अखिलेश
अखिल मध्य पूर्व में जारी तनाव का असर अब भारत के स्कूलों तक साफ दिखाई देने लगा है। ईरान युद्ध से पैदा हुए ऊर्जा संकट ने न केवल एलपीजी की आपूर्ति को प्रभावित किया है, बल्कि देश की सबसे बड़ी पोषण योजना—मिड-डे मील—को भी गंभीर चुनौती के सामने खड़ा कर दिया है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन ने भी चेतावनी दी है कि अगर यह संघर्ष लंबा खिंचता है, तो वैश्विक खाद्य कीमतों में और तेजी आ सकती है। भारत में करीब 11.8 से 12 करोड़ बच्चे मिड-डे मील योजना पर निर्भर हैं। यह योजना सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि गरीब और वंचित तबकों के बच्चों के लिए स्कूल आने की सबसे बड़ी वजह भी है। लेकिन अब यही व्यवस्था कई राज्यों में लड़खड़ाती नजर आ रही है।
उत्तर प्रदेश के अयोध्या जिले के पूरा ब्लॉक के मित्रसेन पुर गांव का प्राथमिक स्कूल इस संकट की एक मार्मिक तस्वीर पेश करता है। यहां करीब 60 बच्चों के लिए मिड-डे मील ही पोषण का मुख्य स्रोत था। लेकिन एलपीजी सिलेंडर की कमी के चलते पिछले एक सप्ताह से स्कूल में खाना नहीं बन पाया। बच्चों को कभी भीगे हुए चने, कभी बिस्कुट देकर काम चलाया जा रहा है, और कई बार उन्हें घर वापस भेज दिया जाता है। नतीजतन, स्कूल में उपस्थिति भी घटने लगी है।
यह समस्या केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है। पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्यों के कई ग्रामीण स्कूल भी इसी तरह की मुश्किलों से जूझ रहे हैं। एलपीजी की आपूर्ति बाधित होने के कारण स्कूलों को पुराने तरीकों—लकड़ी के चूल्हों—की ओर लौटना पड़ रहा है।
पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के कृष्ण चंद्रपुर हाई स्कूल में करीब 1,500 छात्रों के लिए 11 मार्च को मिड-डे मील लकड़ी के चूल्हों पर पकाया गया। स्कूल प्रशासन ने पहले से ही एलपीजी संकट की आशंका को देखते हुए जलावन की व्यवस्था कर ली थी। लेकिन यह समाधान अस्थायी है और इससे लागत, समय और श्रम—तीनों बढ़ते हैं।
ऊर्जा संकट के साथ-साथ खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों ने भी इस योजना की कमर तोड़ दी है। दाल, चावल, तेल और सब्जियों के दाम बढ़ने से स्कूलों के बजट पर अतिरिक्त दबाव पड़ा है। कई जगहों पर पोषण स्तर बनाए रखना मुश्किल होता जा रहा है।
इस बीच, एफएओ की ताजा रिपोर्ट ने वैश्विक स्तर पर चिंता बढ़ा दी है। मार्च में वैश्विक खाद्य मूल्य सूचकांक 2.4 प्रतिशत बढ़कर पिछले साल सितंबर के बाद के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। हालांकि यह अभी भी 2022 के यूक्रेन युद्ध के समय के शिखर से करीब 20 प्रतिशत नीचे है, लेकिन बढ़ती ऊर्जा कीमतें भविष्य के लिए खतरे का संकेत दे रही हैं।
एफएओ के मुख्य अर्थशास्त्री मैक्सिमो टोरेरो के मुताबिक, फिलहाल अनाज की पर्याप्त वैश्विक आपूर्ति ने कीमतों को नियंत्रित रखा है, लेकिन अगर संघर्ष 40 दिनों से ज्यादा चलता है, तो स्थिति बदल सकती है। बढ़ती लागत के कारण किसान उर्वरकों का कम इस्तेमाल कर सकते हैं, कम बुवाई कर सकते हैं या कम लागत वाली फसलों की ओर रुख कर सकते हैं। इसका असर आने वाले महीनों में उत्पादन और कीमतों—दोनों पर पड़ेगा।
वैश्विक बाजार में भी इसके संकेत दिखने लगे हैं। वनस्पति तेल की कीमतों में 5.1 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जबकि चीनी की कीमतें 7.2 प्रतिशत बढ़कर अक्टूबर 2025 के बाद के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई हैं। वहीं चावल की कीमतों में 3 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है, जो कुछ हद तक राहत देती है।
स्पष्ट है कि यह संकट केवल एक आपूर्ति बाधा नहीं, बल्कि एक बहु-स्तरीय चुनौती है—जिसमें ऊर्जा, कृषि और पोषण—तीनों जुड़े हुए हैं। भारत जैसे देश में, जहां करोड़ों बच्चे स्कूल के भोजन पर निर्भर हैं, इसका असर सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह सीधे भविष्य की पीढ़ी के स्वास्थ्य और शिक्षा को प्रभावित करता है।
अगर जल्द समाधान नहीं निकला, तो यह संकट केवल रसोई तक सीमित नहीं रहेगा—यह स्कूलों की उपस्थिति, बच्चों के पोषण और सामाजिक असमानता को और गहरा कर सकता है।






