स्वास्थ्य

रोहित सरदाना कोरोना से नहीं, कोरोना के ग़लत इलाज से मरे , टीवी चैनल और अख़बार लोगों को डरा-डराकर ‘पैनिक’ बनाने में लगे हुए हैं- संत समीर

इस बात की ख़बरें नहीं दी जा रहीं कि देश में कुछ लोग आसान तरीक़ों से मरीज़ों को बड़े आराम से पूरी तरह ठीक कर रहे हैं। दो-चार दिन भी ये चैनलवाले हमारे जैसे लोगों के तरीक़ों से ठीक हो रहे मरीज़ों को स्क्रीन पर दिखा दें, तो देश से सारा डर समाप्त हो जाएगा और लोगों को विश्वास होने लगेगा कि सङ्क्रमण कितना भी तेज़ हो, पर यह आसानी से ठीक होने वाली बीमारी है, रोहित सरदाना ठीक हो रहे थे, पर उन्हें हार्ट अटैक आ गया था। ज़ाहिर है, जो घबराहट का माहौल मीडिया बनाए हुए है, वह रोहित जैसे जुझारू पत्रकार पर भी हावी था।

चौथा अक्षर संवाददाता
नई दिल्ली

एक तरफ़ टीवी चैनल और अख़बार लोगों को डरा-डराकर ‘पैनिक’ बनाने में लगे हुए हैं और दूसरी तरफ़ हमारे जैसे गिनती के लोग हैं, जिनकी आवाज़ दबा दी जा रही है। इस बात की ख़बरें नहीं दी जा रहीं कि देश में कुछ लोग आसान तरीक़ों से मरीज़ों को बड़े आराम से पूरी तरह ठीक कर रहे हैं। दो-चार दिन भी ये चैनलवाले हमारे जैसे लोगों के तरीक़ों से ठीक हो रहे मरीज़ों को स्क्रीन पर दिखा दें, तो देश से सारा डर समाप्त हो जाएगा और लोगों को विश्वास होने लगेगा कि सङ्क्रमण कितना भी तेज़ हो, पर यह आसानी से ठीक होने वाली बीमारी है। यह बात संत समीर ने अपने सोसल मीडिया में प्रकाशित अपने एक लेख में कही।

उन्होने कहा कि अगर यह बात समझ में आ जाए कि कोरोना की वजह से नहीं, उन एलोपैथी दवाओं की वजह से लोग मर रहे हैं, जो भले ही इस बीमारी में दी जा रही हैं, पर वास्तव में इस बीमारी के हिसाब से बनाई नहीं गई हैं तो हालत सँभल जाएगी। बात इसकी ही नहीं है, असल में किसी भी बीमारी में दूसरी बीमारी की दवाएँ देना शुरू कर दीजिए, तो हाल कुछ ऐसा ही होता हुआ दिखाई देगा। मान लीजिए कि साधारण सर्दी-ज़ुकाम-बुख़ार हो और उसे रहस्यात्मक बनाकर राष्ट्रीय घोषणा कर दी जाय कि पता नहीं कैसी सर्दी-ज़ुकाम वाली अजीब बीमारी आ गई है, जिसकी कि कोई दवा ही समझ में नहीं आ रही है, तो उसमें भी लोगों के सामने मुसीबत आनी शुरू हो जाएगी। ट्रायल के तौर पर भाँति-भाँति की दवाएँ दी जाएँगी और कई लोगों की हालत गम्भीर होने लगेगी। मामला फेफड़े और साँसों से जुड़ा हो तो अनाप-शनाप दवाओं का दुष्परिणाम बहुत जल्दी दिखाई देगा।

बहरहाल, समस्या है, पर यदि आसानी से ठीक करने वाली विधियों पर, और इस तरह से मरीज़ों को मुसीबत से उबार रहे लोगों पर ये चैनल वाले बात करें तो इन ख़बरों के दिखाने मात्र से आमजन के मन से भय ख़त्म होने लगेगा और आधी मौतें तो यों ही कम हो जाएँगी।

दरअसल, बात मुझे कुछ और करनी है। मैं अपनी क्षमता भर लोगों को बचाने में लगा हुआ हूँ। अक्सर ऐसा होता है कि रात में दो-ढाई घण्टे नींद मिलनी भी मुश्किल हो जाती है। इतने पर भी हाल अजीब है। जिससे बात हो गई, उसकी तो कोई बात नहीं, पर जिसका फ़ोन नहीं उठ पाया, वह नाराज़ होने लगता है। कल एक सज्जन ने मन ख़राब करने वाली टिप्पणी की। ये हैं कोई वीके सिंह जी। इनकी कई महीने पहले की कोई बीमारी है। इन्होंने टिप्पणी में एलोपैथी वाले अन्दाज़ में अपनी बीमारी की कुछ बातें लिख दी हैं और चाहते हैं कि फटाफट मैं कोई नुस्ख़ा उन्हें बता दूँ। होम्योपैथी में लक्षणों को गहराई से समझना और मिलाना पड़ता है। वैसे भी इन दिनों मैं कोरोना वालों को ही पूरी तरह नहीं समय दे पा रहा हूँ, जाने कितने लोगों के फ़ोन उठाने की नौबत ही नहीं आ पाती, फिर भी मैंने इन सज्जन को लिख दिया कि आप पूरे लक्षण लिखकर व्हाट्स एप कर दें, वक़्त मिलने पर देखूँगा। एक तो इन्होंने लक्षण ठीक से नहीं लिखे, दूसरे एक-दो दिन जवाब नहीं मिला तो नाराज़ हो गए। लिखा कि मैं शुल्क न मिलने की वजह से उनको जवाब नहीं दे रहा हूँ।

ऐसे लोगों से मैं यही कहूँगा कि आपका अपनी बीमारी के लिए चिन्तित होना स्वाभाविक है, लेकिन मेरे पास भी कोई अलादीन का चिराग़ नहीं है। मैं नाराज़ क़तई नहीं हूँ, लेकिन मेरी प्रतिक्रिया बहुत तीखी हो सकती है। अनर्गल आरोप मढ़ने से पहले एक-दो बार सोच लिया होता। आपको अपनी शारीरिक बीमारी से पहले अपनी मानसिक बीमारी का इलाज कराने की ज़रूरत है। अगर इलाज करने के लिए मैं शुल्क लेने के चक्कर में होता तो फेसबुक पर खुलेआम मेहनत करके बनाए अपने नुस्ख़ों को यों ही सबको न बताता फिरता। मुझे पता है कि बीते साल भर में मेरे बताए कई नुस्ख़ों को कुछ लोगों ने अपने नाम से प्रचारित किया है और लाखों कमाने की जुगत कर ली है, फिर भी मैंने किसी का बुरा नहीं माना है और निरन्तर काम की बातें बताने की कोशिश करता रहता हूँ। मैं मानता हूँ कि कुछ आयुर्वेदिक नुस्ख़ों को भले ही मैं अपना बनाया हुआ कह दूँ, पर होम्योपैथी वग़ैरह की अन्यान्य दवाएँ कोई मेरी बनाई हुई नहीं हैं। अतीत के महान् चिकित्सकों की मेहनत को आड़ा-टेढ़ा करके कोई अपने नाम पर दर्ज करने की कोशिश करे तो इसे मैं मूर्खता और अतीत के चिकित्सा विज्ञानियों के प्रति कृतघ्नता ही कहूँगा। मज़ा तो यह कि इन महोदय ने अपना फ़ोन नम्बर टिप्पणी में लिखा है, जैसे कि मुझे ज़िम्मेदारी सौंपी गई है कि मैं ही इन्हें फ़ोन करूँ। कोई मुसीबत में पड़ा हो तो मुझे किसी को भी फ़ोन करने में कोई परेशानी नहीं है, पर मेरा नम्बर सार्वजनिक होते हुए भी कोई ऐसी उम्मीद करे तो उससे मैं बस माफ़ी माँग लेना पसन्द करूँगा।

इस महामारी के मामले में शुरू से साबित होता रहा है कि एलोपैथी की तुलना में होम्योपैथी और नेचुरोपैथी में इसका इलाज बहुत आसान है, पर दवा और वैक्सीन के खेल ने आसान इलाज को किनारे कर दिया। मैं आज भी कह रहा हूँ कि जिन भी लोगों के लिए कहा जा रहा है कि कोरोना ने उनको निगल लिया, वे सब-के-सब वास्तव में ग़लत दवाओं और घबराहट की वजह से मारे गए हैं। ग़लत दवा इसलिए कि एलोपैथी वाले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि कोरोना की कोई सही दवा अभी तक उनके पास नहीं है।

 

कुँवर बेचैन, रोहित सरदाना को जो इलाज दिया जा रहा था, उस पर ध्यान दीजिए, तो समझ में आएगा कि वे कोरोना से नहीं, कोरोना के ग़लत इलाज से मरे। रोहित सरदाना ठीक हो रहे थे, पर उन्हें हार्ट अटैक आ गया था। ज़ाहिर है, जो घबराहट का माहौल मीडिया बनाए हुए है, वह रोहित जैसे जुझारू पत्रकार पर भी हावी था। इतना वक्त नहीं है, नहीं तो समझाता कि कैसे मौत के मुँह में गए मरीज़ के ‘प्रिस्क्रिप्शन’ में ही उसके प्राणहरण की कहानी छिपी है। डरावना माहौल, कोविड सेण्टरों में मरीज़ों को रामभरोसे छोड़ दिया जाना और ग़लत इलाज दशा को गम्भीर बनाने वाले सबसे बड़े कारक हैं। कड़ी भाषा के प्रयोग से बचना चाहता हूँ, पर टीवी चैनलों पर जिस तरह से आसान इलाज से आसानी से ठीक हो रहे मरीज़ों की कहानियाँ दिखाने के बजाय, हर दिन सब कुछ को बस खौफ़नाक बनाकर पेश किया जा रहा है, उसको देखकर यही मन करता है कि स्पष्ट कहूँ कि असली हत्यारे की भूमिका में हमारे मीडिया के लोग हैं। लगभग दो लाख मौतों में से कम-से-कम डेढ़ लाख मौतों का कारण मीडिया का फैलाया हुआ यह डर ही है।

ख़ैर, मेरी आक्सीजन स्तर ठीक करने वाली पोस्ट ने बहुत लोगों को फ़ायदा पहुँचाया है। कई लोग आईसीयू से बाहर आ गए हैं। नए अनुभवों के आधार पर इस नुस्ख़े को मैंने और प्रभावी बनाया है। वक़्त मिलते ही लिखूँगा। सचमुच आक्सीजन सिलेण्डर के लिए भागदौड़ मचाने की ज़रूरत नहीं है। इलाज के पूरे तरीक़े को भी एक-दो दिन में समय मिलते ही और स्पष्ट करने की कोशिश करूँगा, ताकि मेरे पास फ़ोन करने के बजाय कुछ स्थितियों को लोग ख़ुद सँभाल लें। बस निवेदन इतना है कि किसी नुस्ख़े को हूबहू वैसे ही करना है, जैसे कि उसे लिखा गया हो। होम्योपैथी इलाज को एलोपैथी स्टाइल में कृपया न करें, वरना फ़ायदा न होने पर बेवजह होम्योपैथी को कोसते रहेंगे।

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