दृष्टिकोणपहला पन्नाराष्ट्रीयस्वास्थ्य

सरकार और मीडिया का पूरा ध्यान पर सिर्फ़ एलोपैथी पर केन्द्रित है, होम्योपैथी के सिद्धान्तों पर नहीं

जहाँ घोषित किया जा चुका है कि कोरोना की कोई दवा अभी तक बनी ही नहीं है, मरीज़ों को वहीं ले जाया जाएगा l एलोपैथी के चिकित्सकों को होम्योपैथी के सिद्धान्तों का भी परिचय कराया गया होता तो आज कोरोना में एक भी व्यक्ति के मरने का सवाल ही पैदा नहीं होता कोरोना जैसी महामारी को सबसे बेहतर तरीक़े से होम्योपैथी, नेचुरोपैथी और कुछ हद तक आयुर्वेद मिलकर हरा सकते हैं। होम्योपैथी के हिसाब से देखें तो यो यह जानलेवा बीमारी है ही नहीं और इस नाते यह महामारी भी नहीं है।

संत समीर

एक ख़ुराक का जादू—-(Miracle of minimum dose)(कोरोना से बचने का हल्दी वाला आसान घरेलू नुस्ख़ा बता दिया तो फेसबुक ने मेरी पोस्ट डिलीट कर दी और चौबीस घण्टे तक पोस्ट और टीका-टिप्पणी करने पर पाबन्दी लगा दी। ग़नीमत है कि फेसबुक पेज पर अभी वह सलामत है। अब पाबन्दी हटी है, तो बात तो मैं करूँगा, पर कोशिश रहेगी कि जनता जनार्दन समझ जाए, पर ’फेसबुक कम फेकबुक ज़्यादा’ के अति समझदार कर्ताधर्ताओं के सिर से ऊपर से गुज़र जाए या उन्हें अपनी गाइडलाइन के अनुकूल लगे। ख़ैर, आज एक वाक़या पढ़िए, ताकि होम्योपैथी के प्रति रुचि जगे और लोग सेहत की आसान राह चुनें।)

एक ख़ुराक का जादू- (Miracle of minimum dose)
पहली बार कोरोना में होम्योपैथी की उस दवा का प्रयोग मैंने किया, जिसके बारे में सोचा नहीं था कि इसकी कभी ज़रूरत पड़ेगी। एक मरीज़ की तबीयत दस-बारह दिनों से ख़राब थी। एलोपैथी की दवाएँ चल रही थीं। बुख़ार कभी कम तो कभी ज़्यादा। एक स्थिति के बाद बलग़म में ख़ून जाना शुरू हो गया। एलोपैथी डाक्टर अन्दाज़ा लगा सकते हैं कि इसके बाद क्या-क्या हो सकता है। चिन्ता बढ़ी तो मरीज़ को मेरे पास लाया गया। मैंने लक्षण पूछे और जो दवा समझ में आई, उसकी दो बूँद की एक ख़ुराक जीभ पर सीधे टपका दी। तीन-चार घण्टे बाद मरीज़ के यहाँ से सूचना मिली कि ख़ून जाना एकदम बन्द हो गया है और मरीज़ अच्छा महसूस कर रहा है। दूसरी ख़ुराक की ज़रूरत नहीं पड़ी। इसे ही कहते हैं कि मिरैकल आफ मिनिमम डोज़ कि ज़रा-सी ख़ुराक का जादू।

अब सुनिए कि किन लक्षणों के आधार पर मैंने क्या दवा दी। इसे ठीक से वे ही समझ पाएँगे, जिन्हें होम्योपैथी की ठीक समझ है। कृपया इसे नुस्ख़ा मानकर किसी बीमारी में प्रयोग न करें, क्योंकि होम्योपैथी का विज्ञान एलोपैथी से ठीक उलटा है और अगर एलोपैथी स्टाइल में होम्योपैथी दवाओं का बिना सोचे-समझे प्रयोग किया जाएगा तो जीवन को ख़तरे में डालने जैसा होगा। यह बहुत बड़ा भ्रम है कि होम्योपैथी में साइड-इफेक्ट नहीं होते। यह ज़रूर है कि आप होम्योपैथी को समझते हैं तो इसका साइड-इफेक्ट स्पष्ट सङ्केत देता है और आप ख़तरे से बच सकते हैं। बहरहाल, याद रखना चाहिए कि होम्योपैथी दवाएँ जान बचा सकती हैं तो जान ले भी सकती हैं, क्योंकि उनका परीक्षण ही इसी आधार किया गया है कि वे स्वस्थ आदमी के शरीर में क्या लक्षण पैदा करती हैं। मसलन, जो दवा मैंने सिर्फ़ एक ख़ुराक में इस्तेमाल की, अगर फ़ायदा देखकर, और फ़ायदा लेने के चक्कर में, कोई इसकी कई ख़ुराकें खा लेता है, तो इसका ठीक उलटा भी हो सकता है और उसका जीवन ख़तरे में पड़ सकता है।
ख़ैर, मैंने मरीज़ में ये लक्षण देखे–
लक्षण
1. बलग़म में ख़ून
2. नींद से जागने पर अच्छा महसूस होना

यों और भी लक्षण मैंने पूछे, पर इन दो के आधार पर फास्फोरस-200 की दो बूँदें जीभ पर टपकाईं और कुछ देर बाद चमत्कार सामने आ गया।
होम्योपैथी में ऐसे कमाल अक्सर होते हैं। देर से काम करने का तर्क सही नहीं है। बात बस इतनी है कि मरीज़ ने सही लक्षण बताएँ हों और डाक्टर ने उनके आधार पर सही दवा चुनी हो। इस पैथी में सम्भावना बहुत है। दुर्भाग्य से जो शोध हनीमैन, हेरिङ्ग, नैश, केण्ट, बोरिक जैसे पुराने लोग कर गए, नए होम्योपैथी वाले उसी के आसपास घूम रहे हैं। इधर के लोगों में आर. एस. पाठक-जैसे कुछ गिनेचुने ही हैं, जिन्होंने बायोकैमी वग़ैरह पर रिपर्टरी बनाने जैसा कुछ आगे का काम किया है।

सच्चाई तो यह है कि करोड़ों-अरबों रुपये जिस तरह से एलौपैथी पर ख़र्च किए जा रहे हैं, अगर उसका हज़ारवाँ हिस्सा भी सरकार होम्योपैथी पर ख़र्च कर दे तो देश में बस दस-बीस प्रूविङ्ग सेण्टर (परीक्षण केन्द्र) बनाने होंगे और साल-दो साल के भीतर तमाम असाध्य बीमारियों की भी आसान दवाएँ सामने आ सकती हैं। सिर्फ़ एलौपैथी को चिकित्सा का परम विज्ञान मानना मूर्खता नहीं, महामूर्खता है, बल्कि विज्ञान के नाम पर सबसे बड़ा अन्धविश्वास है। एलोपैथी महान् चिकित्सा पद्धति है, इसने आपात्काल (इमर्जेंसी) के प्रबन्धन की सबसे कारगर व्यवस्था दी है, पर सोचने की बात है कि देश के दस-बारह लाख सूचीबद्ध एलोपैथी डाक्टर मिलकर भी दावा नहीं कर सकते कि उन्होंने किसी एक भी मरीज़ के मधुमेह, अस्थमा, थायरायड, बीपी, आर्थराइटिस या हृदय की बीमारी को पूरी तरह ठीक किया है। अगर ज़िन्दगी भर दवा खाने की मजबूरी है तो इसे ठीक होना नहीं कह सकते। ठीक होना यह होता है कि मरीज़ ने कुछ दिन दवा खाई और फिर दवा की ज़रूरत पूरी तरह ख़त्म हो गई।

काश, एलोपैथी के चिकित्सकों को होम्योपैथी के सिद्धान्तों का भी परिचय कराया गया होता तो आज कोरोना में एक भी व्यक्ति के मरने का सवाल पैदा नहीं होता। विज्ञान की अवैज्ञानिक समझ के चलते ही हाल यह है कि जहाँ दवा है, वहाँ इलाज नहीं किया जाएगा और जहाँ घोषित किया जा चुका है कि कोरोना की कोई दवा अभी तक बनी ही नहीं है, मरीज़ों को वहीं ले जाया जाएगा।

 

   मेरी एक अपील है!

किसी भी पद्धति के चिकित्सक हों, यदि वे सेहतमन्द समाज के आकांक्षी  हैं तो उन्हें एक साथ खड़े होना चाहिए। होम्योपैथों को अपना एक प्रभावी संगठन बनाना चाहिए और आवाज़ उठानी चाहिए। फार्मा कम्पनियों और विश्व स्वास्थ्य सङ्गठन की मूर्खताओं के आगे दबने की ज़रूरत नहीं है। कोरोना जैसी महामारी को सबसे बेहतर तरीक़े से होम्योपैथी, नेचुरोपैथी और कुछ हद तक आयुर्वेद मिलकर हरा सकते हैं। होम्योपैथी के हिसाब से देखें तो यो यह जानलेवा बीमारी है ही नहीं और इस नाते यह महामारी भी नहीं है। होम्योपैथी का जादुई नतीजा मैं रोज़ देख रहा हूँ, पर दुर्भाग्य कि सरकार और मीडिया का पूरा ध्यान पर सिर्फ़ एलोपैथी पर केन्द्रित है। होम्योपैथी और प्राकृतिक चिकित्सा (इसे आयुर्वेद का अङ्ग समझें) पर ठीक से ध्यान दिया गया होता तो एक भी व्यक्ति के सामने मरने की नौबत नहीं आती। मैं बार-बार यही कह रहा हूँ कि यह मारक वायरस नहीं है, सामान्य फ्लू से ज़्यादा ख़तरनाक भी नहीं है, पर चूँकि इसके हिसाब से एलोपैथी में कोई दवा नहीं बन पाई है तो जो कुछ भी दवा के नाम पर दिया जा रहा है, उससे कई बार मरीज़ का नुक़सान हो रहा है। जानें कोरोना की वजह से नहीं, इसके ग़लत इलाज की वजह से जा रही हैं। हमारे विद्यालयों में स्वास्थ्य की बुनियादी बातें भी पढ़ाई गई होतीं तो भी इस तरह हाहाकार की स्थिति न बनती।

दरअसल चिकित्सा अब धन्धा है। डाक्टरी पढ़ने के लिए लाखों की फीस चुकाने का मतलब ही है कि इससे बाद में पैसा कमाया जाना है, यानी यह स्थापित धन्धा है। कोई भी धन्धा चलाए रखने के लिए ग्राहक का होना ज़रूरी है। मरीज़ ग्राहक है। अगर ग्राहक न हो तो धन्धे का क्या होगा? सारे लोग सेहतमन्द हो जाएँ तो डाक्टरों की इतनी बड़ी सङ्ख्या की ज़रूरत कहाँ रह जाएगी? मतलब यह कि बाज़ार आधारित आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की बुनियाद इस बात पर खड़ी की गई है कि आप पूरी तरह स्वस्थ न होने पाएँ। आप मरने की हद तक भी न जाएँ, पर जीवन भर बीमारियों का सिलसिला चलता रहे, ताकि डाक्टरों, अस्पतालों और दवा कम्पनियों का कारोबार चलता रहे। भारत की परम्परा में चिकित्सा कभी व्यवसाय नहीं रहा है। वैद्य का धर्म था कि वह किसी मरीज़ को देखने जाए तो उसके यहाँ पानी भी माँगकर न पिए, क्योंकि वह मुश्किल में पड़े व्यक्ति को सेवा देने गया है, उससे सेवा लेने नहीं। समाज का दायित्त्व था कि वह वैद्य की आजीविका का प्रबन्ध करे, पर अब वैसा समाज नहीं रहा तो वैसा चिकित्सक भी कैसे रहेगा?

हमारे विशेषज्ञगण जनता की जान बचाने के नाम पर सरकार को ऐसी ग़लत सलाहें दे रहे हैं, जिनका बीते साल भर में एक भी अच्छा नतीज़ा नहीं निकला है। जान बचाने की चिन्ता होती तो हर पैथी के विशेषज्ञों को एक साथ खड़ा किया जाता और समाधान तलाशा जाता। उलटे हुआ यह है कि पिछले साल जब भोपाल के एक होम्योपैथी मेडिकल कालेज ने कोरोना मरीज़ों को तीन-चार दिन में ठीक करना शुरू किया और प्रेस रिलीज देनी शुरू की तो एलोपैथी डाक्टरों ने उनके ख़लिफ़ सड़क पर प्रदर्शन किया कि आख़रि होम्योपैथी वालों को कोरोना मरीज़ों को देखने की छूट क्यों दी जा रही है! बात-बात में महात्मा गान्धी के नाम की दुहाई देने वालों को क्या एक बार भी ध्यान नहीं आया होगा कि सौ साल पहले प्लेग-जैसी मौत का पर्याय बन चुकी महामारी में गान्धी ने बिना कोई दवा दिए सिर्फ़ प्राकृतिक चिकित्सा के सहारे तमाम मरीज़ों की जान बचा ली थी।

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