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गुरु दक्षिणा या फंडिंग पर पर्दा ?

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अखिलेश अखिल

कांग्रेस द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस पर लगाए गए ताजा आरोप भारतीय राजनीति को एक बार फिर उस बिंदु पर ले आए हैं, जहाँ बहस केवल राजनीतिक विचारधाराओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि धन, शक्ति और पारदर्शिता के प्रश्न तक पहुँच चुकी है। कर्नाटक सरकार में मंत्री और कांग्रेस नेता प्रियांक खड़गे का यह कहना कि आरएसएस के पीछे “बड़ा मनी लॉन्ड्रिंग रैकेट” चल रहा है, कोई साधारण राजनीतिक बयान नहीं है। यह सीधे-सीधे संघ की फंडिंग संरचना, कानूनी हैसियत और मोदी सरकार की भूमिका पर सवाल खड़े करता है। और यह विवाद ऐसे समय में उभरा है, जब 2026 के विधानसभा चुनावों की तैयारी कई राज्यों में तेज हो चुकी है और कांग्रेस–बीजेपी का टकराव अपने चरम पर है।

 सवाल सिर्फ पैसे का नहीं, व्यवस्था का है

प्रियांक खड़गे का दावा है कि संघ से जुड़े करीब 2500 संगठन देश और विदेश में फैले हुए हैं और वे अमेरिका, इंग्लैंड सहित कई देशों से फंड जुटाते हैं। उनका आरोप है कि यही नेटवर्क एक “बड़े मनी लॉन्ड्रिंग रैकेट” की तरह काम कर रहा है।कांग्रेस का तर्क है कि जब किसी संगठन का न तो औपचारिक रजिस्ट्रेशन है, न सार्वजनिक ऑडिट, न आरटीआई के दायरे में है, तो यह कैसे पता चलेगा कि पैसा कहाँ से आ रहा है और कहाँ जा रहा है?यह आरोप केवल आरएसएस तक सीमित नहीं है, बल्कि उस पूरे इकोसिस्टम पर है, जिसमें सैकड़ों ट्रस्ट, एनजीओ और शैक्षणिक संस्थान शामिल हैं, जिन्हें संघ परिवार से जुड़ा बताया जाता है।

संघ की ओर से वर्षों से यह कहा जाता रहा है कि उसकी आय का मुख्य स्रोत स्वयंसेवकों द्वारा दी जाने वाली “गुरु दक्षिणा” है।लेकिन प्रियांक खड़गे ने इस अवधारणा पर ही सवाल खड़ा कर दिया। उनका कहना है कि “गुरु दक्षिणा” की कोई कानूनी परिभाषा नहीं है और इसे फंडिंग के स्रोत के रूप में इस्तेमाल कर पारदर्शिता से बचा जा रहा है।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि कोई संगठन राष्ट्रीय स्तर पर हजारों करोड़ की संपत्ति, जमीन और इमारतों का संचालन करता है, तो केवल “दान” के आधार पर उसकी वित्तीय व्यवस्था को समझना मुश्किल है।

संघ : अनरजिस्टर्ड लेकिन प्रभावशाली

आरएसएस खुद को “व्यक्तियों का समूह” बताता है, न कि एक कानूनी संस्था। संघ प्रमुख मोहन भागवत कई बार कह चुके हैं कि 1925 में संघ की स्थापना हुई थी और उस समय रजिस्ट्रेशन की कोई अनिवार्यता नहीं थी।आजादी के बाद भी आरएसएस ने खुद को किसी विशेष कानून के तहत रजिस्टर नहीं कराया। अदालतों और इनकम टैक्स विभाग ने इसे “Association of Persons (AOP)” मानकर टैक्स छूट दी है।

यहीं से विवाद शुरू होता है। आलोचकों का सवाल है कि जब कोई संगठन इतना बड़ा नेटवर्क संचालित करता है, तो क्या उसे भी अन्य ट्रस्टों और संस्थाओं की तरह पब्लिक ऑडिट और टैक्स नियमों के दायरे में नहीं आना चाहिए?

 टैक्स छूट का सवाल

प्रियांक खड़गे का सबसे तीखा सवाल यही है—“आरएसएस टैक्स क्यों नहीं देता?”यदि संघ आम नागरिकों को टैक्स देने की नैतिक शिक्षा देता है, तो खुद को इससे बाहर रखना किस आधार पर उचित है? कांग्रेस का कहना है कि मोदी सरकार जानबूझकर संघ को यह विशेषाधिकार दे रही है, क्योंकि आरएसएस ही भाजपा की वैचारिक रीढ़ है।

अब तक केंद्र सरकार की ओर से इन आरोपों पर कोई ठोस जवाब नहीं आया है।बीजेपी आमतौर पर इसे “कांग्रेस की हताशा” बताकर खारिज कर देती है। लेकिन कांग्रेस का कहना है कि यदि आरोप गलत हैं, तो सरकार को स्वतंत्र जांच के आदेश देने चाहिए।सरकार की चुप्पी विपक्ष के आरोपों को और धार देने का काम कर रही है।

राजनीतिक रणनीति या वास्तविक जांच की मांग?

बीजेपी का आरोप है कि कांग्रेस जानबूझकर आरएसएस को निशाना बनाकर हिंदू संगठनों के खिलाफ माहौल बना रही है।वहीं कांग्रेस का कहना है कि यह धर्म का नहीं, बल्कि कानून और पारदर्शिता का मुद्दा है।असल सवाल यह है कि क्या सरकार आरएसएस की फंडिंग पर वही सख्ती दिखाएगी, जो वह विपक्षी दलों से जुड़े एनजीओ और ट्रस्टों पर दिखाती है?

भारत पहले से ही अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लोकतंत्र और संस्थागत पारदर्शिता को लेकर सवालों का सामना कर रहा है।यदि यह धारणा मजबूत होती है कि सत्तारूढ़ दल से जुड़े संगठनों को विशेष छूट मिलती है, तो यह भारत की वैश्विक छवि को नुकसान पहुंचा सकता है।

   यदि सरकार जांच से इनकार करती हैविपक्ष का हमला और तेज होगा।यदि जांच होती हैआरएसएसबीजेपी संबंधों पर बड़ा राजनीतिक भूचाल आ सकता है। दोनों ही स्थितियों में  मोदी सरकार के लिए असहज हैं। आरएसएस पर लगाए गएमनी लॉन्ड्रिंगके आरोप केवल एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि भारतीय सत्ता संरचना की पारदर्शिता पर सीधा हमला हैं।यह बहस आने वाले महीनों में और तेज होगी। सवाल यही हैक्या संघ को भी अन्य संगठनों की तरह कानून और टैक्स के दायरे में लाया जाएगा, या फिर यह मुद्दा भी राजनीतिक शोर में दबा दिया जाएगा?इसका जवाब ही तय करेगा कि भारत का लोकतंत्र वास्तव में कितना पारदर्शी है।

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