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डॉ लक्ष्मण यादव की पुस्तक “जाति जनगणना ” के चौथे संस्करण का लोकार्पण एवं परिचर्चा 22 मार्च को दिल्ली के त्रिवेणी कला संगम ऑडिटोरियम, मंडी हाउस में

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चौथा अक्षर संवाददाता/ नई दिल्ली 

डॉ लक्ष्मण यादव के द्वारा लिखित जाति जनगणना के चौथे संस्करण का लोकार्पण एवं परिचर्चा 22 मार्च को दिल्ली के त्रिवेणी कला संगम ऑडिटोरियम, मंडी हाउस में अनबाउंड स्क्रिप्ट द्वारा आयोजित किया गया है . शिक्षा केवल डिग्री हासिल करने का माध्यम नहीं होती, वह समाज की संरचना, अवसरों के वितरण और बराबरी की संभावनाओं से भी गहराई से जुड़ी होती है। ऐसे समय में, जब शैक्षणिक संस्थानों में सामाजिक असमानता अनेक रूपों में अब भी मौजूद है, जाति जनगणना जैसी किताब हमें यह समझने का अवसर देती है कि बिना ठोस सामाजिक आँकड़ों के न प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सकता है, न न्यायपूर्ण नीतियाँ बनाई जा सकती हैं। यह पुस्तक पाठकों को बताती है कि सामाजिक न्याय का प्रश्न केवल नारे का नहीं, बल्कि संरचनात्मक बदलाव का प्रश्न है।

बहुत से साथी पूछ रहे हैं कि क्या वे इस कार्यक्रम में आ सकते हैं, और क्या इसके लिए किसी पास या एंट्री फीस की ज़रूरत है। मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि यह कार्यक्रम सभी के लिए खुला है। प्रवेश पूर्णतः निःशुल्क है। किसी प्रकार के पास या एंट्री फीस की आवश्यकता नहीं है।
मेरी पुस्तक #जाति_जनगणना के चौथे संस्करण का लोकार्पण एवं पुस्तक-परिचर्चा
22 मार्च 2026, रविवार | सुबह 11 बजे
त्रिवेणी कला संगम, मंडी हाउस, नई दिल्ली
यह केवल एक पुस्तक-लोकार्पण नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, बराबरी, प्रतिनिधित्व और लोकतांत्रिक भागीदारी के सवालों पर एक जरूरी सार्वजनिक संवाद है।
इस महत्वपूर्ण परिचर्चा में हमारे साथ रहेंगे:
प्रो. कांचा इल्लैया, प्रो. सुखदेव थोराट, जनबुद्धिजीवी योगेन्द्र यादव, डॉ. विजेन्द्र चौहान, पत्रकार व लेखिका अरफ़ा ख़ानम शेरवानी और वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष और प्रो. जितेंद्र मीणा।
आप सभी सादर आमंत्रित हैं।

प्रख्यात शिक्षक और सामाजिक प्रश्नों पर मुखर हस्तक्षेप करने वाले डॉ. विजेंद्र चौहान लंबे समय से शिक्षा, अवसर और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर अपनी स्पष्ट उपस्थिति दर्ज कराते रहे हैं। सार्वजनिक मंचों और चर्चाओं में वे लगातार इस बात की ओर ध्यान दिलाते हैं कि बराबरी तब तक संभव नहीं, जब तक वंचित समाजों की हिस्सेदारी को संस्थानों में गंभीरता से न लिया जाए। शिक्षा और प्रतिनिधित्व के प्रश्नों पर उनकी संवेदनशील समझ उन्हें इस विषय पर एक महत्त्वपूर्ण और प्रासंगिक वक्ता बनाती है।

इसी क्रम में, मेरी किताब #जाति_जनगणना के चौथे संस्करण का लोकार्पण एवं परिचर्चा 22 मार्च को दिल्ली के त्रिवेणी कला संगम ऑडिटोरियम, मंडी हाउस में Unbound Script द्वारा आयोजित है—आपकी उपस्थिति सादर अपेक्षित है।

मेरी किताब पर डॉ. विजेंद्र चौहान को अवश्य सुनिए और समझिए कि जाति जनगणना केवल आँकड़ों का प्रश्न नहीं, बल्कि शिक्षा, प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय को नए आधार पर पुनर्गठित करने की एक ऐतिहासिक आवश्यकता है।

आज जब भारतीय समाज गहरी असमानताओं, सामाजिक विभाजनों और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर बढ़ते दबाव के दौर से गुजर रहा है, तब इन प्रश्नों को समझना और उन पर गंभीर संवाद करना बेहद आवश्यक हो गया है। मेरी किताब #जाति_जनगणना केवल आंकड़ों की बहस नहीं है, बल्कि यह समाज की संरचना, अवसरों के बंटवारे और न्याय के प्रश्नों को केंद्र में लाती है। यह पुस्तक पाठकों को इस बुनियादी सच से रूबरू कराती है कि ठोस सामाजिक आंकड़ों के बिना न बराबरी संभव है, न ही सच्चा लोकतंत्र।

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