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अमेरिका को सबक सिखाने के लिए अली लारीजानी ने भरी हुंकार

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अखिलेश अखिल 

“‘ईरान क्षेत्रीय देशों पर हमला नहीं करना चाहता, लेकिन “अमेरिका द्वारा उपयोग किए जाने वाले किसी भी ठिकाने” को निशाना बनाएगा।” ये शब्द हैं ईरान के प्रमुख नेता अली लारीजानी के। ईरान के सर्वोच्च नेता खामनेई की इजरायल /अमेरिकी हमले में मारे जाने के बाद अब लारीजानी ईरान की सुरक्षा व्यवस्था को देख रहे हैं। लारीजानी के इस बयान के बाद इजरायल और अमेरिका में भी हलचल बढ़ गई है। 

    गौरतलब है कि  पहले लारीजानी को पश्चिम के साथ बातचीत के समर्थक के रूप में जाना जाता था। फरवरी 2026 में ओमान की मध्यस्थता में अमेरिका के साथ अप्रत्यक्ष वार्ताओं की खबरें थीं। उन्होंने कहा था कि “वार्ता एक तार्किक रास्ता है” और सैन्य विकल्प व्यवहार्य नहीं है।लेकिन 28 फरवरी से शुरू हुए अमेरिकी-इजरायली हमलों और ख़ामेनेई की मौत ने परिस्थितियां बदल दीं। 1 मार्च को राज्य टीवी पर उन्होंने तीखा बयान दिया है -“अमेरिका और ज़ायोनी शासन ने ईरानी राष्ट्र के दिल को जला दिया है। हम उनके दिलों को जलाएंगे।”उन्होंने यह भी कहा कि ईरान “अभूतपूर्व ताकत” से जवाब देगा और अमेरिका यह भ्रम न पाले कि नेताओं की हत्या से ईरान अस्थिर हो जाएगा।

 बता दें कि ख़ामेनेई की मौत के बाद तीन सदस्यीय संक्रमण परिषद देश चला रही है। लारीजानी को इस दौर में सुरक्षा नीति का प्रमुख वास्तुकार माना जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि ईरान क्षेत्रीय देशों पर हमला नहीं करना चाहता, लेकिन “अमेरिका द्वारा उपयोग किए जाने वाले किसी भी ठिकाने” को निशाना बनाएगा।यह बयान संकेत देता है कि ईरान सीधी क्षेत्रीय लड़ाई से बचते हुए अमेरिकी सैन्य ढांचे को निशाना बना सकता है—यानी रणनीतिक, लेकिन नियंत्रित प्रतिक्रिया।

       विश्लेषकों का मानना है कि लारीजानी मूल रूप से व्यवस्था के भीतर काम करने वाले व्यवहारिक नेता हैं। 2015 परमाणु समझौते में उनकी भूमिका इसका प्रमाण है। लेकिन वर्तमान युद्धकालीन माहौल ने उनके स्वर को कठोर बना दिया है। यह संभव है कि सार्वजनिक मंच पर सख्त बयान देकर वे घरेलू समर्थन मजबूत करना चाहते हों, जबकि पर्दे के पीछे कूटनीतिक रास्ते खुले रखने की कोशिश जारी रहे।

   ईरान की राजनीति में अली लारीजानी का नाम दशकों से प्रभाव और संतुलन का पर्याय रहा है। उन्हें अक्सर इस्लामी गणराज्य का “व्यावहारिक चेहरा” माना जाता था—एक ऐसा नेता जिसने पश्चिमी दर्शन पर शोध किया, परमाणु वार्ताओं का नेतृत्व किया और संसद के स्पीकर के रूप में घरेलू व विदेशी नीति को आकार दिया। लेकिन सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली ख़ामेनेई की हत्या और अमेरिकी-इजरायली हमलों के बाद उनका स्वर पहले से कहीं अधिक कठोर हो गया है। अब वे तेहरान की सुरक्षा रणनीति के केंद्र में हैं।

3 जून 1958 को इराक के नजफ़ में जन्मे लारीजानी एक समृद्ध और प्रभावशाली धार्मिक परिवार से आते हैं। उनके पिता मिर्ज़ा हाशेम आमोली एक प्रमुख धर्मगुरु थे। उनके भाई भी न्यायपालिका और असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स जैसे अहम संस्थानों में ऊँचे पदों पर रहे हैं। यही कारण है कि टाइम पत्रिका ने 2009 में लारीजानी परिवार को “ईरान के केनेडी” कहा था।

   लारीजानी का विवाह फरीदेह मोताहरी से हुआ, जो इस्लामी क्रांति के वैचारिक स्तंभों में से एक मुरतज़ा मोताहरी की बेटी हैं। इस रिश्ते ने उन्हें क्रांतिकारी प्रतिष्ठान से और गहराई से जोड़ा।

   लारीजानी उन ईरानी नेताओं में गिने जाते हैं जिनकी शिक्षा केवल धार्मिक मदरसों तक सीमित नहीं रही। उन्होंने 1979 में शरीफ यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी से गणित और कंप्यूटर विज्ञान में स्नातक की डिग्री ली। इसके बाद तेहरान विश्वविद्यालय से पश्चिमी दर्शन में मास्टर्स और पीएचडी की, जिसमें उनका शोध 18वीं सदी के जर्मन दार्शनिक इमैनुएल कांट पर था। यह बौद्धिक पृष्ठभूमि उन्हें अपने समकालीन नेताओं से अलग बनाती है।

    1979 की इस्लामी क्रांति के बाद लारीजानी ने शुरुआत में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) से जुड़कर काम किया। बाद में वे सरकारी तंत्र में आए और 1990 के दशक में संस्कृति मंत्री तथा 1994 से 2004 तक राज्य प्रसारक IRIB के प्रमुख रहे। इस दौरान सुधारवादी धड़े ने उन पर मीडिया नीतियों को कठोर बनाने का आरोप लगाया।

    2005 में उन्होंने राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव लड़ा, लेकिन सफल नहीं हुए। उसी वर्ष उन्हें सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल का सचिव और मुख्य परमाणु वार्ताकार नियुक्त किया गया। 2007 में तत्कालीन राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद से मतभेद के चलते उन्होंने इस्तीफा दे दिया। 2008 से 2020 तक वे लगातार तीन कार्यकाल तक संसद (मजलिस) के स्पीकर रहे। इस दौरान उन्होंने 2015 के परमाणु समझौते को संसद से मंजूरी दिलाने में अहम भूमिका निभाई। यही वजह है कि उन्हें “व्यावहारिक” और “समझौतावादी” नेता के रूप में देखा जाता रहा।

        2021 और 2024 के राष्ट्रपति चुनावों में लारीजानी को गार्जियन काउंसिल ने अयोग्य घोषित कर दिया। आधिकारिक कारण नहीं बताए गए, लेकिन विश्लेषकों का मानना था कि सत्ता प्रतिष्ठान ने कठोरपंथी नेतृत्व को आगे बढ़ाने के लिए रास्ता साफ किया। लारीजानी ने 2024 की अयोग्यता को “अस्पष्ट” बताया।हालांकि अगस्त 2025 में राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने उन्हें फिर से सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल का सचिव नियुक्त किया। यह उनकी राजनीतिक वापसी थी।

   अली लारीजानी ईरान की सत्ता संरचना के अनुभवी, शिक्षित और प्रभावशाली चेहरा हैं। वे न तो पूरी तरह कठोरपंथी हैं, न ही उदारवादी—बल्कि एक ऐसे अंदरूनी रणनीतिकार हैं जो परिस्थितियों के अनुसार रुख बदलने में सक्षम हैं। ख़ामेनेई की अनुपस्थिति और अमेरिका-इजरायल के साथ बढ़ते युद्ध के बीच, लारीजानी पर जिम्मेदारी है कि वे ईरान की सुरक्षा, नेतृत्व परिवर्तन और संभावित कूटनीति—तीनों को संतुलित करें।

आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि उनकासबक सिखानेवाला बयान स्थायी युद्धनीति में बदलता है या फिर वे एक बार फिर व्यावहारिक कूटनीति की ओर लौटते हैं।

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