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मोदी सरकार की सबसे बड़ी चुनौती -पीएम इज़ कॉम्प्रोमाइज्ड

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श्याम लाल शर्मा 

कांग्रेस का ये नया सूत्रवाक्य  पीएम इज़ कॉम्प्रोमाइज्ड, इस समय मोदी सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है। राहुल गांधी ने ये बात संसद में कही, इसके बाद इसी वाक्य वाले टी शर्ट्स के साथ युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने एआई समिट में प्रदर्शन किया। मंगलवार को राहुल गांधी ने भोपाल में किसान महापंचायत में अमेरिका के साथ हुए व्यापार समझौते का सच बताते हुए भी यही वाक्य कहा और किसानों को बताया कि कैसे उनके भविष्य को खतरे में डालकर नरेन्द्र मोदी ने अमेरिका के साथ भारत के लिए घाटे का सौदा किया है। कॉम्प्रोमाइज़्ड शब्द का असर इतना गहरा हुआ कि अब भाजपा ने भी इसी का इस्तेमाल गांधी परिवार पर हमला करने के लिए किया। बुधवार को पीयूष गोयल ने एक पोस्ट में पं.नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और सोनिया गांधी इन सबके नाम के साथ कॉम्प्रोमाइज़्ड लिखकर आरोप लगाया कि चारों के सत्ता में रहने के दौरान भारत में क्या-क्या गलत हुआ। नेहरूजी, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी अब इस दुनिया में नहीं हैं, वहीं सोनिया गांधी प्रधानमंत्री कभी नहीं रहीं, यूपीए के दोनों कार्यकाल में डॉ.मनमोहन सिंह ही प्रधानमंत्री थे। हालांकि भाजपा ने उनके जीवित रहते कई बार उनका अपमान किया और मृत्यु के बाद अंतिम विदाई में भी अनादर ही किया। लेकिन गनीमत है कि कॉम्प्रोमाइज़्ड शब्द का इस्तेमाल उनके लिए नहीं किया। वैसे भी भाजपा के निशाने पर गांधी परिवार और अभी खासतौर पर राहुल गांधी ही रहते हैं। तो भाजपा ने यही कहा कि राहुल गांधी का पूरा परिवार ही कॉम्प्रोमाइज़्ड है।

भाजपा को लगता है कि उसके ऐसे हमलों से अब वो सवाल उठने बंद हो जाएंगे, जिन पर नरेन्द्र मोदी बुरी तरह घिरे हुए हैं। लेकिन उसके लिए ज्यादा झटके वाली बात यह रही कि जिस समय गांधी परिवार पर वह हमला बोल रही थी, उसी समय कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने करीब एक घंटे की प्रेस कांफ्रेंस बुधवार को की। इस में उन्होंने एपस्टीन फाइल्स पर आधारित कुछ ऐसे खुलासे किए, जिनके बाद हर देशवासी को डरना चाहिए कि आखिर देश की सत्ता किनके हाथों में है। भाजपा ने अपनी राजनीति को राम मंदिर के मुद्दे पर आगे बढ़ाया, बाबरी मस्जिद तोड़ी, वहीं पर राम मंदिर बनवा लिया और उसके बाद देश-विदेश के मंदिरों में नरेन्द्र मोदी को जी भर के पूजा पाठ करते हुए लोगों ने देखा है। हिंदू धर्म को बढ़ावा देने के साथ-साथ मुस्लिम अल्पसंख्यकों पर अत्याचारों को भी खूब बढ़ावा मिला और बड़े पैमाने पर नफरत फैलाने का काम भाजपा ने सफलतापूर्वक किया। ये कामयाबी उसे धर्म की रक्षा, हिंदुत्व की रक्षा के नाम पर मिली। लेकिन एपस्टीन फाइल्स के खुलासों ने फिर जाहिर कर दिया है कि धर्म तो भाजपा की राजनीति का केवल आवरण है, असल में विदेशी भ्रष्ट ताकतों के हाथों में देश की कमान देने का खेल भाजपा की राजनीति की असलियत है।

इससे पहले अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार भी देश में रही, तब भी घरेलू स्तर पर धार्मिक संकीर्णता कई मौकों पर जाहिर हुई, लेकिन विदेश नीति और रक्षा नीति परंपरागत तरीके से ही चलती रही। उनमें कोई ऐसा बदलाव नहीं हुआ, जिससे लगे कि हम अमेरिका के गुलाम बन चुके हैं। लेकिन 2014 से हालात पूरी तरह बदले हुए हैं। पवन खेड़ा ने बताया कि एपस्टीन फाइल्स में पूर्व राजनयिक हरदीप पुरी, उद्योगपति अनिल अंबानी, खुद को आध्यात्मिक गुरु बताने वाले दीपक चोपड़ा, इजरायल के पूर्व प्रधानमंत्री एहुद बराक, मौजूदा प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और खुद जेफ्री एपस्टीन इन सबके बीच भारत की विदेश नीति और अमेरिका या इजरायल से किए जा रहे रक्षा सौदों को लेकर जो बातचीत 2014 से 2017 के बीच लगातार हुई हैं, उनसे साफ जाहिर होता है कि मोदी सरकार में विदेश मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय या अमेरिका या अन्य देशों में हमारे दूतावास केवल दिखावे के हैं। इनसे जुड़े फैसले लेने की असली ताकत जेफ्री एपस्टीन और उसके गिरोह के पास ही है। एपस्टीन तो अब मर चुका है, लेकिन उससे हरदीप पुरी के संबंध स्थापित होने के बावजूद प्रधानमंत्री उन्हें मंत्रिमंडल से बाहर नहीं कर रहे, उस पर पवन खेड़ा ने कहा कि मोदी अपने ही मंत्री के दबाव में हैं। क्योंकि अगर पुरी को हटाया गया तो बहुत सी ऐसी बातें सामने आ जाएंगी, जिनसे उनकी कुर्सी को खतरा हो जाएगा।

पवन खेड़ा ने नरेन्द्र मोदी को रोबो बताते हुए तंज कसा कि हाल ही में मैंने सुना कि नरेंद्र मोदी ने कहा- मैंने बचपन में एक रोबो बनाया था, जिसके लिए मुझे मेडल भी मिला था। यही बात ट्रंप, नेतन्याहू और एपस्टीन भी कहता है कि हमने एक रोबो बनाया है, जिसका नाम नरेंद्र मोदी है और वो भारत का प्रधानमंत्री है। इसके बाद पवन खेड़ा ने विस्तार से खुलासा किया कि किस तरह एपस्टीन और अनिल अंबानी की मुलाकात दीपक चोपड़ा ने करवाई। कैसे फरवरी 2017 में एपस्टीन से पहली मुलाकात के बाद अनिल अंबानी ने मार्च 2017 में एपस्टीन को मेल भेजकर व्हाइट हाउस के साथ भारत के रक्षा मामलों पर सलाह मांगी। जवाब में एपस्टीन ने पूछा कि आप हमें बदले में क्या दे सकते हैं? तो अनिल अंबानी ने जवाब में लिखा- भारत का पूरा बाजार। इसके बाद एपस्टीन इजराइल के पूर्व प्रधानमंत्री एहुद बराक को मेल भेजकर पूछता है कि अमेरिका के रक्षा मामलों में भारत की क्या भूमिका हो सकती है? इस तरह की बातचीत को पढ़कर कोई संशय नहीं रह जाता कि देश की विदेश और रक्षा नीति पर एपस्टीन जैसे लोगों की मर्जी चल रही थी। एक मेल में यह भी पता चला है कि 15-18 मई, 2017 को जब फिलिस्तीन के तत्कालीन राष्ट्राध्यक्ष महमूद अब्बास भारत आए थे। तो ये बात अमेरिका, एपस्टीन, नेतन्याहू और एहूद बराक को पसंद नहीं आई और उन्होंने अपनी नाराजगी हरदीप पुरी से जाहिर की। इसके बाद 25-26 जून, 2017 को नरेंद्र मोदी अमेरिका गए और फिर 4-6 जुलाई, 2017 को इजराइल गए। फिर एपस्टीन ने कतर के एक व्यापारी को बताया कि मोदी ने हमारी सलाह मानी और अमेरिका को खुश करने के लिए इजरायल में नाचे और गाए। इस मेल के आखिरी में लिखा है इट वर्क्ड यानी ये काम कर गया। अब सवाल यही है कि आखिर कौन सी तरकीब या दबाव काम कर गया। और मोदी का नाचना-गाना आखिर किस तात्पर्य से लिखा गया है।

खास बात ये है कि मोदी बुधवार को फिर इजरायल की दूसरी यात्रा पर रवाना हो गए, जबकि इजरायल और अमेरिका ईरान पर युद्ध छेड़ने तैयार बैठे हैं और ऐसे में इजरायल से भारत की करीबी दिखाने का मतलब है कि हम पूरी तरह अपनी संतुलनकारी विदेश नीति को छोड़ रहे हैं। देश ने कई किस्म के विचारों और तौरतरीकों वाले प्रधानमंत्री देखे, लेकिन अमेरिका के आगे समर्पण कभी किसी ने नहीं किया। यहां नरेन्द्र मोदी भारत का सौदा कर चुके हैं और भाजपा अब भी गांधी परिवार पर हमले से आगे नहीं बढ़ रही है।

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