साहित्य-जगत

“शिखर की सीढ़ियाँ चढ़ना बहुत मुश्किल नहीं लेकिन, ये मुमकिन है उतरते वक़्त सीढ़ी से फिसल जाओ…..!” ग़ज़ल- अशोक रावत

सत्ता के गलियारे पर उँगली उठाती एक अच्छी ग़ज़ल

अशोक रावत
ग़ज़ल
बुरा मत मानना, ऐसा न हो, इतना बदल जाओ,
हमारी ओर देखो भी नहीं, बच के निकल जाओ.
वतन को बांटने वालो, बहुत पछताओगे एक दिन,
अभी कुछ भी नहीं बिगड़ा है, मौका है सँभल जाओ.
कोई कितना भी उकसाए, दियों को दोष मत देना,
अगर उनको जलाने में कभी ग़लती से जल जाओ.
कोई बुत जी उठे फिर से, कभी ऐसा नहीं होता,
कहीं ऐसा न हो तुम भी किसी पत्थर में ढल जाओ.
तुम्हारे नाम पर मोटा बजट होता है आबंटित,
कहीं फिर ये न हो तुम टाफियों से ही बहल जाओ.
जहां इंसानियत पर आंच आती हो ज़रा सी भी,
अगर पत्थर का भी दिल हो,तो बेहतर है पिघल जाओ.
शिखर की सीढ़ियाँ चढ़ना बहुत मुश्किल नहीं लेकिन,
ये मुमकिन है उतरते वक़्त सीढ़ी से फिसल जाओ.

Related Articles

Close