अखिलेश अखिल
तमिलनाडु में मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन द्वारा विधानसभा चुनाव से ठीक पहले ‘कलैगनार मगलिर उरिमाई तिट्टम’ (केएमयूटी) के तहत 1.31 करोड़ महिलाओं के खातों में 5,000 रुपये जमा कराना केवल एक कल्याणकारी कदम नहीं, बल्कि भारतीय चुनावी राजनीति के उस पुराने और सड़े हुए ढांचे को उजागर करता है, जिसमें सत्ता और सरकारी खजाने के बीच की रेखा लगभग मिट चुकी है। सवाल यह नहीं है कि गरीब, वंचित और महिलाओं को आर्थिक सहायता मिलनी चाहिए या नहीं—सवाल यह है कि क्या चुनाव की दहलीज पर खड़े होकर सरकारी योजनाओं को नकद बोनस में बदल देना लोकतंत्र के साथ ईमानदारी है, या मतदाताओं की चेतना को नोटों से ढकने की एक चालाक कोशिश।
स्टालिन सरकार जिस योजना को “अधिकार आधारित” बताती है, वह सितंबर 2023 से लागू है और इसके तहत महिला मुखियाओं को हर महीने 1,000 रुपये दिए जाते हैं। यदि यह सचमुच अधिकार आधारित सामाजिक सुरक्षा है, तो फिर इसे एकमुश्त 3,000 रुपये और ऊपर से 2,000 रुपये की ‘ग्रीष्मकालीन सहायता’ के रूप में क्यों बदला गया? इसका सीधा अर्थ यही है कि योजना को चुनावी हथियार में तब्दील कर दिया गया है। यह वही तरीका है, जिसे आम भाषा में ‘रेवड़ी राजनीति’ कहा जाता है, भले ही सत्ताधारी दल इसे किसी भी वैचारिक आवरण में लपेटने की कोशिश करे।
इस पूरे प्रकरण का सबसे खतरनाक पहलू निर्वाचन आयोग की भूमिका है। भारत का निर्वाचन आयोग संवैधानिक संस्था है, जिसे चुनावी मैदान को बराबरी का बनाये रखना चाहिए। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में आयोग की निष्पक्षता पर लगातार सवाल खड़े हुए हैं। कभी तमिलनाडु में किसानों की नकद सहायता रोक दी जाती है, कभी मुफ्त टीवी योजना पर रोक लगाई जाती है, और कभी बिहार जैसे राज्यों में सत्ताधारी गठबंधन द्वारा महिलाओं के खातों में 10,000 रुपये डालने पर आयोग चुप्पी साध लेता है। यह दोहरा मानदंड लोकतंत्र के लिए घातक है।
यदि आयोग वास्तव में आदर्श आचार संहिता को लेकर गंभीर होता, तो तमिलनाडु और बिहार—दोनों मामलों में एक समान कसौटी अपनाई जाती। लेकिन व्यवहार में यह साफ दिखता है कि केंद्र के सत्ता प्रतिष्ठान से जुड़े दलों को अक्सर छूट मिल जाती है, जबकि अन्य राज्यों के मामलों में सख्ती दिखाई जाती है। यह स्थिति निर्वाचन आयोग को निष्पक्ष रेफरी से अधिक एक पक्षपाती दर्शक के रूप में पेश करती है।
तमिलनाडु में एक ही दिन में 6,550 करोड़ रुपये का सरकारी धन खर्च होना मामूली बात नहीं है। यह रकम स्कूल, अस्पताल, रोजगार सृजन और बुनियादी ढांचे पर लगाई जा सकती थी। इसके बजाय इसे नकद हस्तांतरण के रूप में बांट देना यह संकेत देता है कि सरकारों की प्राथमिकता दीर्घकालीन विकास नहीं, बल्कि तात्कालिक राजनीतिक लाभ है। यह लोकतंत्र को “नीतियों की प्रतिस्पर्धा” से हटाकर “नकद की प्रतिस्पर्धा” में बदल देता है।
समर्थक यह तर्क देंगे कि गरीबों को राहत मिलनी चाहिए और महिलाओं के खातों में पैसा जाना सकारात्मक कदम है। यह बात अपनी जगह सही है। लेकिन असली प्रश्न समय और मंशा का है। यदि यही सहायता चुनाव के बाद या नियमित किस्तों के रूप में जारी रहती, तो इसे कल्याणकारी नीति कहा जा सकता था। चुनाव से ठीक पहले एकमुश्त राशि देना स्पष्ट रूप से मतदाताओं को प्रभावित करने का प्रयास है।
इसका एक और खतरनाक परिणाम यह है कि राजनीतिक दलों के बीच एक होड़ शुरू हो जाती है—कौन ज्यादा पैसा बांटेगा। आज 5,000 रुपये, कल 10,000 रुपये, परसों 20,000 रुपये। इस अंतहीन दौड़ में सरकारी खजाना खाली होगा, लेकिन गरीबी और बेरोजगारी जैसी मूल समस्याएं जस की तस बनी रहेंगी। यह लोकतंत्र को “खरीद-फरोख्त” की प्रक्रिया में बदलने जैसा है।
सबसे दुखद तथ्य यह है कि निर्वाचन आयोग, जो इस प्रवृत्ति पर लगाम लगा सकता था, वह खुद विश्वसनीयता के संकट से गुजर रहा है। जब आयोग की निष्पक्षता संदिग्ध हो जाती है, तो चुनाव केवल एक औपचारिकता बनकर रह जाते हैं। तब जनता के सामने विकल्प नीतियों और विचारधाराओं का नहीं, बल्कि यह रह जाता है कि कौन ज्यादा “फायदा” दे रहा है।
तमिलनाडु का मामला इस व्यापक बीमारी का एक उदाहरण मात्र है। असली सवाल यह है कि क्या भारत का लोकतंत्र इस रास्ते पर चलते हुए टिक पाएगा? यदि चुनाव जीतने का सबसे आसान तरीका सरकारी धन बांटना बन गया, तो नीति, विचार, जवाबदेही और विकास जैसे शब्द खोखले हो जाएंगे।
आवश्यक है कि निर्वाचन आयोग आदर्श आचार संहिता की स्पष्ट, सख्त और समान व्याख्या करे—और उसे सभी दलों पर बिना भेदभाव लागू करे। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट और संसद को भी इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए कि चुनावी प्रलोभनों की सीमा क्या होनी चाहिए।
वरना आने वाले वर्षों में चुनाव “लोकतंत्र का उत्सव” नहीं, बल्कि “नकद वितरण का महोत्सव” बनकर रह जाएंगे—और यह किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा होगा।






