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मानदेय की राह ताकते गांव के मनरेगा के सिपाही, भुगतान एक साल से ठप , बच्चों की फीस और रसोई पर संकट

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•⁠  ⁠ग्राम रोजगार सेवकों का दर्द बयां करती प्रयागराज से पुष्पेंद्र यादव की खास रिपोर्ट-

प्रयागराज। गांवों में तालाब खुदवाने से लेकर खेतों की मेड़बंदी और पंचायत भवन तक मनरेगा कार्यों को जमीन पर उतारने वाले ग्राम रोजगार सेवक आज खुद आर्थिक संकट के ऐसे दलदल में फंसे हैं, जहां से निकलने की राह नजर नहीं आ रही। आरोप है कि कंटीन्जेंसी मद की राशि अधिकारियों की व्यवस्थाओं और डीजल-पेट्रोल पर पहले खर्च हो जाती है, जबकि मानदेय के लिए महीनों नहीं बल्कि साल भर तक इंतजार करना पड़ता है।

•⁠  ⁠प्रयागराज में मनरेगा का पहिया घुमाने वाले ग्राम रोजगार सेवक खुद आर्थिक दलदल में, सांसद को सौंपा ज्ञापन   

  प्रयागराज जनपद के 23 ब्लॉकों की 1440 ग्राम पंचायतों में कार्यरत 1025 ग्राम रोजगार सेवकों में भारी नाराजगी है। अकेले फूलपुर विकास खंड की 67 ग्राम पंचायतों में तैनात 50 रोजगार सेवक पिछले एक वर्ष से मानदेय न मिलने का दावा कर रहे हैं। त्योहारों पर भी भुगतान न होने से उनके घरों की खुशियां फीकी पड़ गईं।

ग्राम रोजगार सेवक पंचायत मित्र वेलफेयर एसोसिएशन के प्रदेश उपाध्यक्ष राकेश पटेल का आरोप है कि ब्लॉक स्तर पर ईपीएफ की धनराशि होल्डिंग अकाउंट में पड़ी है और कंटीन्जेंसी मद होने के बावजूद भुगतान टलता रहता है। मंडल अध्यक्ष विजय चंद्र विश्वकर्मा ने कहा कि अधिकारियों की मनमानी और उपेक्षा के कारण त्योहारों पर भी रोजगार सेवकों के घर चूल्हा ठंडा रहता है।

गांवों की विकास योजनाओं की धुरी माने जाने वाले ये कर्मी आज जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों की चौखट पर अपनी मेहनत की कमाई के लिए गुहार लगा रहे हैं। उनका कहना है कि यदि जल्द भुगतान नहीं हुआ तो परिवारों की रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना और कठिन हो जाएगा। गांवों के विकास का पहिया घुमाने वाले इन ‘सिपाहियों’ की नजर अब शासन-प्रशासन की ओर टिकी है।

ग्राम रोजगार सेवक पंचायत मित्र वेलफेयर एसोसिएशन के प्रदेश उपाध्यक्ष राकेश पटेल का आरोप है कि ब्लॉक स्तर पर ईपीएफ की धनराशि होल्डिंग अकाउंट में पड़ी है और कंटीन्जेंसी मद होने के बावजूद भुगतान टलता रहता है। मंडल अध्यक्ष विजय चंद्र विश्वकर्मा ने कहा कि अधिकारियों की मनमानी और उपेक्षा के कारण त्योहारों पर भी रोजगार सेवकों के घर चूल्हा ठंडा रहता है। गांवों की विकास योजनाओं की धुरी माने जाने वाले ये कर्मी आज जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों की चौखट पर अपनी मेहनत की कमाई के लिए गुहार लगा रहे हैं। उनका कहना है कि यदि जल्द भुगतान नहीं हुआ तो परिवारों की रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना और कठिन हो जाएगा। गांवों के विकास का पहिया घुमाने वाले इन सिपाहियों की नजर अब शासन-प्रशासन की ओर टिकी है।

बेटे की फीस रुकी, घर में उधारी बढ़ी

•⁠  ⁠ग्राम रोजगार सेवक हरि ओम प्रकाश की आंखें भर आती हैं। बताते हैं कि बेटे की स्कूल फीस दो महीने से बकाया है। किराने वाले ने उधार बंद करने की चेतावनी दे दी। हम गांव के विकास का हिसाब रखते हैं, पर अपने घर का बजट नहीं संभाल पा रहे।

सुबह खेत-तालाब, शाम को चिंता

•⁠  ⁠मीरा मौर्य बताती हैं, सुबह से तालाब, खेत और पंचायत कार्यालय तक दौड़भाग रहती है। मजदूरों की उपस्थिति, मस्टर रोल, ऑनलाइन प्रविष्टि, सब जिम्मेदारी हमारी। लेकिन महीने के अंत में बैंक खाते में सन्नाटा रहता है। बच्चों के सामने मुस्कुराना पड़ता है, भीतर चिंता पलती रहती है।

ईपीएफ कटता है, पर लाभ नहीं

•⁠  ⁠नूरुद्दीन हाशमी कहते हैं, हर महीने ईपीएफ के नाम पर कटौती होती है, मगर खाते में समय से जमा नहीं दिखती। बीमारी या अनहोनी की स्थिति में यही सहारा होता है, पर वह भी अधर में है।

हर काम हमारा, भुगतान नहीं  रोजगार सेवक संघ के जिलाध्यक्ष अरूण यादव ने बताया, मनरेगा के अलावा चुनाव कार्य, फैमिली आईडी, फार्मर रजिस्ट्री, मिशन अन्तोदय, जलदूत, जनगणना, मनरेगा केवाईसी, बीएलओ जैसे तमाम काम हमसे लिए जाते हैं। अतिरिक्त भत्ता तो दूर, मूल मानदेय भी साल भर से लंबित है।

बोले जिम्मेदार-

ग्राम पंचायतों के विकास में खर्च हुई मनरेगा की धनराशि का साढ़े 3 फ़ीसदी प्रशासनिक मद की धनराशि रोजगार सेवकों को मानदेय के लिए अनुमन्य है।  धनराशि उपलब्ध न होने से मानदेय का भुगतान नहीं हो पा रहा है।

  एचपी वर्मा, खंड विकास अधिकारी फूलपुर।

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