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मोदी जी ! देश को बताइये भारत ने पेगासस साफ्टवेयर खरीदा है या नहीं

फारबिडन स्टोरीज ने कैसे किया पेगासस जासूसी का खुलासा !

जेपी सिंह

पूरे देश में पेगासस के जासूसी कांड को लेकर हंगामा वरपा हुआ है, फारबिडन स्टोरीज ने एमनेस्टी इंटरनेशनल के साथ पेगासस प्रोजेक्ट पर काम किया और पता लगाया कि सरकारें पत्रकारों, नेताओं और कानूनविदों की जासूसी कर रही हैं। फारबिडन स्टोरीज ने कुल 50 हजार लोगों की जासूसी का दावा किया है, मोदी सरकार ने जासूसी के दावे को ख़ारिज तो किया है लेकिन आज तक यह नहीं बताया कि भारत ने पेगासस साफ्टवेयर खरीदा है अथवा नहीं। इससे संदेह की गुंजाइश बनी हुई है।

फारबिडन स्टोरीज का उद्देश्य पत्रकारों के उस संवेदनशील जानकारी की रक्षा करना है, जिसकी वजह से उन्हें खतरा है। अगर पत्रकार को ऐसी स्थिति में कुछ हो जाता है, तो यह मंच उनकी स्टोरी को पब्लिश करता है। इसके अलावा यह पत्रकारों के बीच समन्वय का काम भी करता है। इसके तहत स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया का कंसोर्टियम भी बनाया जाता है। कंसोर्टियम या साझा मंच यह तय करता है कि इसके द्वारा उठाई गई अहम स्टोरी अलग-अलग देशों में कई मीडिया हाउस से प्रकाशित हो सके।

दरअसल फारबिडन स्टोरीज पत्रकारों का एक साझा मंच है। इसकी स्थापना 2015 में इंवेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट लारेंट रिचर्ड ने की थी। लारेंट को इसकी प्रेरणा 2015 में चार्ली हेब्दो पर हुए हमले में मारे गए पत्रकारों के काम को देखकर मिली थी। फारबिडन स्टोरी एक नान-प्राफिट फ्रांस आधारित आर्गेनाइजेशन है, जो फ्रीडम वायस नेटवर्क के नाम से पंजीकृत है।

इस कंसोर्टियम के तहत 38 अलग-अलग देशों के 60 से ज्यादा न्यूज आर्गेनाइजेशन और 100 से ज्यादा पत्रकार आपस में समन्वय बनाकर काम कर चुके हैं। फारबिडन स्टोरीज की एक सब्सिडायरी कंपनी फारबिडन फिल्म भी है, जो डाक्यूमेंट्री का प्रकाशन करती है। फारबिडन स्टोरीज की एडिटर-इन-चीफ इंवेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट सांद्रिन रिगाउद हैं। इसमें आईसीआईजे में काम कर चुकीं सेशिल शीलिस-गाल्लेगो, आउड्रे ट्रेवेरे, पालोमा डि डिनेशिन और अन्य पत्रकार भी शामिल हैं।

फारबिडन स्टोरीज को मेक्सिको से संबंधित कार्टेल प्रोजेक्ट के लिए जाना जाता है, जिसके तहत मेक्सिको के पत्रकार रेजिना मार्टिनेज का काम प्रकाशित किया गया था। बता दें मार्टिनेज की ड्रग्स माफिया ने हत्या कर दी थी। कंसोर्टियम ने डाफने प्रोजेक्ट के नाम से माल्टा की पत्रकार डाफने करूना गालजिया की स्टोरीज उनकी हत्या के बाद पब्लिश की थीं। बताया जाता है कंसोर्टियम के जरिए यह स्टोरीज करीब 7.4 करोड़ लोगों तक पहुंची थीं। इसके अलावा ग्रीन ब्लड प्रोजेक्ट समेत मंच कई प्रोजेक्ट पर काम कर चुका है।

खोजी पत्रकारों के अंतरराष्ट्रीय ग्रुप का दावा है कि दुनियाभर में इजराइली कंपनी एनएसओ के जासूसी साफ्टवेयर पेगासस से 10 देशों में 50 हजार लोगों की जासूसी हुई। भारत में भी अब तक 300 नाम सामने आए हैं, जिनके फोन की निगरानी की गई। इनमें सरकार में शामिल मंत्री, विपक्ष के नेता, पत्रकार, वकील, जज, कारोबारी, अफसर, वैज्ञानिक और एक्टिविस्ट शामिल हैं।

इस अंतरराष्ट्रीय ग्रुप में भारत का मीडिया हाउस द वायर भी शामिल था, जो जासूसी में टारगेट बने भारतीयों के नाम सामने लाया है। अब तक 38 पत्रकार, 3 प्रमुख विपक्षी नेता, 2 मंत्री और एक जज का नाम सामने आया है। द वायर के संपादक सिद्धार्थ वरदराजन का कहना है कि छैव् अपने प्रोडक्ट पेगासस का लाइसेंस सिर्फ सरकारों को देता है। भारत सरकार का कहना है कि उसने पेगासस का इस्तेमाल नहीं किया। अगर उसने नहीं किया तो किसने भारतीय पत्रकारों, जजों, नेताओं और अफसरों की जासूसी कराई? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इसकी जांच करानी चाहिए।

पेगासस प्रोजेक्ट दुनियाभर के 17 मीडिया संस्थानों के जर्नलिस्ट का एक ग्रुप है, जो एनएसओ ग्रुप और उसके सरकारी ग्राहकों की जांच कर रहा है। इजराइल की कंपनी  सरकारों को सर्विलांस टेक्नोलाजी बेचती है। इसका प्रमुख प्रोडक्ट है- पेगासस, जो एक जासूसी साफ्टवेयर या स्पायवेयर है।पेगासस आईफोन और एंड्रायड डिवाइस को टारगेट करता है। पेगासस इंस्टाल होने पर उसका आपरेटर फोन से चैट, फोटो, ईमेल और लोकेशन डेटा ले सकता है। यूजर को पता भी नहीं चलता और पेगासस फोन का माइक्रोफोन और कैमरा एक्टिव कर देता है।

पेरिस के नान-प्राफिट जर्नलिज्म आर्गेनाइजेशन फारबिडन स्टोरीज और एमनेस्टी इंटरनेशनल के पास 2016 से एनएसओ के ग्राहकों द्वारा टारगेट के रूप में चुने गए 50,000 से अधिक फोन नंबरों की जानकारी पहुंची थी। कब और कैसे, इसकी कोई जानकारी इन संगठनों ने नहीं दी है। तब उसने यह जानकारी गार्जियन, वाशिंगटन पोस्ट समेत 17 न्यूज आर्गेनाइजेशन के साथ शेयर की। पिछले कुछ महीनों से इन मीडिया आर्गेनाइजेशन के 80 से अधिक पत्रकारों ने इस डेटा पर काम किया। इनके बीच कोआर्डिनेशन का काम फारबिडन स्टोरीज का था।

लीक हुआ डेटा 50,000 से अधिक फोन नंबरों की एक सूची है। यह नंबर उन लोगों के हैं, जिनकी 2016 के बाद से अब तक छैव् के सरकारी ग्राहकों ने जासूसी कराई। इन्हें ही छैव् ने पेगासस का सर्विलांस लाइसेंस बेचा था। डेटा में सिर्फ समय और तारीख है, जब इन नंबरों को निगरानी के लिए चुना गया या सिस्टम में दर्ज किया गया था। डेटा के आधार पर कुछ नंबरों का सैम्पल निकालकर ग्रुप के पत्रकारों ने टारगेट्स से मोबाइल फोन लिए। उनके हैंडसेट की फोरेंसिक जांच एमनेस्टी की सिक्योरिटी लैब से कराई, जो इस प्रोजेक्ट में टेक्निकल पार्टनर बना।

पत्रकारों के कंसोर्टियम का कहना है कि लीक हुआ डेटा सर्विलांस के लिए पहचाने गए टारगेट्स बताता है। इससे सिर्फ इतना पता चलता है कि इन लोगों के फोन को इन्फेक्ट करने को कहा गया था। दावे के साथ नहीं कहा जा सकता कि पेगासस जैसे स्पायवेयर ने इन मोबाइल नंबरों की जासूसी की कोशिश की है या नहीं। जासूसी हो सकी या नहीं, यह भी इस डेटा से पता नहीं चलता। जो डेटा मिला है, उसमें कुछ लैंडलाइन नंबर भी हैं। इस पर छैव् का कहना है कि इनकी निगरानी टेक्निकली असंभव है। पर कंसोर्टियम का दावा है कि यह नंबर टारगेट्स में शामिल थे, भले ही पेगासस से इन पर हमला हुआ हो या नहीं।

हालांकि, सूची में जो नंबर शामिल हैं, उनके मोबाइल फोन के छोटे सैम्पल की फोरेंसिक जांच हुई है। इसमें लीक हुए डेटा में पेगासस की एक्टिविटी शुरू होने का जो वक्त और तारीख लिखी थी, उसके अनुसार ही एक्टिविटी देखने को मिली है। इससे यह नहीं कह सकते कि इन फोन की जासूसी हुई भी या नहीं। इतना जरूर कह सकते हैं कि इन नंबरों को अलग-अलग सरकारों ने जासूसी के लिए चुना था।

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने उन 67 स्मार्टफोन्स की जांच की, जिन पर पेगासस से हमले की आशंका थी। इनमें से 23 इन्फेक्ट हुए थे और 14 में पेगासस से हमले के लक्षण मिले। बचे हुए 30 फोन से कुछ पता नहीं चला। दरअसल, कुछ लोगों ने अपने हैंडसेट बदल दिए थे। 15 फोन एंड्रायड डिवाइस थे, जिनमें से किसी में भी पेगासस के हमले की पुष्टि नहीं हुई। एक पहलू यह भी है कि आईफोन में यूजर लाग बनता है और एंड्रायड के कुछ वर्जन में नहीं, इस वजह से कहना बड़ा मुश्किल है कि इनकी जासूसी हुई है या नहीं। तीन एंड्रायड फोन से संकेत जरूर मिले कि उन्हें टारगेट बनाने की कोशिश हुई थी। उन पर पेगासस से लिंक करने वाले ैडै मैसेज मिले हैं।

एमनेस्टी ने चार आईफोन की “बैकअप कापी” सिटीजन लैब से शेयर की थी, जो टोरंटो यूनिवर्सिटी का रिसर्च ग्रुप है। इस ग्रुप को पेगासस की स्टडी करने में महारत हासिल है। इस ग्रुप ने इन आईफोन में पेगासस से जासूसी को कंफर्म किया है। सिटीजन लैब ने एमनेस्टी इंटरनेशनल के फोरेंसिक जांच के तरीकों और नतीजों को सही पाया।

इजराइली कंपनी का कहना है कि उसके ग्राहक सिर्फ सरकारें हैं और यह महंगा भी है। 40 देशों में इसके 60 ग्राहक हैं। मेक्सिको और पनामा की सरकारें ही खुलकर पेगासस का इस्तेमाल करती हैं। बाकी ने कभी इसकी पुष्टि नहीं की। कंपनी के 51फीसद यूजर इंटेलिजेंस एजेंसियों, 38 फीसद कानून प्रवर्तन एजेंसियों और 11 फीसद सेना से संबंधित हैं। पेगासस स्पायवेयर लाइसेंस के साथ बेचा जाता है। कीमत आपसी डील पर निर्भर करती है। एक लाइसेंस की कीमत 70 लाख रुपए तक हो सकती है। एक लाइसेंस से कई स्मार्टफोन ट्रैक हो सकते हैं। 2016 में पेगासस से 10 लोगों की जासूसी के लिए एनएसओ ग्रुप ने 9 करोड़ रुपए लिए थे।

‘द इकोनामिक टाइम्स’ ने 2019 में दावा किया था कि एनएसओ पेगासस के लाइसेंस के लिए 7-8 मिलियन डालर यानी 52 करोड़ से लेकर 59 करोड़ रुपए सालाना खर्च वसूलता है। एक लाइसेंस से 50 फोन का सर्विलांस हो सकता है। अगर 300 फोन की निगरानी करनी है तो छह लाइसेंस चाहिए और 313 करोड़ से लेकर 358 करोड़ रुपए सालाना खर्च होगा।

लीक हुए डेटा में नंबरों को क्लस्टर में आर्गेनाइज किया गया है। यह इस बात का संकेत है कि यह सभी नंबर एनएसओ के किसी क्लाइंट यानी किसी सरकार के टारगेट थे। पर किस सरकार ने किसे टारगेट किया, इसका दावा कोई नहीं कर सकता। एनएसओ का दावा है कि वह 40 देशों में 60 ग्राहकों को अपने प्रोडक्ट बेचता है। पर उसने कभी भी इन देशों या ग्राहकों का नाम सामने नहीं रखा है।

किस देश ने किसकी जासूसी कराई, इसका खुलासा मीडिया ग्रुप कर रहे हैं। इसमें वे टारगेट्स के पैटर्न के साथ ही उस समय उनके महत्व को एनालाइज कर रहे हैं। इस आधार पर मीडिया ग्रुप्स ने 10 सरकारों की पहचान की, जिन्होंने टारगेट्स चुने। इनमें अजरबैजान, बहरीन, कजाकिस्तान, मैक्सिको, मोरक्को, रवांडा, सऊदी अरब, हंगरी, भारत और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं।

एनएसओ ग्रुप पहली बार विवादों में नहीं पड़ा है। दरअसल, पेगासस प्रोजेक्ट 2016 में शुरू हुआ था और तब से ही यह स्पायवेयर विवादों में रहा है। एनएसओ ने दोहराया है कि उसकी ग्राहक सरकारों ने किसे टारगेट किया, इसका डेटा उसके पास नहीं रहता। एनएसओ ने तो अपने वकीलों के माध्यम से कहा है कि पत्रकारों के कंसोर्टियम के दावे गलत हैं। 50,000 नंबरों का आंकड़ा भी बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है। जो सूची जारी हुई है, वह सरकारों के टारगेट्स हैं ही नहीं। कंसोर्टियम को जो डेटा सामान्य तौर पर उपलब्ध था, उसका अपने मनमुताबिक एनालिसिस किया और अब उसे डेटा लीक कहकर सनसनी फैलाई जा रही है।

पेगासस जासूसी कांड की रिपोर्ट को सामने लाने वाली एमनेस्टी इंटरनेशनल ने दावा किया कि पत्रकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, नेताओं समेत अन्य लोगों की गैरकानूनी तरीके से जासूसी की जा रही है। एमनेस्टी इंटरनेशनल की ओर से ये भी कहा गया था कि उसकी सिक्योरिटी लैब में इस लिस्ट में शामिल कई लोगों के मोबाइल की फारेंसिक विश्लेषण कर शोध किया गया, जिसमें ये बात निकल कर सामने आई है। एमनेस्टी इंटरनेशल का दावा था कि जांच में आधे से ज्यादा मामलों में पेगासस स्पायवेयर के निशान मिले थे।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।) साभार

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