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लगता है पत्रकारिता का इतिहास लिखने की शुरुआत हो गयी-एक खालिस पत्रकार का अपने साथियों को पत्र

कोविड के भयानक दौर में सरकार की बदइंतजामियों पर लिखना नवीन कुमार को कितना भारी पड़ा उन्हीं की जुबानी

एक खालिस पत्रकार का अपने साथियों को पत्र

प्यारे साथियों,

आज पूरा एक साल हो गया। आज ही के दिन आजतक ने मुझे अचानक निकालने का फैसला सुनाया था। संस्थान के कई नामी चेहरों ने इसका जश्न मनाया था। यह घेरकर शिकार करने का जश्न था। इसके पहले मुझे पता ही नहीं था कि लिखने से इतना फर्क पड़ता है। जिस कहानी के बाद ये फैसला लिया गया था वो 8 साल की उस आदिवासी बच्ची की कहानी थी जो लाकडाउन के बाद तेलंगाना से पैदल 108 किलोमीटर के सफर पर निकल पड़ती है और अपने घर से 8 किलोमीटर पहले दम तोड देती है।

नवीन कुमार के मुताबिक इस खबर की सजा उनको मिली
अब से साल भर पहले देशभर में लागू लॉकडाउन के समय एक 12 साल की लड़की 150 किलोमीटर का सफर पैदल ही पूरा करने का ठान लेती है। वो तेलंगाना से अपने घर छत्तीसगढ़ का सफर तय करने निकलती है। लेकिन मंजिल से 50 किलोमीटर पहले ही उसकी मौत हो जाती है। ये लड़की छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले की थी। तेलंगाना में काम के लिए गई थी। थकावट और डिहाइड्रेशन से बच्ची की मौत हुई।
अधिकारियों का कहना था कि पीड़ित जमलो मकदाम राज्य के प्रवासी श्रमिकों के एक समूह का हिस्सा थी, जो तेलंगाना के कन्नागुडा गांव में मिर्च के खेतों में काम कर रहे थे। लॉकडाउन और परिवहन के सभी साधनों के बंद होने के बाद उन सभी ने लगभग 150 किलोमीटर लंबी दूरी की पैदल यात्रा करने का फैसला किया। जमलो और अन्य लोगों ने कथित तौर पर 15 अप्रैल को अपनी यात्रा शुरू की। तीन दिन चलने के बाद 18 अप्रैल की सुबह छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में भंडारपाल गांव के पास उनकी मृत्यु हो गई।
घर से 50 किलोमीटर पहले मौत
मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी बीआर पुजारी ने बताया, ‘तेलंगाना की उस जगह और बीजापुर के बीच की दूरी 150 किलोमीटर है और वह अपने पैतृक गांव से करीब 50 किलोमीटर दूर थी, जब उसने दम तोड़ दिया। शनिवार सुबह उसने भोजन किया लेकिन फिर पेट में दर्द और बेचैनी की शिकायत हुई और सुबह 10 बजे के आसपास उसकी मौत हो गई।’

आजतक की पत्रकारिता में यह आपराधिक था। कमाल ये कि मुझे निकालने की ड्राफ्टिंग के लिए उन्हें अपनी भारी भरकम लीगल टीम को लगाना पड़ा था। कोविड के भयानक दौर में सरकार की बदइंतजामियों पर लिखना उन्हें पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों के खिलाफ लगा था। क्योंकि ये सत्ता में शीर्ष पदों पर बैठे लोगों को असहज करता था। मैं उनकी हिंदू मुस्लिम पत्रकारिता के लिए अनफिट हूं ये तो पता था लेकिन अरुण पुरी की कंपनी इंसानियत के बुनियादी उसूलों के भी खिलाफ है इसका इलहाम नहीं था। हमेशा लगता था कि दंगापरस्तों और जातिवादियों से भरे न्यूजरूम में वो दो चार मिसफिट लोगों को तो बर्दाश्त कर ही लेंगे।

आज आजतक खुद मरकज बना हुआ है। जमात से बहुत बड़ा। मुसलमानों को देशद्रोही बताने वाले उसके कई चेहरे बीमारी के विस्तार के सूत्रधार बन चुके हैं। लेकिन वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति। सालभर बाद देश के हालात पहले से कहीं ज्यादा भयावह हैं। अस्पतालों की हालत पहले से ज्यादा बुरी है। सड़कों पर जारी हृदयविदारक मौतें सरकार के मुकम्मल तौर पर नाकाम हो जाने का ऐलान कर रहे हैं। लेकिन टीवी चैनलों ने इसकी तरफ से आंखें मूंद रखी हैं। वो सुप्रीम कमांडर पर सवाल उठाने में कांप रहे हैं। यह पूरी इंसानियत के साथ अपराध है। इसकी कोई माफी नहीं हो सकती। टीवी पत्रकारिता का जब इतिहास लिखा जाएगा तो आज के संपादकों और मालिकों को अपराधियों की तरह दर्ज किया जाएगा। लोग उनसे नफरत करेंगे। एक आका को बचाने में वो मानवता के गिद्ध में तब्दील होते चले गए।

एक ताकतवर माध्यम कैसे कमजोर लोगों के हाथ में पड़कर जनता के खिलाफ खड़ा हो जाता है इसका जारी उदाहरण है आज का टीवी। मरना तो सबको है। लेकिन जिन्हें अमर बनाने के लिए वो मानवता को रौंदे जाने का तमाशा देख रहे हैं ये बात याद रखी जाएगी। दर्ज की जाएगी। ये केवल आजतक या जी न्यूज या रिपब्लिक टीवी का मामला नहीं है। इनके बुनियादी आचरणों में कोई अंतर नही। लाशों के बीच आका के लिए सोहर गाने के लिए होड़ मची हुई है।

मैं शुक्रगुजार हूं कि आजतक ने मुझे निकालकर मेरे मन से अनिश्चितता के डर को निकाल फेंका। यह एक ऐसी मुक्ति थी जिसने मुझे मानवता का अपराधी होने से बचा लिया। इस एक साल में जिंदगी, पत्रकारिता और सत्ता के दस्तूर को बहुत करीब से जानने का मौका मिला। लगता है इतना कुछ था करने को, सोचने को, देखने को, पढ़ने को। मैने ये सब लालाओं की खुशी पर न्योछावर कर दिया था। कई बार असहमत होने का अधिकार बचाने के लिए आपको बीसियों साल की सफलताएं 20 सेकंड में छोड़ देनी पड़ती हैं। ये वही दिन था। मैने कभी नही सोचा था मैं टेलीविजन में नहीं रहूंगा। आप इसे मेरा गुरूर कहें या आत्मविश्वास लेकिन जिस पल आजतक ने चिट्ठी भेजकर मेरी ईमेल आईडी ब्लाक की मैं समझ गया था कठिन फैसले की घड़ी आ गई। पता नही क्यों उस दिन भी डर बिल्कुल नहीं लगा था। कुछ लोगों पर दया आई थी। क्योंकि जिन्हें मैं नियंता समझ रहा था वो कठपुतली के सिवा कुछ नहीं थे। पता चला कि व्यक्तिगत संबंधों और सदाचार को भी वो कारपोरेट हितों के लिए होम कर देते हैं।

मैंने आजतक के अनैतिक और झूठे आरोपों के विरोध में और पत्रकारिता के बचाव में लगभग 80 पन्ने की एक चिट्ठी भेजी थी। उस चिट्ठी में मैंने बाबा साहेब, नेहरू, गांधी, जेफरसन समेत कई विद्वानों के उद्धरण दिए थे। उसका जवाब न आना था न आया। लेकिन मुझे लगता है कि उसे अब बहस के केंद्र में लाया जाना चाहिए। दुनिया से पारदर्शिता की उम्मीद पालने वालों की करतूतें छिपी क्यों रहें? बहुत कुछ है लिखने को। और लिखा जाएगा। इसमें कई ऐसे चेहरे भी आयेंगे जो आज देवता बने हुए हैं लेकिन वो पूरे माध्यम को ही भ्रष्ट बना देने के गुनहगार हैं। पिछले कुछ दिनों से बीमार हूं। स्वस्थ होने के बाद सिलसिलेवार तरीके से बातचीत के दायरे को बड़ा किया जाएगा।

अंत में सिर्फ इतना कि जब मौत का डर निकलता जा रहा है तो व्यक्तियों और संस्थानों का डर निकाल दीजिए। मनुष्यता के पक्ष में यही आपका योगदान होगा। यहां पाश याद आते हैं।
हम लड़ेंगे साथी, उदास मौसम के लिए
हम लड़ेंगे साथी, ग़ुलाम इच्छाओं के लिए
हम चुनेंगे साथी, ज़िन्दगी के टुकड़े
हथौड़ा अब भी चलता है, उदास निहाई पर
हल अब भी चलता है चीख़ती धरती पर
यह काम हमारा नहीं बनता है, सवाल नाचता है
सवाल के कन्धों पर चढ़कर
हम लड़ेंगे साथी
क़त्ल हुए जज़्बों की क़सम खाकर
बुझी हुई नज़रों की क़सम खाकर
हाथों पर पड़े गाँठों की क़सम खाकर
हम लड़ेंगे साथी
हम लड़ेंगे तब तक
जब तक वीरू बकरिहा
बकरियों का पेशाब पीता है
खिले हुए सरसों के फूल को
जब तक बोने वाले ख़ुद नहीं सूँघते
कि सूजी आँखों वाली
गाँव की अध्यापिका का पति जब तक
युद्ध से लौट नहीं आता
जब तक पुलिस के सिपाही
अपने भाइयों का गला घोंटने को मज़बूर हैं
कि दफ़्तरों के बाबू
जब तक लिखते हैं लहू से अक्षर
हम लड़ेंगे जब तक
दुनिया में लड़ने की ज़रूरत बाक़ी है
जब बन्दूक न हुई, तब तलवार होगी
जब तलवार न हुई, लड़ने की लगन होगी
लड़ने का ढंग न हुआ, लड़ने की ज़रूरत होगी
हम लड़ेंगे
कि लड़े बग़ैर कुछ नहीं मिलता
हम लड़ेंगे
कि अब तक लड़े क्यों नहीं
हम लड़ेंगे
अपनी सज़ा कबूलने के लिए
लड़ते हुए मर जाने वाले की
याद ज़िन्दा रखने के लिए
हम लड़ेंगे साथी
इंकलाब जिंदाबाद

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