दुनिया

ट्रम्प की लगाई आग से ही जलने लगा अमेरिका

अमेरिका में हुए प्रदर्शन ने ट्रंप की चुनौतियां बढ़ा दी है , कई नगरों में हिंसा-आगज़नी भड़क उठी और कर्फ्यू लगाना पड़ा

राजेश बादल

एक अश्वेत की हत्या के बाद अमेरिका धधक रहा है। डोनॉल्ड ट्रम्प को सौ फ़ीट नीचे तहख़ाने के बंकर में जाना पड़ा, सेना को तैनात करने की चेतावनी देनी पड़ी, पुलिस को घुटनों के बल बैठकर माफ़ी मांंगनी पड़ी और ख़ुद ट्रम्प की एक बेटी प्रदर्शनकारियों के साथ मैदान में उतर आईं।इससे पता चलता है कि मामला कितना गंभीर है। संसार के एक बड़े गणतंत्र की अल्पसंख्यक आबादी का ग़ुस्सा इस तरह फूटेगा, इसकी कल्पना ख़ुद सरकार को भी नहीं थी।

पुलिस अधिकारी डेरिक शेविन ने जिस तरह जॉर्ज फ्लॉयड की सार्वजनिक हत्या की, उससे स्पष्ट है कि अमेरिकी पुलिस अश्वेतों के मामले में किसी मानवाधिकार क़ानून की चिंता नहीं करती। समय-समय पर वहांं नस्ली हिंसा की वारदातें होती रहती हैं। इसके बावजूद अश्वेतों ने कभी इतना गंभीर आक्रोश नहीं दिखाया।पहली दफ़े पीड़ित समुदाय की भड़ास निकली है। ज़ाहिर है कि नाराज़गी अरसे से खदबदा रही थी।
दरअसल,  इस हत्याकांड के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की एक टिप्पणी ने आग में घी डालने का काम किया। उन्होंने कहा-“जब लूट शुरू होती है तो उसके बाद शूट भी शुरू हो जाता है। यही वह कारण है कि मिनेपॉलिस में बुधवार की रात एक व्यक्ति को गोली मार दी गई”।

हालांंकि अपने इस बयान के बाद वे सफ़ाई की मुद्रा में भी आए, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। बयान के बाद कई नगरों में हिंसा-आगज़नी भड़क उठी और कर्फ्यू लगाना पड़ा। वर्तमान घटनाक्रम में ट्रम्प के इस रवैए की मुख्य वजह सियासी है।

इस साल होने वाले चुनाव में ट्रम्प दूसरी पारी का सपना देख रहे हैं। लेकिन आर्थिक अराजकता, बेरोज़गारी ,अफ़ग़ानिस्तान से फ़ौज़ वापस बुलाने का फुस्स होता तालिबान समझौता , मीडिया से ख़राब रिश्ते, कोरोना से निपटने में नाक़ामी, चीन से बिगड़ते रिश्ते और यूरोप के मित्र देशों से दोस्ती पर पाला पड़ जाने के कारण उनकी किरकिरी हुई है।
अश्वेतों का समर्थन ट्रम्प के डेमोक्रेट विरोधी उम्मीदवार जो बिडेन को मिल रहा है। बराक ओबामा भी खुलकर जो बिडेन का समर्थन कर रहे हैं। जो बिडेन बराक ओबामा के कार्यकाल में उपराष्ट्रपति रह चुके हैं।बराक़ ओबामा भी अश्वेत हैं।

वे इस मामले में अश्वेतों के साथ खड़े हैं। फ्लॉयड की हत्या के बाद वे फूट-फूट कर रोए। उन्होंने कहा कि इस घटना ने मुझे तोड़कर रख दिया है। यह दुखद है और 2020 के अमेरिका में यह नहीं होना चाहिए। पूर्व राष्ट्रपति ने कहा कि ऐसे वातावरण में बराबरी के अधिकारों और समानता की बात करना बेमानी है। यह अलग बात है कि ओबामा ने अपने कार्यकाल में अश्वेतों के लिए कुछ ख़ास नहीं किया था।

ग्यारह साल पहले अश्वेतों को बड़ी उम्मीद बंंधी थी, जब बराक ओबामा पहले अफ़्रीक़ी-अमेरिकी अश्वेत राष्ट्रपति के तौर पर चुने गए थे। आठ साल तक अपने कार्यकाल के दौरान वे कोई क्रांतिकारी परिवर्तन तो नहीं कर सके, मगर अश्वेत उनके राज में सुरक्षित होने का अहसास पालते रहे। स्थानीय स्तर पर नस्ली भेद और हिंसा में उल्लेखनीय बंदिश नहीं लगी। फिर भी ओबामा के दौर को अश्वेत अच्छे कार्यकाल के रूप में याद करते हैं। कुल मिलाकर अमेरिकी मतदाता चुनाव में डोनाल्ड ट्रम्प को झटका देने के मूड में दिखाई दे रहे हैं। जानकारों के मुताबिक़ खुद ट्रम्प को भी अपनी कमज़ोर स्थिति का अहसास हो चला है।

एक नज़र समस्या की जड़ में। क़रीब ढाई सौ साल तक अमेरिका में अफ़्रीक़ी बंदियों और ग़ुलामों के साथ अमानवीय अत्याचार किए गए। उनकी संतानों और एशियाई मूल के लोगों की संख्या आज चार करोड़ के आसपास जा पहुंंची है। अनेक पीढ़ियों तक उनके साथ भेदभाव और क्रूर व्यवहार होता रहा। दो शताब्दियों से भी अधिक समय तक उन्हें वोट डालने और बच्चों को पब्लिक स्कूलों में पढ़ाने का हक़ नहीं मिला था।इसी तरह एशियाई मूल के निवासियों को 68 बरस पहले ही मतदान का हक़ मिला।

अमेरिका में गोरे अश्वेतों के साथ वैसे ही ज़ुल्म करते थे, जैसे अंंगरेज़ हिन्दुस्तान और अफ़्रीक़ा में करते थे। अमेरिका के गांधी मार्टिन लूथर किंग जूनियर भी नस्ली भेदभाव के ख़िलाफ़ जीवन भर संघर्ष करते रहे थे। इसी वजह से 4 अप्रैल 1968 को उनकी हत्या कर दी गई थी। हत्या से एक दिन पहले ही उन्होंने रैली में अश्वेतों की आवाज़ उठाई थी।

उन्होंने कहा था,”हम तब तक संतुष्ट नहीं होंगे ,जब तक एक नीग्रो पुलिस की बर्बरता का शिकार होता रहेगा। जब तक हमें होटलों और हाई वे से लौटाया जाता रहेगा, हम संतुष्ट नहीं होंगे। जब तक मिसीसिपी के नीग्रो को वोट का हक़ नहीं मिलता, हम संतुष्ट नहीं होंगे। हम तब तक संतुष्ट नहीं होंगे, जब तक कि न्याय पानी की तरह और सचाई नदी की तरह नहीं बहने लगती”। तब से आज तक भेदभाव का यह सिलसिला जारी है।

अमेरिकी पुलिस गोरे नागरिकों की तुलना में अश्वेतों को अधिक सताती है। निहत्थे अश्वेतों की पुलिस के हाथों हत्या का आंंकड़ा चौंकाता है। औसतन अमेरिकी पुलिस रोज़ तीन नागरिक मारती है। इनमें एक अश्वेत होता है। पिछले पांंच साल में लगभग पांंच हज़ार नागरिक पुलिस का निशाना बने। इनमें से डेढ़ हज़ार के आसपास अश्वेत नागरिक थे। इसी बरस पांंच महीने में आधा दर्ज़न अश्वेत अपनी जान गंंवा चुके हैं। अश्वेतों के अनेक संगठन इसी क्रूरता के विरोध में बने। लेकिन उनकी आवाज़ नक़्क़ारख़ाने में तूती की तरह ही रही। अब वे खुलकर कह रहे हैं ” हम मरना नहीं चाहते “।

अमेरिका अपने इतिहास के बेहद कठिन दौर का सामना कर रहा है और हालात सामान्य होने में कई साल लग जाएंंगे। उसके बाद विश्व राजनीति में उसकी चौधराहट की परीक्षा भी होगी।

Leave a Reply

Close