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तमिलनाडु में ‘विजय’ की एंट्री से इंडिया गठबंधन बढ़ा विपक्ष में दरार

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अखिलेश अखिल 
तमिलनाडु के ताजा विधानसभा चुनाव नतीजों ने सिर्फ राज्य की राजनीति नहीं बदली, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी गठबंधन इंडिया की एकता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अभिनेता-राजनेता विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कझगम यानी टीवीके के उभार और सरकार बनाने की कवायद ने कांग्रेस और डीएमके के बीच ऐसी दरार पैदा कर दी है, जो 2029 के लोकसभा चुनाव तक असर डाल सकती है।
234 सदस्यीय विधानसभा में टीवीके  का 108 सीटों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में उभरना अपने आप में ऐतिहासिक है। लेकिन असली राजनीतिक भूचाल तब आया, जब कांग्रेस ने डीएमके के बजाय विजय को समर्थन देने का फैसला किया। कांग्रेस के इस कदम ने डीएमके को खुलकर बगावत के मूड में ला दिया है।
डीएमके के प्रवक्ता सरवनन अन्नादुरई ने कांग्रेस पर सीधा “पीठ में छुरा घोंपने” का आरोप लगाया। उनका कहना है कि यह फैसला न केवल “अल्पदृष्टि” वाला है, बल्कि इससे विपक्षी एकता को दीर्घकालिक नुकसान होगा। डीएमके का तर्क है कि कांग्रेस का यह कदम उस भरोसे को तोड़ता है, जिस पर  इंडिया  गठबंधन टिका हुआ है।
यह टकराव सिर्फ शब्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरी राजनीतिक रणनीति छिपी है। कांग्रेस का मानना है कि टीवीके  को समर्थन देकर वह भाजपा के लिए तमिलनाडु में जगह सीमित कर सकती है। यानी, कांग्रेस ने एक क्षेत्रीय सहयोगी  की बजाय एक उभरते विकल्प  टीवीके  को प्राथमिकता दी।लेकिन सवाल यह है कि क्या यह रणनीति दूरदर्शी है या आत्मघाती?
डीएमके के नजरिए से देखें तो यह सीधा-सीधा राजनीतिक नुकसान है। वह खुद को भाजपा के खिलाफ दक्षिण भारत में सबसे मजबूत किला मानती रही है। ऐसे में कांग्रेस का यह कदम उसे कमजोर करने के रूप में देखा जा रहा है। यही वजह है कि डीएमके ने इसे “अविश्वसनीय सहयोगी” का संकेत बताया है।
दूसरी तरफ, कांग्रेस की मजबूरी भी साफ दिखती है। राज्य में उसकी स्थिति बेहद कमजोर है और वह सत्ता समीकरण में प्रासंगिक बने रहने के लिए टीवीके  के साथ खड़ी हो गई। विजय की लोकप्रियता और 108 सीटों का जनादेश कांग्रेस के लिए एक मौका बन गया, जिसे वह छोड़ना नहीं चाहती थी।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा असर इंडिया  गठबंधन पर पड़ सकता है। यह गठबंधन पहले ही विभिन्न क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं और नेतृत्व के सवालों से जूझ रहा है। अब जब एक बड़े राज्य में सहयोगी दल आपस में ही टकरा रहे हैं, तो 2029 के लिए एकजुट रणनीति बनाना और मुश्किल हो जाएगा।
डीएमके ने साफ संकेत दिया है कि कांग्रेस के इस फैसले से अन्य सहयोगियों—जैसे अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव और उद्धव ठाकरे—के बीच भी अविश्वास बढ़ सकता है। अगर यह असंतोष बढ़ा, तो गठबंधन के भीतर ‘एक-दूसरे के खिलाफ काम करने’ की प्रवृत्ति मजबूत हो सकती है।
वहीं, भाजपा के लिए यह स्थिति राजनीतिक अवसर बन सकती है। विपक्ष की इस अंदरूनी कलह को वह “अस्थिर और अवसरवादी गठबंधन” के रूप में पेश करेगी। इससे 2029 के चुनाव में उसका नैरेटिव और मजबूत हो सकता है।
तमिलनाडु में फिलहाल सरकार गठन की प्रक्रिया जारी है और TVK बहुमत जुटाने की कोशिश में है। लेकिन असली कहानी इससे आगे की है। यह चुनाव दिखाता है कि भारतीय राजनीति में अब नए खिलाड़ी तेजी से उभर रहे हैं और पारंपरिक दलों को अपने पुराने समीकरण तोड़ने पड़ रहे हैं।
अंततः, यह सवाल सबसे अहम है—क्या विपक्ष भाजपा के खिलाफ एकजुट रह पाएगा, या फिर क्षेत्रीय हित और तात्कालिक राजनीतिक फायदे उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन जाएंगे?तमिलनाडु का यह ‘पावर प्ले’ सिर्फ एक राज्य की सत्ता का खेल नहीं, बल्कि 2029 की राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने वाला संकेत बन चुका है।

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