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मोदी के आदेश पर चल रहे हैं ,कोर्ट, मीडिया और चुनाव आयोग !

ऐसा नहीं है कि कोर्ट बहरी, गूंगी और अंधी हो गई है. कोर्ट तो मोदी के आदेश पर चल रही है, वैसे ही जैसे चुनाव आयोग और मीडिया मोदी के आदेश पर चल रहे हैं

अजीत साही                                                                                                                                                                     नई दिल्ली

     तीस्ता सेतलवाड के वकील इधर उधर कोर्ट में एप्लिकेशन डालेंगे. सुप्रीम कोर्ट में भी हाथ पैर मारा जाएगा. रास्ता कुछ नहीं निकलेगा. अब अगले कई साल तीस्ता जेल में रहेंगी. केरल के पुलिस अधिकारी आर बी श्रीकुमार, जो गुजरात काडर के थे और बहुत हिम्मत के साथ मोदी के खि़लाफ़ लड़े थे, भी गिरफ़्तार किए जा चुके हैं. वो भी जेल में सड़ेंगे. तीन साल से गौतम नवलखा जेल में है. फ़ादर स्टैन को तो जेल में मार ही दिया. जी. एन. साईबाबा को कोर्ट ने पहले ही सज़ा दे दी है. उमर ख़ालिद से लेकर ख़ालिद सैफ़ी तक सबका यही क़िस्सा है. इन दर्जनों लोगों के खि़लाफ़ एक सबूत नहीं है. इनका एक ही क़सूर है कि ये भ्रष्ट सियासतदान के खि़लाफ़ आवाज़ उठा रहे थे.

ऐसा नहीं है कि कोर्ट बहरी, गूंगी और अंधी हो गई है. कोर्ट तो मोदी के आदेश पर चल रही है, वैसे ही जैसे चुनाव आयोग और मीडिया मोदी के आदेश पर चल रहे हैं. ये सिलसिला ख़ासतौर से 2019 से बहुत तेज़ हो चुका है. जज लोया की हत्या को छुपाने में जो जज इंवाल्व थे वो प्रोमोट हो कर सुप्रीम कोर्ट में पहुँच चुके हैं. आरएसएस से जुड़े और एंकाउंटर केस में अमित शाह के वकील रहे जज ललित अगले महीने भारत के चीफ़ जस्टिस बनने जा रहे हैं.

मोदी के खि़लाफ़ ज़ाकिया जाफ़री की पेटिशन पर सुप्रीम कोर्ट का जो जजमेंट आया है उस पर मूर्ख लोगों को ही आश्चर्य होगा. भारत की अदालत की ड्यूटी यही लगी है कि मोदी के आपराधिक कर्मों का पर्दाफ़ाश करने वाले लोगों से चुन चुन कर कोर्ट बदला ले. पूरी लंबी लिस्ट है कोर्ट के पास. उसी पर काम हो रहा है.

आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट तीन साल से जेल में है. एक आदमी के कस्टोडियल टार्चर के लिए संजीव को सज़ा दी गई है. मज़ेदार बात ये है कि पुलिस ने भी कहा कि संजीव उस आदमी से कभी मिले ही नहीं थे. उससे भी मज़ेदार बात ये है कि उस आदमी का टार्चर हुआ ही नहीं था. सबसे मज़ेदार बात ये है कि वो आदमी पुलिस कस्टडी में मरा ही नहीं था. लेकिन ट्रायल कोर्ट ने संजीव के वकील को अदालत में बोलने ही नहीं दिया. संजीव की तरफ़ से एक गवाह पेश करने तक की इजाज़त नहीं मिली. सरकारी गवाहों से सवाल करने तक की संजीव के वकील को इजाज़त नहीं मिली. संजीव की तरफ़ से एक सबूत रखने की इजाज़त नहीं मिली. ज़मानत के लिए संजीव की एप्लीकेशन दो साल से सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री में है. लेकिन उस एप्लीकेशन के लिए बेंच तक नहीं तय की जा रही है, तारीख़ मिलना तो दूर की बात है.

भारत की अदलिया का इस तरह नेस्तनाबूद हो जाना देश और समाज दोनों के लिए घातक होगा. जब इंसाफ़ का आखि़री रास्ता बंद होकर इंसाफ़ का दुश्मन बन जाता है तो लोकतंत्र पूरी तरह पस्त हो जाता है. ऐसा नहीं है कि भारत की अदालतें पूरी तरह सही चल रही थीं और मोदी के सत्ता में आने के बाद कोई यू-टर्न आया है. लेकिन कम से कम ये था कि कई मामलों में ये उम्मीद की जा सकती थी कि अगर हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट जाएँगे तो कोर्ट सही को सही और ग़लत को ग़लत बताएगी और इंसाफ़ करेगी. हर मामले में नहीं. लेकिन कई मामलों में. अब वो उम्मीद पूरी तरह ख़त्म हो चुकी है. अब भारत की अदालत किसी भी तानाशाह देश की अदालत की तरह हो चुकी है, जैसे रूस, चीन, ईजिप्ट भारत से लोकतंत्र ख़त्म हो चुका है. सिर्फ़ इलेक्शन बचे हैं और संसद और अदालत की इमारतें बची हैं.

गुजरात दंगे पर निर्णय देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने तीस्ता सीतलवाड़ और पुलिस अधिकारी आरबी श्रीकुमार की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने माना है कि तीस्ता सीतलवाड़ ने गुजरात दंगे के मामले को एक साजिश के अंतर्गत लंबे समय तक खींचने की कोशिश की। कोर्ट ने इस मामले में ज्यादा जांच की आवश्यकता भी बताई थी। सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय के अगले ही दिन गुजरात पुलिस ने तीस्ता सीतलवाड़ को उनके मुंबई स्थित आवास से गिरफ्तार कर लिया गया। उनके साथ ही गुजरात पुलिस के पूर्व अधिकारी को भी उनके आवास से गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन इस गिरफ्तारी के साथ ही इसका विरोध शुरू हो गया है।

जागरूक नागरिक की भूमिका निभाई

सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने कहा है कि तीस्ता सीतलवाड़ ने एक जागरूक नागरिक की सशक्त भूमिका निभाई है। उन्होंने इसे गुजरात पुलिस के द्वारा बदले की कार्रवाई और केंद्रीय नेताओं के द्वारा अपने विरुद्ध आवाज उठाने वालों पर अनावश्यक दबाव डालने की कार्रवाई बताया है। प्रशांत भूषण ने कहा है कि तीस्ता सीतलवाड़ को केवल इसलिए परेशान किया जा रहा है, क्योंकि उसने गुजरात दंगों के दौरान उनकी भूमिका को उजागर कर दिया था। इसके लिए सीतलवाड़ को अपनी सुरक्षा को भी दांव पर लगाना पड़ा था और इस दौरान उनके साथ कुछ भी हो सकता था।

बदले की कार्रवाई

राजनीतिक कार्यकर्ता और समसामयिक विषयों पर प्रखर प्रवक्ता योगेंद्र यादव ने ट्वीट कर कहा है कि यह ‘बदले की कार्रवाई’ है। उन्होंने इसे अपने खिलाफ आवाज उठाने वालों के खिलाफ की गई एक और कार्रवाई बताया है। उन्होंने कहा है कि यह कार्रवाई उस तीस्ता सीतलवाड़ पर की गई है जिन्होंने गुजरात दंगों के दौरान पीड़ित हुए लोगों की आवाज बनकर उभरीं और लोगों की मदद की। यह मदद केवल लोगों को सुरक्षित रखने और उनकी आवश्यकताओं को पूरा करने तक सीमित नहीं थी, बल्कि उन्होंने उनके लिए लंबी लड़ाई लड़ी।

एमनेस्टी इंडिया ने कहा- आवाज को दबाने की कोशिश
तीस्ता सीतलवाड़ की गिरफ्तारी को एमनेस्टी इंडिया ने अपने से अलग आवाज को दबाने की कोशिश बताया है। संगठन ने ट्वीट कर कहा है कि पुलिस ने लोगों के मानवाधिकारों के लिए लड़ने वाली मानवाधिकार कार्यकर्ता सीतलवाड़ को गिरफ्तार कर लिया है। यह अपने से अलग विचार रखने वाली हर आवाज को दबाने की कोशिश है। संगठन ने कहा है कि इस कार्रवाई से सिविल सोसाइटी के उन लोगों में गलत संदेश जाएगा, जो लोगों के अधिकारों के खिलाफ सरकारों की नाकामयाबी को उजागर करते रहते हैं। एमनेस्टी ने इसे स्वीकार न किए जाने योग्य कार्रवाई बताया है।

 

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