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दिल्ली में कोरोना का कहर-जीवनदायी आक्सीजन को लेकर हाहाकार, गायब हैं दिल्ली के सातों भाजपा सांसद

गोदी मीडिया केजरीवाल सरकार को तो कटघरे में खड़ा कर रहा है लेकिन सांसदों को नहीं...!

संदीप ठाकुर

दिल्ली की सातों संसदीय सीटों पर भाजपा का कब्जा है लेकिन उसके सारे सांसद राजधानी में मचे कोरोना हाहाकार के बीच लापता है। गला फाड़ फाड़ कर चीखने चिल्लाने वाले चैनल भी सांसदों को उनकी जिम्मेदारी का अहसास नहीं करा रहे हैं।

एक सांसद तो रियलिटी शो में बतौर जज दिख रहा है। ये हैं उत्तर पूर्वी दिल्ली के सांसद मनोज तिवारी। पूर्वी दिल्ली के सांसद गौतम गंभीर आईपीएल में व्यस्त बताए जाते हैं। उत्तर पश्चिम दिल्ली के सांसद हंस राज हंस तो दिल्ली की सड़कों पर आज तक नहीं दिखे।

दरअसल ये वो लोग हैं जो कर्म से राजनेता कभी नहीं रहे। ये सारे मोदी लहर में जीत गए। उन्हें अच्छी तरह पता है कि राजनीति तो करनी नहीं। क्योंकि राजनीति उनका पेशा नहीं। फिर जनता की परवाह क्यों की जाए ? कोई मरता हो तो मरे। आज तक एक भी सांसद राजधानीवासियों की खैर खबर लेने या उनकी मदद को निकल कर बाहर नहीं आया है।

आंकड़े बताते हैं कि देश के दूसरे किसी भी राज्य के मुकाबले संक्रमण की दर दिल्ली में कहीं ज्यादा है। पौने दो करोड़ की आबादी वाली दिल्ली में गत 21 अप्रैल को 25 हजार के करीब नए मामले आए और 200 से कुछ अधिक लोगों की मौत हुई। अस्पताल से लेकर श्मशान तक क्या हाल है ये दिल्ली के साथ साथ पूरा देश रोज देख रहा है। संक्रमित लोग मरीजों को लेकर सड़कों पर भटक रहे हैं और जिनके परिजनों की मौत हो गई है वे अंतिम संस्कार के लिए श्मशान घाटों के चक्कर लगा रहे हैं। अस्पतालों में आक्सीजन की आपूर्ति घंटों के हिसाब से हो रही है जिसके चलते इमरजेंसी हालात पैदा हो गए हैं। इसके लिए गोदी मीडिया केजरीवाल सरकार को तो कटघरे में खड़ा कर रहा है लेकिन सांसदों को नहीं। ऐसी आपात स्थिति में दिल्ली के चुने हुए सातों सांसद को लोगो के साथ खड़ा होना चाहिए लेकिन वे नदारद हैं।

संकट के ऐसे समय में सांसद कई तरह से लोगों की मदद कर सकते हैं। जरूरतमंदों को अस्पताल में भर्ती कराने से लेकर आक्सीजन की व्यवस्था करने या जरूरी दवाएं उपलब्ध कराने या खाने-पीने का बंदोबस्त करने या दिल्ली छोड़ कर भाग रहे प्रवासियों भरोसा दिलाने जैसे अनेक काम हैं, जो चुने हुए जनप्रतिनिधि कर सकते हैं। लेकिन कोई भी सांसद यह काम करता नहीं दिख रहा है।

प्रवासी मजदूरों का पलायन एक बार फिर से शुरू हो गया है। इनमें से अधिकांश पूरबिए हैं। पूर्वांचल का होने के नाते मनोज तिवारी उन्हें समझाने और भरोसा दिलाने का काम प्रभावी तरीके से कर सकते थे। लेकिन पूरी महामारी में तो वे कहीं नहीं ही दिखे, लाकडाउन लागू होने और आपात स्थिति बनने के बाद भी उनका अता-पता नहीं है। अलबत्ता टेलीविजन पर दो शो में वे जरूर दिखाई दे रहे हैं। एक अपराध कथा से जुड़े धारावाहिक में सूत्रधार की भूमिका निभा रहे हैं और दूसरे संगीत के एक कार्यक्रम में जज की भूमिका में दिख रहे हैं। जिस समय पूरी दिल्ली महामारी की चपेट में है उस समय उसके एक सांसद का चेहरा टेलीविजन पर धारावाहिक और रियलिटी शो में दिखाई दे तो इससे ज्यादा शर्मनाक और क्या हो सकता है। एक दूसरे सांसद हैं पूर्वी दिल्ली के गौतम गंभीर। जो इन दिनों अपने क्षेत्र और राज्य की जनता को छोड़ कर आईपीएल मैचों में विशेषज्ञ बन कर टिप्पणी करते दिख रहे हैं। एक्टर और क्रिकेटर ही नहीं हार्ड कोर नेता प्रवेश वर्मा,रमेश बिधूड़ी ,डा हर्षवर्धन भी अपने अपने क्षेत्रों में आज तक कोरोना पीड़ितों की मदद करते नहीं दिखे। सवाल है कि इनकी जिम्मेदारी नहीं बनती है क्षेत्र के जनता के प्रति ? क्या सिर्फ विधायक ही क्षेत्र की समस्याओं की सुध लेने के लिए जिम्मेदार हैं ?

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