अखिलेश अखिल
सियासत में कब क्या हो जाए और कौन अपना बने और अपना कब पराया बन जाए यह कोई नहीं जानता। ठगी और सिर्फ खुद की लाभ पर टिकी बेशर्म राजनीति कभी किसी की होती नहीं। जो राजनीति की भाषा और चल को समझ नहीं सके उसे आप जो भी कहिये लेकिन बड़ा सैक्सः तो यही है कि ऐसे लोग मुर्ख ही कहे जा सकते हैं। दुनिया की राजनीति पर नजर डालिये तो समझ आ जाएगा कि वक्त के मुताबक नेता और राजनीति की चाल बढ़ती है। मौका मिलते ही चाल बदल जाती है। जिसके सहारे नेता आगे बढ़ते हैं ,काम पूरा होते ही उस सहारे को ही सबसे पहले नाप दिया जाता है। और यह सब इसलिए कि नपने वाला वह आदमी सब कुछ जानता है। लेकिन राजनीति को सच से परहेज जो है। वह सच को अपने साथ नहीं रखता।
हाल में यूपी सरकार और शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानन्द के बीच ठनी जंग से देश के लोगों को बहुत कुछ सिखने को मिल सकता है और यह भी मालूम हो सकता है कि जिस पीठ के सहारे भारत सैकड़ों सालों से दुनिया में सनातन का खेल आगे बढ़ाते रहा है अब सत्ता सरकार के निशाने पाए वही सनातन परम्परा है। बड़ी बात यह भी है कि आज भी राजनीति उसी सनातन के इर्द गिर्द घूमती नजर आ रही है लेकिन सनातन के सबसे बड़ी पीठ राजनीति के निशाने पर है।
कहानी यह है कि बच्चों से कथित यौन शोषण के गंभीर आरोपों के बीच शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद द्वारा इलाहाबाद हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत याचिका दायर करना केवल एक कानूनी कदम नहीं, बल्कि एक ऐसे प्रकरण का नया अध्याय है जिसमें आस्था, सत्ता, पुलिस कार्रवाई और सियासत—सब एक साथ उलझते दिख रहे हैं। मामला जितना संवेदनशील है, उतना ही विस्फोटक भी, क्योंकि इसमें पॉक्सो कानून के तहत दर्ज एफआईआर, धार्मिक प्रतिष्ठा और प्रशासनिक निष्पक्षता—तीनों दांव पर ह
तेज हुई कानूनी हलचल
21 फरवरी को झूंसी थाने में विशेष पॉक्सो कोर्ट के आदेश पर एफआईआर दर्ज हुई। आरोपियों में शंकराचार्य, उनके शिष्य मुकुंदानंद और कुछ अज्ञात व्यक्ति शामिल हैं। अदालत में दो बच्चों के बयान दर्ज होने के बाद यह मामला औपचारिक रूप से आपराधिक जांच के दायरे में आया।एफआईआर के बाद प्रयागराज पुलिस की टीम वाराणसी पहुंची, स्थानीय स्तर पर जानकारी जुटाई और जांच की प्रक्रिया तेज कर दी। संभावित गिरफ्तारी की आशंका के बीच शंकराचार्य ने अग्रिम जमानत की राह चुनी—यह कदम अपने आप में संकेत देता है कि मामला साधारण नहीं है।
अग्रिम जमानत का मतलब आरोपों से मुक्ति नहीं, बल्कि गिरफ्तारी से अस्थायी संरक्षण है। अदालत यदि राहत देती है तो भी जांच जारी रहेगी। यदि राहत नहीं मिलती, तो पुलिस कार्रवाई का रास्ता खुला रहेगा।

प्रेस कॉन्फ्रेंस और ‘साजिश’ का नैरेटिव
अग्रिम जमानत याचिका दायर करने के तुरंत बाद वाराणसी में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस ने इस मामले को कानूनी दायरे से निकालकर सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला दिया। शंकराचार्य ने प्रयागराज के एडिशनल पुलिस कमिश्नर अजय पाल शर्मा पर साजिश रचने का आरोप लगाया और एक तस्वीर दिखाते हुए पुलिस अधिकारी की निष्पक्षता पर सवाल खड़े किए। उनका दावा है कि उन्हें “गो-रक्षा अभियान” से पीछे हटाने के लिए पूरे सिस्टम का इस्तेमाल किया जा रहा है। यह आरोप सीधे-सीधे प्रशासनिक निष्पक्षता पर प्रहार है। हालांकि, पुलिस की ओर से अब तक इन आरोपों पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।
यहां सवाल उठता है—क्या यह मामला केवल कानूनी है, या इसमें सत्ता-संघर्ष और धार्मिक प्रभाव की परछाईं भी है? प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए जांच अधिकारी को कठघरे में खड़ा करना एक रणनीतिक कदम भी माना जा सकता है, जिससे सार्वजनिक सहानुभूति अर्जित की जा सके।
पॉक्सो कानून
यह मामला पॉक्सो अधिनियम के तहत दर्ज है—एक ऐसा कानून जो बच्चों के यौन शोषण जैसे अपराधों के लिए कड़ा और विशेष प्रावधान रखता है। इस कानून में पीड़ितों की पहचान गोपनीय रखना, उनके बयान को सुरक्षित वातावरण में दर्ज करना और त्वरित सुनवाई सुनिश्चित करना अनिवार्य है।ऐसे मामलों में सार्वजनिक बयानबाजी और राजनीतिक रंग देने की कोशिश जांच की निष्पक्षता को प्रभावित कर सकती है। आरोप गंभीर हैं और यदि सत्य साबित होते हैं तो परिणाम भी गंभीर होंगे। लेकिन जांच पूरी होने से पहले किसी भी पक्ष को दोषी या निर्दोष घोषित करना न्याय की प्रक्रिया के साथ अन्याय होगा।

माघ मेले से कोर्ट तक
इस विवाद की शुरुआत 18 जनवरी को माघ मेले के दौरान प्रशासन और शंकराचार्य के बीच हुए विवाद से जुड़ी बताई जा रही है। आठ दिन बाद शिकायत दर्ज हुई, फिर विशेष पॉक्सो कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया। अदालत के निर्देश पर एफआईआर दर्ज हुई और बच्चों के बयान लिए गए।यह क्रम बताता है कि शिकायत सीधे पुलिस से नहीं, बल्कि अदालत के आदेश के बाद दर्ज हुई। इससे यह सवाल भी उठता है कि शुरुआती स्तर पर पुलिस की सक्रियता क्यों नहीं दिखी? क्या शिकायत को गंभीरता से लेने में देरी हुई? या फिर शिकायतकर्ता को न्यायिक हस्तक्षेप की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि स्थानीय स्तर पर सुनवाई नहीं हो रही थी?
धार्मिक पहचान और सामाजिक असर
मामला केवल कानूनी नहीं, सामाजिक और धार्मिक भी है। शंकराचार्य का पद करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़ा है। ऐसे में आरोपों का असर केवल अदालत तक सीमित नहीं रहता, बल्कि धार्मिक समुदायों में भावनात्मक प्रतिक्रिया पैदा करता है।यही कारण है कि यह प्रकरण कानून-व्यवस्था के लिए भी चुनौती बन सकता है। प्रशासन को जांच की पारदर्शिता और शांति-व्यवस्था—दोनों को संतुलित रखना होगा।
अदालत की भूमिका
अब सबकी नजर इलाहाबाद हाईकोर्ट पर है। अदालत को यह तय करना है कि क्या शंकराचार्य को गिरफ्तारी से अंतरिम राहत दी जाए। न्यायालय आमतौर पर अग्रिम जमानत पर निर्णय लेते समय आरोपों की प्रकृति, साक्ष्यों की स्थिति, आरोपी का सामाजिक प्रभाव और जांच में सहयोग जैसे पहलुओं को देखता है।यदि अदालत राहत देती है, तो यह संदेश जाएगा कि जांच जारी रहेगी लेकिन गिरफ्तारी फिलहाल टाली गई है। यदि राहत नहीं मिलती, तो पुलिस की कार्रवाई तेज हो सकती है। दोनों ही स्थितियों में जांच की निष्पक्षता सर्वोपरि होगी।






