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और जेल में ही व्यवस्था के हाथों ‘मार डाले गये’ फ़ादर स्टेन स्वामी !

कोर्ट ने उन्हें उस दिन अंतरिम जमानत नहीं दी और अब कोर्ट के पास उन्हें देने के लिए कुछ भी नहीं बचा था अंतरिम जमानत भी नहीं । आज उनकी जेल में मौत हो गयी..। हाईकोर्ट में सुनवाई चल रही थी सुनवाई के दौरान स्टेन स्वामी के वकील ने कहा कि बड़े भारी मन से कोर्ट को सूचित करना पड़ रहा है कि फादर स्टेन स्वामी का निधन हो गया है।

श्याम लाल शर्मा
मुम्बई

स्टेन स्वामी ! एक 84 साल के बुजुर्ग शख्स भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में शामिल होने और नक्सलियों के साथ संबंध होने के आरोप में सरकार यूएपीए कानून के तहत गिरफ्तार करती है, न कभी वह भीमा कोरेगांव गए न उनकी उस घटना में कोई सहभागिता थी इसके बावजूद उन्हें 2018 से लगातार जेल में रखा गया ….आज ही स्टेन स्वामी की जमानत याचिका पर सुनवाई होनी थी। हाईकोर्ट में सुनवाई चल रही थी सुनवाई के दौरान स्टेन स्वामी के वकील ने कहा कि बड़े भारी मन से कोर्ट को सूचित करना पड़ रहा है कि फादर स्टेन स्वामी का निधन हो गया है। पिछली सुनवाई के वक्त भी कोर्ट की बात उनको समझाने के लिए एक आदमी को उनके साथ बिठाना पड़ा था, कोर्ट ने दर्ज़ किया है कि वे सुन पाने की भी हालत में तब ही नहीं थे। कोर्ट उन्हें जेजे अस्पताल भेजने को कह रही थी और वे अंतरिम जमानत मांग रहे थे। फादर स्टेन स्वामी को जेल में आठ महीने तक लगातार स्वास्थ्य गिरते जाने के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया था। कोर्ट ने उन्हें उस दिन अंतरिम जमानत नहीं दी और अब कोर्ट के पास उन्हें देने के लिए कुछ भी नहीं बचा था अंतरिम जमानत भी नहीं । आज उनकी जेल में मौत हो गयी..।

84 साल के आदमी को महामारी के दौर में किसी सबूत के बगैर लगातार जेल में रखना कितना बड़ा गुनाह है! स्टैन स्वामी की मौत एक हत्या है..जिसकी असली मुजरिम भारत सरकार है लेकिन हम लोग इस हत्या में सहभागीदार हैं…पार्किसन्स और कोरोना बीमारी से घिरे एक मानवाधिकार कार्यकर्ता के क़रीब मौत को पल-पल आता हुआ हम लोग देखते रहे…और कुछ नहीं कर सके। भारत अब ऐसे व्यवस्थागत-गुनाहां का ख़तरनाक द्वीप बनता जा रहा है! गरीब लोगों को न्याय दिलाने के लिए आजीवन संघर्ष किया पर लोकतांत्रिक कहे जाने वाले इस मुल्क के व्यवस्था ने उनके साथ सरासर अन्याय किया! फ़ादर स्टेन स्वामी की उम्र और बीमारी को देखते हुए देश भर के तमाम मानवाधिकारवादी और सामजिक कार्यकर्ता उन्हें रिहा करने की माँग कर रहे थे, लेकिन सरकार पर कोई असर नहीं हुआ।

गौरतलब है कि भीमा कोरेगांव केस में देश के विभिन्न बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को यूएपीए के तहत गिरफ्तार किया गया था। इन गिरफ्तारियों का दुनिया भर के मानवाधिकार कार्यकर्ता विरोध करते रहे हैं और आरोपों को मनगढ़ंत व झूठे कहते रहे हैं। एनआईए ने 2018 के भारत के सबसे बुजुर्ग शख़्स जिन पर आतंकवाद का आरोप लगाया गया और भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में शामिल होने के आरोप में 16 लोगों को जेल भेजा गया है. इनमें सामाजिक कार्यकर्ता, वकील, शिक्षाविद, बुद्धिजीवी शामिल हैं स्टेन स्वामी भी इन 16 लोगो मे शामिल थे फादर स्टेन स्वामी 1991 में तमिलनाडु से झारखंड आए ओर आने के बाद से ही वह आदिवासियों के अधिकारों के लिए काम करते रहे हैंi

बीबीसी लिखता है कि नक्सली होने के तमगे के साथ जेलों में सड़ रहे 3000 महिलाओं और पुरुषों की रिहाई के लिए वो हाई कोर्ट गए. वो आदिवासियों को उनके अधिकारों की जानकारी देने के लिए दूरदराज़ के इलाक़ों में गए. फ़ादर स्टेन स्वामी ने आदिवासियों को बताया कि कैसे खदानें, बांध और शहर उनकी सहमति के बिना बनाए जा रहे हैं और कैसे बिना मुआवज़े के उनसे ज़मीनें छीनी जा रही हैं. उन्होंने साल 2018 में अपने संसाधनों और ज़मीन पर दावा करने वाले आदिवासियों के विद्रोह पर खुलकर सहानुभूति जताई थी. उन्होंने नियमित लेखों के ज़रिए बताया है कि कैसे बड़ी कंपनियाँ फ़ैक्टरियों और खदानों के लिए आदिवासियों की ज़मीनें हड़प रही हैं…..साफ है कि यह सब सरकार को बहुत नागवार गुजरा ओर मौका मिलते हैं उन्हें लपेट लिया गया।

भीमाकोरगांव केस में यूएपीए के तहत महाराष्ट्र में जेल में बंद रांची के फादर स्टेन स्वामी का निधन हो गया। वे दो दिन से वेंटिलेटर पर थे। वे लंबे समय से बीमार थे और अदालत के आदेश के बाद ही उन्हें इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया था। 84 साल के स्टेन स्वामी को पानी पीने के लिए सिपर देने तक का एनआईए ने विरोध किया था।फादर स्टेन के प्राण तब निकले जब उनकी जमानत पर सुनवाई चल रही थी .
इसी मामले में एक अन्य बुजुर्ग वरावरा राव हैं जिनका इलाज चल रहा है। सुधा भारद्वाज भी बुरी स्वास्थ्य से जूझ रही हैं। दुर्भाग्य है कि इतने कमजोर मामले में लीगल टीम बेहतर तरीके से काम नहीं कर पा रही है और आज एक निर्दोष को जेल में अपनी जान गंवानी पड़ी।

फादर स्टैन स्वामि एक बुज़ुर्ग पादरी थे जो पिछले पांच दशकों से आदिवासी मुद्दों पर काम करते रहे हैं। उन्हें 8 अक्टूबर, 2020 की रात में बदनाम भीमा कोरेगांव-एल्गार परिषद षडयंत्र प्रकरण में गिरफ्तार किया गया। एक सच्चे कार्यकर्ता और प्रतिष्ठित विद्वान की इस गिरफ्तारी की डब्लूएसएस भर्त्सना करता है और बताना चाहता है कि इस दयालु व विनम्र व्यक्ति के खिलाफ लगाए सारे आरोप हास्यास्पद हैं। हम बताना चाहते हैं कि 1 जनवरी, 2018 के दिन हुई भीमा कोरेगांव हिंसा की जांच दरअसल देश के अग्रणि मानव अधिकार कार्यकर्ताओं को सताने का एक ज़रिया बन गई है। इस जांच के दौरान 15 अन्य वकीलों, कार्यकर्ताओं, लेखकों, कवियों, बुद्धिजीवियों को इसी तरह के बेतुके आरोपों में बंदी बनाया गया है। कुछ तो दो साल से भी अधिक अवधि के लिए कारागार में बंद रहे हैं।

फादर स्टैन स्वामी मूलतः तमिलनाड़ु के त्रिची से थे । वे एक युवा पादरी के रूप में झारखंड आए थे ताकि आदिवासी लोगों की समस्याओं को समझ सकें। दो साल तक वे झारखंड के पूर्वी सिंहभूम ज़िले के एक आदिवासी गांव में रहे। इस दौरान उन्होंने आदिवासियों के सामाजिक-आर्थिक हालात, उनके समुदायों और मूल्यों, तथा शोषण की उस व्यवस्था पर शोध किया जो उन्हें जकड़े हुए है। बैंगलुरु के इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट में 15 साल सेवा देने, जिस दौरान 10 साल वे इंस्टीट्यूट के निदेशक भी रहे, के बाद वे एक बार फिर झारखंड लौटे। झारखंड में वे झारखंड आर्गेनाइज़ेशन फार ह्यूमन राइट्स (जोहार) से जुड़ गए तथा झारखंडी आर्गेनाइज़ेशन अगेन्स्ट युरेनियम रेडिएशन (जोअर) के साथ भी काम किया। जोअर युरेनियम कार्पोरेशन आफ इंडिया लिमिटेड की वजह से हो रहे पर्यावरण विनाश तथा निर्धनीकरण के विरुद्ध काम करता है। वे रांची में बगाइचा केंद्र की स्थापना में भी शामिल रहे- यह आदिवासी युवाओं के लिए एक प्रशिक्षण केंद्र है तथा साथ ही हाशियाकृत आबादियों की कार्य योजनाओं पर अनुसंधान व सहयोग का केंद्र भी है।

सदियों तक गूँजेगा फादर स्टेन स्वामी सवाल- आखिर मेरा अपराध क्या है?

झारखंड में फादर स्टैन के काम के दो प्रमुख क्षेत्र रहे और दोनों ने ही उन्हें केंद्र सरकार द्वारा रक्षित शक्तिशाली हितों के खिलाफ खड़ा कर दिया। उनके काम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा उस कार्पोरेट-राज्य गठबंधन को चुनौती देना रहा है जो आदिवासियों के पारंपरिक स्रोतों की लूट-खसोट करता है। झारखंड एक खनिज समृद्ध प्रांत है। देश के 40 प्रतिशत खनिज संसाधन यहीं हैं। फिर भी इसकी 39 प्रतिशत आबादी, ज़्यादातर आदिवासी, गरीबी रेखा से नीचे जीती है। प्रचुर प्राकृतिक संसाधनों के शोषण की दौड़ में अक्सर राज्य की मशीनरी आदिवासियों के खिलाफ खड़ी होती है। आदिवासियों को विस्थापन तथा और निर्धनीकरण का डर सताता है।

इस संदर्भ में फादर स्टैन स्वामी ने उन कानूनों की पैरवी की जो भारत के संविधान की पांचवी अनुसूची के धरातल पर टिके हैं। इनके अंतर्गत आदिवासी क्षेत्रों को कुछ स्वायत्तता तथा स्व-शासन का आश्वासन दिया गया है। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि झारखंड में पेसा (पंचायती राज – अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार अधिनियम, 1996) सम्बंधी नियम ही नहीं हैं, जिसकी वजह से इस अधिनियम का क्रियांवयन असंभव हो गया है।

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