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सरकार के समक्ष आर्थिक सोच, समझ एवं दृष्टिकोण वाली स्पष्ट नीतियों का अभाव , निगेटिव जीडीपी से आत्मनिर्भर भारत कैसे बनायेंगे मोदी ?

सभी तरह के प्राकृतिक एवं मानवीय साधनों एवं संसाधनों की प्रचुरता वाली अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन इतनी तेजी से गिरने क्यों लगा है ,सरकार का अड़ियल रवैया इसके लिए जिम्मेदार है

डा. लखन चौधरी

यह भी एक स्वाभाविक सवाल बनता है। पिछले दशक की दुनिया की सबसे अधिक वास्तविक विकासदर वाली अर्थव्यवस्था इतनी पिछड़ने क्यों लगी है? सभी तरह के प्राकृतिक एवं मानवीय साधनों एवं संसाधनों की प्रचुरता वाली अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन इतनी तेजी से गिरने क्यों लगा है? क्या इसके लिए सरकार की गलत नीतियां, योजनाएं एवं कार्यक्रम जिम्मेदार हैं? क्या सरकार के समक्ष आर्थिक सोच, समझ एवं दृष्टिकोण वाली स्पष्ट नीतियों का अभाव है? या सरकार का अड़ियल रवैया इसके लिए जिम्मेदार है?

नोटबंदी के झटकों से देश उबरा भी नहीं था और कोरोना की मार ने देश की अर्थव्यवस्था को झकझोर कर रख दिया है। देश में चैतरफा बेरोजगारी का आलम है। जीडीपी, विकासदर, रोजगार, बाजार में मांग, निवेश आदि बुनियादी मसले अब देश की आम जनता को बुरी तरह से घेरने एवं परेशान करने लगे हैं। कोरोना की मार और नोटबंदी की वजह से देश का मध्यमवर्ग कम से कम दस साल पीछे चला गया है। चंद अमीरों एवं उद्योगपतियों को छोड़कर शेष की हालत बहुत अच्छी नहीं रह गई है। सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगधंधे अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहे हैं। खुदरा कारोबार और व्यवसाय बाजार में मांग के अभाव तथा चंद कारोबारी घरानों के एकाधिकार के कारण तबाह हो गया है। देश का युवावर्ग हताश, निराश, चिंतित और बेचैन है, क्योंकि अब उनके बेहतर एवं उज्जवल भविष्य की उम्मीदें टूटती नजर आ रही है। युवापीढ़ी में आज बेकारी, बेबसी, लाचारी का आलम इस कदर हावी है कि देश का बहुसंख्यक युवावर्ग लगातार तनाव एवं अवसाद में जी रहा है। इसके बावजूद सरकार के झूठे दावे, अहंकार एवं नासमझी ने देश के सामने सवाल खड़ा तो किया है कि क्या सचमुच अर्थव्यवस्था की हालत बहुत खराब नहीं है ? जैसा कि सरकार दावा कर रही है। जीडीपी, विकासदर, रोजगार, बाजार में मांग, निवेश आदि बुनियादी मसले सरकार को परेशान क्यों नहीं कर रहे हैं?

अप्रैल से जून 2020 की तिमाही में देश का सकल घरेलू उत्पाद जो जीडीपी के नाम से जाना जाता है, 24 प्रतिशत नीचे चला गया है, या कहें कि इस तिमाही में देश की जीडीपी में 24 प्रतिशत की कमी आई है। इसका सीधा मतलब यह है कि आने वाले समय में देश में रोजगार के अवसर और कम होंगे, घटेंगे। लोगों की प्रतिव्यक्ति आय या आमदनी कम होगी, घटेगी। देश में बेरोजगारी और बढ़ेगी। इसका सीधा प्रभाव यह होगा कि बाजार में मांग और कम होगी। उत्पादन और घटेगा, उत्पादकों का मुनाफा घटेगा इससे निवेश घटेगा, इसके कारण रोजगार के अवसर और कम होंगे। बेरोजगारी और बढ़ेगी यानि अर्थव्यवस्था की स्थिति और खराब होगी। मतलब साफ है कि आने वाले दिनों में कई तिमाहियों तक यह समस्या या संकट जारी रहने वाली है।

दरअसल अर्थव्यवस्था में यह प्रक्रिया एक चक्र के रूप में काम करता है, और देश की सारी चीजों को प्रभावित करता रहता है। इससे समूचा जनमानस प्रभावित होता है। लोगों की प्रतिव्यक्ति आय या आमदनी कम होने, घटने से लोगों का रहन-सहन, खान-पान, जीवनस्तर, उनकी जीवन की गुणात्मकता प्रभावित होती है।

जीडीपी की इस ऋणात्मक बढ़ोतरी या जीडीपी में आई भारी कमी को लेकर इस समय देश में जो बवाल मचा हुआ है, उस पर संवाद होना स्वाभाविक है, लेकिन जीडीपी के आंकड़ों को लेकर सरकार की बेफिक्री अधिक चिंता एवं दुर्भाग्य की बात है। जीडीपी के आंकड़े जारी हुए पूरे एक सप्ताह से अधिक हो चुके हैं, परंतु प्रधानमंत्री की तरफ से इस पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं आना बताता है कि अर्थव्यवस्था के मुद्दे पर सरकार कितनी गंभीर है? इससे यह भी पता चलता है कि सरकार को देश के करोड़ों युवाओं के भविष्य को लेकर कितनी चिंता है? क्योंकि जीडीपी का सीधा और प्रत्यक्ष संबंध सबसे पहले रोजगार एवं आजीविका से होता है। जीडीपी का सीधा और प्रत्यक्ष संबंध युवाओं के भविष्य एवं कैरियर से होता है। जीडीपी का सीधा और प्रत्यक्ष संबंध जनमानस के जीवनस्तर की गुणात्मकता से होता है।

आजकल जीडीपी को लेकर लोगों में जागरूकता मीडिया के कारण कुछ अधिक दिखती है, लेकिन यहां जीडीपी को लेकर सतही जानकारी ही परोसी जाती है। जीडीपी के असल मुद्दों को या तो जानबूझकर छोड़ दिया जाता है या जीडीपी के असली तथ्यात्मक मसलों को लेकर जनमानस को गुमराह किया जाता रहता है। वास्तव में जीडीपी का संबंध केवल रोजगार, विकासदर, बाजार की मांग, निवेश जैसे आर्थिक मुद्दों भर से ही नहीं होता है, बल्कि इसका प्रत्यक्ष संबंध देश के सामाजिक विकास और वहां की जनमानस की वास्तविक खुशहाली, सम्पन्नता, संवृद्धि, तरक्की, प्रगति से होती है। सकल घरेलू उत्पाद यानि जीडीपी किसी देश की अर्थव्यवस्था के विशेषकर आर्थिक प्रदर्शन का एक बुनियाद माप, मापदंड या पैमाना होता है।

प्रमुख रूप से किसी देश की भौगोलिक सीमाओं के भीतर एक वर्ष में उत्पादित अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं के बाजार मूल्य को सकल घरेलू उत्पाद यानि जीडीपी कहा जाता है। इसके अंतर्गत उस अवधि के आयात-निर्यात समायोजित होते हैं। इसी से देश की विकासदर का अंदाजा या अनुमान लगाया जाता है कि आने वाले दिनों में अर्थव्यवस्था की सेहत किस तरह रहने वाली है? रोजगार की स्थिति कैसी रहने वाली है? बाजार की हालत कैसी रहने वाली है? विकास दर कैसी रहने वाली है?

हमारी जीडीपी का मसला इस समय इसलिए अधिक चर्चा में है, क्योंकि इस समय यह दुनिया में सर्वाधिक गिरावट ऋणात्मक 24 प्रतिशत के साथ देश की पिछली 40 साल की सबसे बड़ी गिरावट है। इसका मतलब है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में आर्थिक मंदी की छाया है, लेकिन ताज्जुब की बात यह है कि सरकार इसे मानने को तैयार ही नहीं है।

पिछले कुछेक सालों में भारत ने आर्थिक मोर्चे पर उल्लेखनीय प्रगति हासिल की थी। आर्थिक क्षेत्र में देश के लोगों की प्रतिव्यक्ति आमदनी इस समय भले ही औसत रूप से दो हजार डालर या लगभग डेढ़ लाख रुपये वार्षिक अथवा लगभग 12-13 हजार रुपये मासिक है, लेकिन क्रय शक्ति समता के आधार पर देश के लोगों की प्रतिव्यक्ति आमदनी आज 8-10 हजार डालर या लगभग 6-8 लाख रुपये वार्षिक अथवा लगभग 50-65 हजार रुपये मासिक तक पहुंच चुकी थी। भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया की 5वीं सबसे बड़ी, शक्तिशाली अर्थव्यवस्था बन चुकी है, लेकिन इस तरह जीडीपी के गिरने, घटने से इस पर बुरा प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। यदि आने वाले समय में लगातार चार-पांच तिमाहियों तक इसी तरह से जीडीपी के गिरने, घटने का सिलसिला जारी रहा तो स्थिति गंभीर हो सकती है।

वैसे किसी देश के लिए 73 साल का वक्त तरक्की, प्रगति, उन्नति के हिसाब से बहुत अधिक नहीं माना जाता है, लेकिन जब वह देश अर्थव्यवस्थाओं के आकार, क्षमता एवं संभावनाओं की दृष्टि से दुनिया का 5वां बड़ा देश हो तो उम्मीदें तो अवश्य ही बढ़ ही जाती हैं। लेकिन अब विकासदर के कम होने से इस पर खराब असर पड़ने की संभावना बढ़ती दिख रही है। सरकार से सवाल-जवाब क्यों नहीं हो कि इतने सालों में इतनी संभावनाओं के बावजूद आमजन की आकांक्षाएं पूरी क्यों नहीं हो रही हैं? देश के साधनों, संसाधनों का इस्तेमाल कहां, कैसे हो रहा है? ये सवाल तो आमजन को पूछना ही चाहिए। यदि जनमानस से यह सवाल ही नहीं उठ रहा है तो भी उसके लिए क्या, कौन जिम्मेदार है? यह भी एक स्वाभाविक सवाल बनता है। पिछले दशक की दुनिया की सबसे अधिक वास्तविक विकासदर वाली अर्थव्यवस्था इतनी पिछड़ने क्यों लगी है? सभी तरह के प्राकृतिक एवं मानवीय साधनों एवं संसाधनों की प्रचुरता वाली अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन इतनी तेजी से गिरने क्यों लगा है? क्या इसके लिए सरकार की गलत नीतियां, योजनाएं एवं कार्यक्रम जिम्मेदार हैं? क्या सरकार के समक्ष आर्थिक सोच, समझ एवं दृष्टिकोण वाली स्पष्ट नीतियों का अभाव है? या सरकार का अड़ियल रवैया इसके लिए जिम्मेदार है?

असल आर्थिक मुद्दों से आम जनमानस का ध्यान हटाने के निरर्थक एवं फिजूल के मसलों को मीडिया में परोसकर सरकार न सिर्फ अर्थव्यवस्था के साथ खिलवाड़ कर रही है, बल्कि देश के 138 करोड़ आम जनमानस के सपनों, के साथ भी खेल रही है।

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