अखिलेश अखिल
भारतीय लोकतंत्र के “विचारशील सदन” माने जाने वाली राज्यसभा की मौजूदा संरचना एक बार फिर बहस के केंद्र में है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की ताज़ा रिपोर्ट और हाल के आंकड़े मिलकर एक ऐसी तस्वीर पेश करते हैं, जो लोकतांत्रिक गुणवत्ता, प्रतिनिधित्व और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक, राज्यसभा के 229 सांसदों के हलफनामों के विश्लेषण में सामने आया कि 73 सांसद (करीब 32 फीसदी ) ने अपने खिलाफ आपराधिक मामलों की जानकारी दी है। इनमें से 36 सांसद (16 फीसदी ) ऐसे हैं, जिन पर गंभीर आरोप दर्ज हैं—यहां तक कि एक सांसद पर हत्या और चार पर हत्या के प्रयास के मामले हैं, जबकि तीन सांसदों पर महिलाओं के खिलाफ अपराध से जुड़े केस हैं।
यह आंकड़े महज संख्या नहीं हैं, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति का संकेत हैं, जिसमें कानून बनाने वाले खुद कानूनी विवादों में घिरे हुए हैं। भले ही यह तर्क दिया जाता है कि सभी मामलों में दोष सिद्ध नहीं हुआ है, लेकिन इतने बड़े पैमाने पर आपराधिक मामलों का होना लोकतंत्र की नैतिक विश्वसनीयता को प्रभावित करता है।
दूसरी तरफ, राज्यसभा में धनबल का प्रभाव भी उतना ही स्पष्ट है। एडीआर के अनुसार, 31 सांसद (14 फीसदी ) अरबपति हैं और एक सांसद की औसत संपत्ति 120.69 करोड़ रुपये है। कुछ मामलों में यह संपत्ति हजारों करोड़ तक पहुंचती है—जैसे बीआरएस के बंदी पार्थ सारथी के पास 5300 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति है।
दिलचस्प और चिंताजनक पहलू यह भी है कि अलग-अलग पार्टियों के सांसदों की औसत संपत्ति में भारी अंतर है। जहां कांग्रेस के सांसदों की औसत संपत्ति 128.61 करोड़ रुपये है, वहीं आम आदमी पार्टी के सांसदों की औसत संपत्ति 574.09 करोड़ रुपये तक पहुंचती है। वाईएसआरसीपी और समाजवादी पार्टी जैसे दलों में भी यह आंकड़ा सैकड़ों करोड़ में है। यह प्रवृत्ति बताती है कि राजनीति में आर्थिक संसाधन अब एक निर्णायक कारक बनते जा रहे हैं।
हालांकि, इसी तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है—कुछ सांसद बेहद कम संपत्ति के साथ भी इस सदन तक पहुंचे हैं। जैसे आम आदमी पार्टी के संत बलबीर सिंह के पास मात्र 3 लाख रुपये की संपत्ति है। यह असमानता दिखाती है कि राज्यसभा में प्रतिनिधित्व का दायरा बेहद असंतुलित हो चुका है, जहां एक ओर हजारों करोड़ के मालिक हैं, तो दूसरी ओर न्यूनतम संसाधनों वाले भी।
राजनीतिक दलों के स्तर पर देखें तो भाजपा के 99 में से 27 सांसद, कांग्रेस के 28 में से 12 सांसद, टीएमसी के 13 में से 4 और आम आदमी पार्टी के 10 में से 4 सांसदों ने आपराधिक मामलों की घोषणा की है। यह समस्या किसी एक दल तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे राजनीतिक तंत्र में व्याप्त है।
यह स्थिति कई बड़े सवाल खड़े करती है। क्या राज्यसभा, जो कभी विशेषज्ञता और अनुभव का मंच मानी जाती थी, अब धीरे-धीरे धन और प्रभाव का केंद्र बनती जा रही है? क्या राजनीतिक दल उम्मीदवारों के चयन में नैतिकता और योग्यता से ज्यादा “विजय क्षमता” और संसाधनों को प्राथमिकता दे रहे हैं?
इसके साथ ही, यह भी चिंता का विषय है कि राज्यसभा का चुनाव प्रत्यक्ष जनता द्वारा नहीं होता। ऐसे में राजनीतिक दलों और विधायकों की भूमिका बढ़ जाती है, जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही के सवाल और गहरे हो जाते हैं।
जरूरत इस बात की है कि राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों के चयन में सख्ती और पारदर्शिता दिखाएं। चुनाव सुधार, तेज न्यायिक प्रक्रिया और आपराधिक मामलों में समयबद्ध फैसले जैसे कदम भी उतने ही जरूरी हैं।
, यह मुद्दा केवल आंकड़ों का नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा का है। अगर कानून बनाने वाले ही दाग और दौलत के प्रतीक बन जाएं, तो जनता का भरोसा कमजोर पड़ना स्वाभाविक है। राज्यसभा की यह तस्वीर एक चेतावनी है—कि लोकतंत्र की मजबूती केवल संस्थाओं से नहीं, बल्किउनमेंबैठेलोगोंकीसाखसेतयहोतीहै।






