जनार्पण : गोपेश समग्र में बोलते हुए अशोक वाजपेयी जी, इलाहाबाद मेडिकल कन्वेंशन सेंटर, इलाहाबाद”
मैं इलाहाबाद पहली बार सत्तर साल पहले आया. एनीबेसेंट हॉल था, वहाँ बोलने वाला मैं सबसे कम उम्र का था. आज इस कार्यक्रम में बोलने वाला मैं सबसे बूढ़ा हूँ. हमारा यह समय, अभूतपूर्व है, जहाँ एक सुनियोजित अभियान चल रहा है कि हम भूल जाएं. या वह याद करें जो हुआ ही नहीं. मेरी चिंता यह रही कि कम से कम लेखकों कलाकारों को तो अपने पुरखों को याद करना चाहिये. यह भूलना हमारी मानवीयता पर हमला है. केवल मनुष्य है जिसे स्मृति का वरदान मिला है. हम याद कर सकते हैं कबीर, तुलसी को. हिन्दी अंचल के शहर स्मृतिविहीन होते जा रहे, इनमें स्मार्ट सिटी बनने की होड़ है.
हमने रज़ा फाउंडेशन में प्रोजेक्ट सोचा कि हम लेखकों को याद करें. अब तो ऐसे शहर और ऐसी जगहें मिलना मुश्किल है. ऐसे में गोपेश जी के समग्र का प्रकाशन एक स्मृति ग्रन्थ भी है. साहित्य के व्यापक समाज में ऐसे लोग चाहिये जैसे महादेवी वर्मा जिन्होंने साहित्यकार संसद बनाई. साहित्य समाज में ऐसे लोगों का नाम बहुत ऊपर है. साही जी ने कहा भी है कि ऐसे निर्मल लोग चाहिये उनकी विचारधारा जो भी हो, जो साहित्य को परम लक्ष्य और परम मूल्य मानते हों- इसका अर्थ समाज की उपेक्षा नहीं है. स्मृतिहीनता में एक गहरी कृतघ्नता है, कि हम अपने लेखक पुरखों को याद न करें जिन्होंने हमारे समाज को इतना कुछ दिया है.
अशोक वाजपेयी जी ने – नागार्जुन, नन्ददुलारे वाजपेयी, हजारी प्रसाद द्विवेदी, निराला आदि लेखकों और गोष्ठियों से जुड़ी यादें साझा की. उन्होंने कहा कि हजारी प्रसाद जी हमेशा प्रसन्न चित्त से बोलते थे. जबकि नन्द दुलारे जी को मैंने कभी हँसते नहीं देखा. मैं समझता हूँ कि गुरु गंभीर बात भी हल्के लहजे में मुस्कुराते हुए की जा सकती है. यदि जनता में बोलना है तो हँसना मुस्कुराना सीख लेना चाहिये.
साहित्य में स्थानीयता को जितना महत्व दिया जाना चाहिये वह दिया नहीं गया. इलाहाबाद में होने से ही इस तरह की सर्जनात्मकता सम्भव है जो गोपेश जी ने की.

मंच पर यश मालवीय, प्रोफेसर नीलम शरण गौर, प्रोफेसर हेरंब चतुर्वेदी, प्रोफेसर प्रणय कृष्ण, ओम निश्चल और अजामिल जी।
जिस समय बंटवारा धर्म के आधार पर हुआ उस समय यह लागू करना कितना मुश्किल रहा होगा कि ये देश धर्मनिरपेक्ष होगा, समता और लोकतंत्र के आधार पर देश का निर्माण होगा. नेहरू ने जैसे मूल्यों का देश गढ़ा आज हम उन मूल्यों को कितना आगे बढ़ा पा रहे हैं.
गोपेश जी परिमलीय प्रगतिशील थे या प्रगतिशील परिमलीय थे, यह उसी समय में सम्भव था. ‘बहुत बड़ी बात’ नाम से नेहरू के भाषण का अनुवाद गोपेश जी ने किया था. कुछ निश्चित सड़कों पर दिन का उजाला होता है तो बाकी सड़कों पर अँधेरा अमावस से भी काला होता है – गोपेश
गोपेश जी उन लेखकों में हैं जिनके कारण साहित्यिक माहौल निर्मल बना रहता है – साही जी
बताइये देश में कोई ऐसा शहर है जहाँ एक लेखक की शोक सभा में छः सौ लोग आ जाएँ यह इलाहाबाद में होता है. फरवरी में राजेंद्र कुमार जी की शोक सभा में ऐसा हुआ. इलाहाबाद अपने लेखकों को कभी betray नहीं करता. इलाहाबाद ने बच्चन जी को betray नहीं किया. इलाहाबाद गोपेश जी को याद रखता है. गोपेश जी इविवि से पढ़े थे, वीसी अमर नाथ झा ने उन्हें कविता पढ़ने को बुलाया, जब वे महज सोलह -सतरह साल के थे. ऐसा आजकल कहीं होता हो तो बताएँ.
गोपेश जी ने विदेशों के महाकाव्य का सिर्फ बाईस साल की उम्र में अनुवाद किया. नेहरू युग देवताओं का नहीं मनुष्यों का युग था. गोपेश जी ने अपने एक लेख में लिखा -‘प्यार की जो मंजिल है स्वर्ग उससे पड़ता है, और उसके बाद तो कुछ आता ही नहीं है.’ लेखक की प्रतिबद्धता सिर्फ पार्टी से नहीं हो सकती. जनता से तो हो सकती है.
जनार्पण : साहित्यकार गोपीकृष्ण गोपेश समग्र पर बोलते हुए प्रोफेसर प्रणय कृष्ण जी, इलाहाबाद मेडिकल कन्वेंशन सेंटर, इलाहाबाद
रिपोर्ट साभार संध्या नवोदिता






