ष इसे विपक्ष की राजनीतिक रणनीति बता रहा है, जो संवैधानिक संस्थाओं को विवाद में घसीटने की कोशिश कर रही है।
यह विवाद एक बड़े सवाल को जन्म देता है—क्या भारत में संवैधानिक संस्थाएं भी धीरे-धीरे राजनीतिक संघर्ष का मैदान बनती जा रही हैं? पिछले कुछ वर्षों में संसद, न्यायपालिका और चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं को लेकर राजनीतिक बयानबाजी बढ़ी है। इससे एक ओर पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग मजबूत होती है, लेकिन दूसरी ओर संस्थाओं की निष्पक्षता पर सार्वजनिक भरोसा भी प्रभावित हो सकता है।
अंततः यह मामला केवल एक अधिकारी या एक राजनीतिक विवाद का नहीं है। यह उस संतुलन का सवाल है जिस पर लोकतंत्र टिकता है—राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और संस्थागत विश्वास के बीच संतुलन। अगर यह संतुलन कमजोर पड़ता है, तो लोकतंत्र की प्रक्रिया पर भी दूरगामी प्रभाव पड़ सकता है






