
ज्योति मल्होत्रा
गत सप्ताह एक फिल्म और एक किताब देशभर में चर्चा के केंद्र में रही, ‘घूसखोर पंडत’ नामक फिल्म का शीर्षक बदलने और इससे जुड़ी तमाम प्रचार सामग्री हटाने पर नेटफ्लिक्स ने सहमति जताई है, इससे पहले कुछ नाराज़ लोगों ने ‘जातिवादी’ अपमान का विरोध किया, लखनऊ के हज़रतगंज पुलिस स्टेशन में प्राथमिकी दर्ज करवाई गई, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने सूचना और प्रसारण मंत्रालय से शिकायत की— प्रकरण के आखिर में बीजेपी नेता गौरव भाटिया ने जीत की घोषणा करते हुए कहा, ‘सनातन धर्म का अपमान बर्दाश्त नहीं किया जाएगा’। भाटिया ने कहा, ‘हम उनके खिलाफ़ सख्त से सख्त कार्रवाई करने को प्रतिबद्ध हैं जो व्यावसायिक लाभ के लिए किसी भी जाति या समुदाय का अपमान करते हैं’,और आगे कहा : ‘सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास हमारा मार्गदर्शक सिद्धांत है’। यह साफ़ नहीं कि बीजेपी नेता को क्या यह पता है कि ऐसा करते वक्त वे हास्य में निहित पहलू दबाने के अलावा व्यंग्य की मौत का जश्न भी मना रहे हैं। निश्चित ही, हास्यास्पद शीर्षकों का चलन हटा देना चाहिए।
या शायद अब इससे ज़्यादा फ़र्क नहीं पड़ता, खासकर तब जब आधा हफ्ता लोकसभा में बार-बार के स्थगन में निकल गया हो। कांग्रेस नेता राहुल गांधी पूर्व सेनाध्यक्ष, जनरल मनोज मुकुंद नरवणे द्वारा लिखी गई एक किताब को लेकर लगातार सवाल उठाने पर बज़िद रहे। सत्ताधारी बीजेपी भी उतनी ही दृढ़ता से अड़ी रही, किसी भी चर्चा की अनुमति देने से इनकार करते हुए यह तर्क दिया कि किताब प्रकाशित नहीं हुई है और लिहाजा संसद में इस पर बहस नहीं की जा सकती।
जो चीज़ मौजूद नहीं, उस पर चर्चा संभव नहीं, ठीक? सिवाय इसके कि राहुल सदन के अंदर और बाहर प्रकाशन-पूर्व कॉपी लहराते रहे। हालांकि, इसकी पीडीएफ कॉपी पूरी दुनिया के पढ़ने के लिए उपलब्ध है। लेकिन सरकार भी सही है। किताब बाज़ार में उपलब्ध नहीं। रक्षा मंत्रालय अभी भी जांच कर रहा है कि इसकी सामग्री सही है या नहीं।

जनरल नरवणे के आत्मकथात्मक विवरण में कुछ दिलचस्प बातें हैं। इनमें जून 2020 में लद्दाख के गलवान में भारत-चीन के बीच हुआ टकराव शामिल है – जब 20 भारतीय सैनिक शहीद हो गए थे, और चार चीनी सैनिक भी मारे गए थे, हालांकि रूस की ‘तास’ जैसी विदेशी समाचार एजेंसियों का कहना था कि 45 चीनी मारे गए थे – साथ ही कुछ महीने बाद कैलाश शृंखला में हुई कार्रवाई का जिक्र भी है। किताब में भूटान के प्रभावशाली पूर्व राजा, जिग्मे सिंग्ये वांगचुक, जो के-4 नाम से लोकप्रिय हैं, उनके साथ हुई बातचीत; रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की तरफ से आए संदेश; इसके अतिरिक्त प्रधानमंत्री के साथ बैठकों का जिक्र भी शामिल है।
देखा जाए तो, जिस पैराग्राफ ने राजनीतिक तूफान खड़ा किया है, वह लगभग हानिरहित है, और वास्तव में पूर्व सेना प्रमुख की कुछ पेसोपेश प्रस्तुत करता है – एक पैराग्राफ जिसे राहुल ने पकड़ रखा है। वह यह है कि जब चीनी सेना पीएलए के चार टैंक फिंगर-4 के पूर्व में कैलाश की चोटियों पर कब्जा जमा चुके भारतीय सैनिकों की ओर बढ़ रहे थे, तो जनरल नरवणे ने रक्षा मंत्री को फोन किया और उनसे पूछा कि अगली कार्रवाई पर मेरे लिए क्या आदेश है। इस पर राजनाथ सिंह ने, कथित तौर पर पीएम से बात करने के उपरांत, कुछ घंटों के बाद उन्हें वापस फोन किया।
समाचार एजेंसी पीटीआई ने एक साल से भी पहले किताब के प्रकाशक द्वारा भेजी प्रेस विज्ञप्ति के हवाले से बताया है,नरवणे लिखते हैः‘मैंने रक्षा मंत्री को स्थिति की गंभीरता बताई, जिन्होंने कहा कि वह मुझसे वापस संपर्क करेंगे, जो उन्होंने लगभग 22.30 बजे किया। उनका कहना था कि उन्होंने प्रधानमंत्री से बात की है और यह मामला पूरी तरह से एक सैन्य निर्णय है। ‘जो उचित समझो, वो करो’। किसी सुस्पष्ट निर्णय की अनुपस्थिति में मुझे ‘कोरा कागज़’ पकड़ा दिया। खुली छूट के साथ, सारा दारोमदार मुझ पर छोड़ दिया गया। मैंने गहरी सांस ली और कुछ देर चुपचाप बैठा रहा’। सोचकर देखिए, क्या किसी प्रधानमंत्री या रक्षा मंत्री को अपने सेना प्रमुख से यही नहीं कहना चाहिए? वे सेनाध्यक्ष इसीलिए हैं कि ज़मीनी हकीकत का उन्हें सबसे अच्छी तरह पता हो, खासकर जब दुश्मन आगे बढ़ रहा हो, और इसलिए देशहित में जो बेहतरीन हो, उसे वही करना चाहिए।
हम सब जानते हैं कि जब राजनीति सैन्य मामलों में दखल देती है, तो क्या होता है, और इसके उलट का भी। भारत के पड़ोसी देश ढोंग करने वालों से भरे पड़े हैं, सैन्य और सिविलियन दोनों ही रूपों में। लेकिन हर कोई जानता है कि शक्तियों के बंटवारे में, जो लोकतंत्र की रीढ़ है, कुछ व्यावहारिक नियम दोनों पक्षों के लिए साफ-स्पष्ट होते हैं। राहुल गांधी का तर्क है कि जब से सरकार सत्ता में आई है, राष्ट्रीय सुरक्षा उसका मुख्य मुद्दा रहा और जब 2020 में लद्दाख में संकट आया, तो प्रधानमंत्री अपने सेनाध्यक्ष को सही सलाह नहीं दे पाए। निश्चित ही यह बहस का मुद्दा बनता है। यानि, गलवान में चीनी आपको क्यों पीछे धकेल पाए, जिसमें 20 भारतीय सैनिक शहीद हुए? उस झड़प में कोर कमांडर ले.जन. हरिन्दर सिंह की क्या भूमिका थी? आर्मी कमांडर, ले. जन. वाईके जोशी (किताब में नाम ‘जो’) ने इसे कैसे संभाला? गलवान त्रासदी से क्या सबक सीखे? निश्चित ही राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा पवित्र मानकर बहस से परे रखा जाता है और संचालन विवरणों का सरेआम खुलासा नहीं किया जा सकता– रक्षा मंत्रालय ने किताब का प्रकाशन इसीलिए रोक रखा है। लेकिन अब यह रोक बेमानी हो गई क्योंकि किताब की पीडीएफ कॉपी बड़े पैमाने पर पढ़ी जा रही है। जो बात रक्षा मंत्रालय नहीं चाहता था कि लोगों को पता चले, वह सबको मालूम है।

और जो हमें इस छोटे से विवाद के सबसे महत्वपूर्ण सबक पर लाता है- जो निस्संदेह जल्दी ही किसी और मामले पर उठेगा- कि वह सारगर्भित शब्द, ‘रणनीतिक मामला’ जिसमें विदेश मामलों से लेकर आंतरिक सुरक्षा तक शामिल है, उससे संबंधित सूचना नियंत्रण क्षमता का लोकतंत्र में बहुत महत्व है। जनता को कितना बताना है, के टेढ़े सवाल से हरेक सरकार जूझती है। लेकिन सनद रहे कि सूचना के इस युग में, डोनाल्ड ट्रम्प के 59वें दावे के बावजूद कि उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर में भारत-पाकिस्तान टकराव खत्म करवाया, जिसको लेकर वे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हंसी का पात्र बन चुके हैं, विश्वसनीय बने रहने की क्षमता ही महत्वपूर्ण है। कारगिल युद्ध, जिसे कभी-कभी ‘मीडिया युद्ध’ भी कहा जाता है, इसका एक बड़ा सबक था। दूसरी ओर, ऑपरेशन स्नो लेपर्ड (लद्दाख में आमना-सामना) और ऑपरेशन सिंदूर, दोनों में एक अलग तरीका अपनाया गया, जो दुश्मन के सूचना चैनलों- वेबसाइटों, टीवी और वीडियो– द्वारा प्रसारित मिथ्या प्रचार को टक्कर देने और अपना प्रचार करने के मकसद से। जब संघर्ष जारी हो, शायद तब इसका औचित्य हो, लेकिन स्थिति सामान्य होने के बाद, यह उलट पड़ जाती है।
लोग उत्सुक होते हैं, खासकर जब वे 5,000 साल पुरानी सभ्यताओं से जुड़े हों, और खून-खराबे और सुलह, दोनों से जुड़ी उनकी अपनी ऐतिहासिक यादें हों। इसलिए जब चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जन. अनिल चौहान ने ऑपरेशन खत्म होने के कुछ ही हफ़्तों बाद टीवी पर स्वीकार किया था कि भारत ने ऑपरेशन सिंदूर में एक फाइटर जेट खोया,तो सवालों की झड़ी लग गई। कितने? कब? कैसे? असल में क्या हुआ था?
पुराने समय में, जब दुनिया शीत युद्ध की वजह से दो गुटों में बंटी थी, तत्कालीन पूर्वी गुट में एक शब्द था ‘सामिज़्दत’, जिसके तहत प्रतिद्वंद्वी गुट की सरकारों द्वारा प्रतिबंधित किसी भी अख़बार, गद्य अथवा कविता की हस्तलिखित नकल करके उनके लोगों तक पहुंचा दो। ‘घूसखोर पंडत’ और नरवणे की किताब दोनों इस श्रेणी में आते हैं। कभी-कभी आप सोचते होते होंगे कि क्या किताब की पीडीएफ उसी का आधुनिक प्रारूप है।
लेखिका ‘द ट्रिब्यून’ की प्रधान संपादक हैं।
साभार – ‘द ट्रिब्यून’






