अखिलेश अखिल
महाराष्ट्र सरकार द्वारा मुसलमानों के लिए शिक्षा तथा सरकारी और अर्ध-सरकारी नौकरियों में पांच प्रतिशत आरक्षण को औपचारिक रूप से रद्द करने का फैसला एक पुराने और विवादित मुद्दे को फिर से केंद्र में ले आया है। सरकार का कहना है कि वह केवल एक ऐसी व्यवस्था को समाप्त कर रही है जो कभी विधिसम्मत रूप से लागू ही नहीं हुई, जबकि विपक्ष इसे अल्पसंख्यक विरोधी मानसिकता का प्रमाण मान रहा है। यह टकराव केवल कानून तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक न्याय और राजनीतिक प्राथमिकताओं की गहरी बहस को भी उजागर करता है।
कानूनी दृष्टि से देखें तो सरकार की दलील में दम है। जुलाई 2014 में तत्कालीन कांग्रेस-एनसीपी सरकार ने एक अध्यादेश के जरिए मुसलमानों को विशेष पिछड़ा वर्ग-ए श्रेणी में रखते हुए पांच प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा की थी। लेकिन अध्यादेश को समय सीमा के भीतर विधानसभा से पारित कर कानून नहीं बनाया गया। दिसंबर 2014 में इसकी अवधि स्वतः समाप्त हो गई। इसके अलावा, बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस अध्यादेश पर रोक लगा दी थी और सुप्रीम कोर्ट ने विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई करते हुए इस रोक को बरकरार रखा। इस तरह यह आरक्षण कानूनी रूप से कभी प्रभावी नहीं हो पाया।
इसी आधार पर राज्य सरकार का कहना है कि वह केवल प्रशासनिक स्पष्टता ला रही है। सामाजिक न्याय विभाग ने साफ किया है कि इस श्रेणी के तहत न तो कोई नया प्रवेश होगा और न ही नए जाति या वैधता प्रमाणपत्र जारी किए जाएंगे।
लेकिन सवाल यह है कि यदि यह आरक्षण वर्षों से निष्क्रिय था, तो अब इसे औपचारिक रूप से रद्द करने की जरूरत क्यों पड़ी? यही बिंदु इस फैसले को राजनीतिक रंग देता है। एक दशक से अधिक समय तक किसी भी सरकार ने इस अध्यादेश को आधिकारिक रूप से वापस लेने का कदम नहीं उठाया था।






