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किस रसातल में चला गया भारतीय ‘भारतीय उपमहाद्वीप’, का शब्द

कितनी सफाई से भारतीय उप महाद्वीप शब्द को गायब कर दिया गया. इस खेल की किसी ने भी परवाह नहीं की. घनघोर साजिश हुई थी, और हमारे रणनीतिकार सोये पड़े थे.

पुष्परंजन / वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक / ईयू-एशिया न्यूज के नई दिल्ली

पाकिस्तान को इतनी अकल कहां से आ गई कि वह नामांतरण की मुहिम छेड़ बैठा? उसकी जड़ों को समझने के वास्ते एक बार फिर अमरीका का रुख करना होगा। यह अमेरिकंस थे, जो चाहते थे कि इस इलाके से अंग्रेजों द्वारा दिया ‘इंडियन सब-कांटिनेंट’ शब्द की विदाई हो। 1940 से 1970 के बीच अमरीकी विदेश मंत्रालय के दस्तावेजों, फाइलों पर नोटिंग को ध्यान से देखें, तो वहां इसके प्रयास लगातार किए जा रहे थे। 1959 में अमरीकी विदेश मंत्रालय ने वर्ल्ड बैंक को भेजी एक ब्रिफिंग में ‘द सब-कांटिनेंट आफ साउथ एशिया‘ शब्द का इस्तेमाल किया था। विदेश मंत्रालय में बैठे बहुत से बाबू लोग बोलते भी हैं, ‘छोड़ो भी, नाम में क्या रखा है?’ पीछा छुड़ाने की इस मासूम अदा पर आप दुखी हैं, तो होते रहें। दुनिया ऐसे ही चलती रहेगी!

तीन दशक पहले धड़ल्ले से इस्तेमाल होता था ‘भारतीय उपमहाद्वीप’। याद है, या भूल गए? कैसे शब्दों के साथ साजिश रची जाती है, उसका एक उदाहरण है, भारतीय उपमहाद्वीप। इस शब्द को लेकर सिर्फ पाकिस्तान हल्ला नहीं कर रहा, बल्कि चीन को ब्रिटिश राज के समय से ही आपत्ति है कि तिब्बत, अक्साई चीन और शिन्जियांग इसकी जद में क्यों आएं? रूसी जार के जमाने में अंग्रेजों ने लद्दाख के रास्ते उन्हें रोका था।

दुनिया के सबसे वीरान, सबसे ऊंचे, बर्फीले इलाके में लंबे समय तक चले ‘निस्तब्ध युद्ध’ को कूटनीतिकों ने ‘ग्रेट गेम’ नाम दिया था। उस दौर के दस्तावेजों में भी ‘भारतीय उपमहाद्वीप’ शब्द का खूब इस्तेमाल हुआ था।1876 में ब्रिटिश शासकों ने शिन्जियांग के मांचू सम्राट को जिस तरह से आर्थिक और सामरिक सहयोग दिया था, उसके बिना पर ही इस इलाके को भारतीय उपमहाद्वीप का हिस्सा अंग्रेजों ने मान लिया था। कई बार भारतीय उपमहाद्वीप के ‘कागजी विस्तार’ का सवाल चीनी कूटनीतिकों, इतिहासकारों और विश्लेेषकों के लिए विरोधाभास का कारण भी बनता है।
चीन से कहीं बढ़कर इस शब्द के बहाने पाकिस्तान राजनीतिक रूप से अति संवेदनशील होता चला गया है। पता नहीं, हमारे यहां का विदेश मंत्रालय पाकिस्तान में ‘भारतीय उपमहाद्वीप’ को लेकर शाब्दिक बदलावों से कितना सचेत और संवेदनशील है। लेकिन पिछले दो दशकों के पाकिस्तानी दस्तावेजों, उनके सरकारी प्रस्तावों को देखने के बाद साफ नजर आता है कि इस सवाल को उन्होंने अपनी संप्रभुता और राष्ट्रीय अस्मिता से जोड़ रखा था। 1968 में ‘जूलोजिकल सोसाइटी आफ पाकिस्तान’ की बुनियाद रखी गई। इस सोसाइटी ने एक शब्द चलाना शुरू किया है- ‘पाकिस्तान सबकांटिनेंट’।

बाद के कुछ वर्षों तक जूलोजिकल सोसाइटी आफ पाकिस्तान ने ‘इंडो-पाकिस्तान सबकांटिनेंट’ जैसे शब्द चलाए। लेकिन बाद में यह भी वर्जित हो गया।
इस मुद्दे पर सबसे अधिक सक्रिय पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ही दिखता है। पाक विदेश मंत्रालय का स्पष्ट निर्देश है कि या तो ‘साउथ एशियन सबकांटिनेंट’ या फिर ‘सबकांटिनेंट’ शब्द ही चलाए जाएं। बात वहां के विदेश मंत्रालय तक ही सीमित नहीं है, बल्कि पाकिस्तान का पूरा सरकारी महकमा इतिहास पलटने के काम में पीछे नहीं रहा है।

पाकिस्तान के प्रख्यात इतिहासकार प्रो. अहमद हसन दानी अब तो जीवित नहीं रहे, लेकिन 2005 में जर्मन रेडियो को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने स्वीकार किया था कि तथ्यों को तोड़कर प्रस्तुत करने के दबाव से यहां के इतिहासकार कभी बरी नहीं रहे थे। डा. दानी बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से डिग्री लेने वाले पहले मुसलमान थे। पाकिस्तान में बसने के बाद वे भी अपने लेखन में ‘इंडियन सबकांटिनेंट’ लिखने से परहेज करते रहे। ‘एंटी इंडियन सबकांटिनेंट’ अभियान का एक हिस्सा पाकिस्तान के दूसरे बड़े इतिहासकार खुर्शीद कमाल अजीज भी रहे हैं। उनकी मशहूर पुस्तक ‘ब्रिटिश इंपीरियलिज्म इन इंडिया-पार्टी पालिटिक्स इन पाकिस्तान’ में इसकी झलक साफ दिखाई देती है। अमरीकी और जर्मन विश्वविद्यालयों में मुस्लिम इतिहास पर पाकिस्तानी नजरिए को प्रस्तुत करने वाले प्रो. असलम सैयद ने साफ स्वीकार किया कि उन्हें ‘सब कांटीनेंट’ कहने में ही सुविधा होती है।

29 भाषाओं में प्रसारण करने वाली जर्मनी की पब्लिक ब्राड कास्टिंग संस्था डायचे वेले में काम करने वाले हम जैसे भारतीय मूल के संपादकों पर लंबे समय से इसक दबाव था कि ‘भारतीय उपमहाद्वीप’ शब्द का इस्तेमाल बंद किया जाए। अंततरू होता वही है, जो आप का नियोक्ता चाहता है। 2005 में ‘भारतीय उपमहाद्वीप’ जर्मन रेडियो की शब्दावली से गायब हो गया और उसके बदले ‘दक्षिण एशिया’ का प्रयोग हम सब करने लगे थे। पाकिस्तानी ‘डायसपोरा’ की यह बड़ी फतह थी। बहुत बाद में पता चला कि बर्लिन स्थित पाक दूतावास ने इसे बड़ी जीत मानते हुए एक जलसे का आयोजन भी किया था। कोई पूछ सकता है कि एक विदेशी रेडियो सर्विस से बर्लिन के पाक दूतावास का क्या लेना-देना?

इसकी तफ्सील में जाने पर ‘भारतीय उपमहाद्वीप’ वाली कहानी की दिशा बदल जाएगी। संक्षेप में जो बात ठोंककर कही जा सकती है, वह यह है कि ‘भारतीय उपमहाद्वीप’ पर प्रतिबंध लगवाने में उर्दू सर्विस के पाकिस्तानी मित्रों का परोक्ष रूप से बड़ा रोल रहा था। जिन पुराने लोगों ने 40-45 साल के प्रसारण को सुना है, उनका निजी अनुभव यही रहा कि पाकिस्तान से जर्मनी या लंदन आए उर्दू ब्राडकास्टर ‘भारतीय उपमहाद्वीप’ बोलना ही ‘हराम’ समझते थे। ‘सबकांटिनेंट’ या ‘साउथ एशिया’ कहने से उन्हें लगता था कि आज हमने ‘हलाल’ की कमाई कर ली।

3 अक्टूबर 2009 को पाकिस्तानी दैनिक ‘द डान’ में मुबारक अली ने एक छोटी सी टिप्पणी की थी कि ‘भारतीय उपमहाद्वीप’ दरअसल ग्रीक विद्वानों द्वारा दिया गया नाम है, जिसे बाद में अंग्रेजों ने भी आत्मसात कर लिया। मुबारक अली लिखते हैं, ‘समय बदल गया, फिर भी भारत इसे सारस्वत मानता रहा है।’ पाकिस्तान में जो लोग बौद्धिक आतंकवाद के पैरोकार हैं, उन्हें ‘इंडियन सब-कांटिनेंट’ के व्यापक स्वरूप को लेकर ही कष्ट होता रहा है। उनका सवाल है कि इंडियन टेक्टोनिकप्लेट, हिमालय, हिंद महासागर की भौगोलिक परिधि में पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, मालदीव यहां तक कि विवादास्पद अक्साई चीन और शिन्जियांग को क्यों आना चाहिए? क्या ये देश और क्षेत्र भारतीय उपमहाद्वीप की परिधि में आएं? डेली टाइम्स में पाकिस्तान के अवकाशप्राप्त एयर वाइस मार्शल शहजाद चैधरी ‘पाकिस्तान डिहाइफनेटेड’ हेडलाइन वाले लेख में एक जगह लिखते हैं, ‘उपमहाद्वीप’ भारत-पाक के बीच अपमानबोधक शब्द बन गया है।’

इस विषय से जुड़ी कुछ घटनाओं, और स्वयं भोगे यथार्थ का जिक्र भी जरूरी था। ओस्लो के ‘नार्वेजियन म्यूजियम आफ रेसिस्टेंट’ को देखने पर यह बात तो साफ हो जाती है कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान रेडियो, जासूसी का एक सशक्त माध्यम हुआ करता था। हिटलर की आंख-कान कहे जाने वाले ‘गेस्टापो’ के जासूसों ने रेडियो का किस हद तक इस्तेमाल किया, यह बात इस म्यूजियम को देखने के बाद समझ में आ जाती है। रेडियो की लोकप्रियता आज भी कम नहीं हुई है। पर एफएम, ब्राडकास्ट के आने के बाद उसका फार्म जरूर बदला है।

अमरीका के इलिनोइस में रहने वाले पाकिस्तानी मूल के प्रोफेसर फजलुर रहमान मलिक ने 47 साल पहले यूनिवर्सिटी आफ शिकागो प्रेस के जर्नल में ‘इस्लामिक थाट इन द इंडो-पाकिस्तान सबकांटिनेंट एंड द मिडल-इस्ट’ शीर्षक शोध पत्र में बाकायदा एक नए नैरेटिव के साथ पुछल्ला जोड़ा ‘इंडो-पाकिस्तान सबकांटिनेंट’। प्रो. मलिक बड़ी होशियारी से इंडो-चाइना की तरह ‘इंडो-पाकिस्तान सबकांटिनेंट’ शब्द को चलाना चाहते थे, मगर 200 पेज के शोधपत्र में यह शब्दावली कुछ सेमिनारों तक सीमित होकर रह गई। यह वाकया 1973 का है। प्रोफेसर मलिक 1988 में गुजर गए, मगर इंडियन सब-कांटिनेंट को बिसार देने का वह बौद्धिक अभियान जारी रहा।

भारत के खिलाफ विष वमन को विस्तार देने की चेष्टा दक्षिण-पूर्वी एशिया के उन देशों में हुई, जो भारतीय उप महाद्वीप की परिधि में आते थे। वहां समय-समय पर आयोजित संगोष्ठियों में समझाया गया कि भारत इस शब्दावली के जरिए अपनी सुप्रीमेसी बनाए रखना चाहता है। पाकिस्तान को इंडियन ओशन (हिंद महासागर) से भी कष्ट है। उसके इस्तेमाल को कैसे हटाया जाए, उसकी जुगत में भी पाकिस्तान लगा हुआ है। मगर ‘हिंद महासागर’ की व्यापकता और दुनिया के सभी देशों द्वारा इसके लगातार उल्लेख ने पाकिस्तानियों को यह अवसर नहीं दिया कि वो अपना उल्लू सीधा कर सके।

ध्यान से देखा जाए तो अस्सी के दशक में इंडियन सब-कांटिनेट को धूमिल करने के वास्ते ‘दक्षिण एशिया’ जैसे नैरेटिव को कूटनीतिक हलकों में ढूंढ़ निकाला गया। 8 दिसंबर 1985 को दक्षेस की बुनियाद रखने के बाद ‘भारतीय उपमहाद्वीप’ धीरे-धीरे कूटनीति के शब्दकोश से गायब होने लगा था। हालांकि ‘सदर्न एशिया’ शब्द नया नहीं है। ब्रिटिश विद्वान होरेस ब्लिकले की एक पुस्तक 1928 में छपकर आई थी, नाम था ‘अ टुअर इन सदर्न एशिया’। इस यात्रा वृत्तांत में होरेस ब्लिकले ने 1925-26 के बीच इंडो-चाइना, मलय, जावा-सुमात्रा, सिलोन का जिक्र किया था। संभव है, होरेस ब्लिकले से पहले भी किसी ने ‘दक्षिण एशिया’ शब्द का इस्तेमाल किया हो ।

मगर एक बात है कि आज जो भी देश इसकी परिधि में हैं, उन्हें दक्षिण एशिया बोलने से कोई परहेज नहीं। खुसूसन, पाकिस्तान के बाद नेपाल जैसे मुल्क को लगता है कि हम इंडियन सब-कांटिनेट जैसे शाब्दिक सिंड्रोम से मुक्त हो गए, बल्कि 1975 में राजा वीरेंद्र वीर विक्रम शाहदेव ने अपने राज्याभिषेक के समय ‘नेपाल शांति क्षेत्र प्रस्ताव’ को लेकर आए थे। तब न दक्षिण एशिया की बात हुई थी, न एक बार भी ‘भारतीय उपमहाद्वीप’ नाम नेपाल के कूटनीतिकों ने लिया था। 80 के दशक में ‘साफ्टा’, साउथ एशियन कार रैली, साउथ एशिया यूथ अवार्ड 2007 में ‘साउथ एशियन यूनिवर्सिटी’, इन तमाम प्रयोजनों के पीछे कुछ बारीक खेल हो रहे थे, जिससे आम भारतीय का कोई लेना-देना नहीं था।

बात ये भी है कि पाकिस्तान को इतनी अकल कहां से आ गई कि वह नामांतरण की मुहिम छेड़ बैठा? उसकी जड़ों को समझने के वास्ते एक बार फिर अमरीका का रुख करना होगा। यह अमेरिकंस थे, जो चाहते थे कि इस इलाके से अंग्रेजों द्वारा दिया ‘इंडियन सब-कांटिनेंट’ शब्द की विदाई हो। 1940 से 1970 के बीच अमरीकी विदेश मंत्रालय के दस्तावेजों, फाइलों पर नोटिंग को ध्यान से देखें, तो वहां इसके प्रयास लगातार किए जा रहे थे। 1959 में अमरीकी विदेश मंत्रालय ने वर्ल्ड बैंक को भेजी एक ब्रिफिंग में ‘द सब-कांटिनेंट आफ साउथ एशिया‘ शब्द का इस्तेमाल किया था। विदेश मंत्रालय में बैठे बहुत से बाबू लोग बोलते भी हैं, ‘छोड़ो भी, नाम में क्या रखा है?’ पीछा छुड़ाने की इस मासूम अदा पर आप दुखी हैं, तो होते रहें। दुनिया ऐसे ही चलती रहेगी!
(लेखक पुष्प रंजन वरिष्ठ पत्रकार एवं सम्प्रति ईयू-एशिया न्यूज के नई दिल्ली संपादक है)

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