चौथा अक्षर संवाददाता / नई दिल्ली
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की संवाददाता रितिका चोपड़ा की चुनाव आयोग पर खोजी रिपोर्ट के बाद से पूरे देश में अभूतपूर्व हंगामा मचा हुआ है । इस रिपोर्ट से यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि तीन सदस्यीय चुनाव आयोग के भीतर ही इन संवेदनशील मुद्दों पर बार-बार सवाल उठाए गए हैं। दो चुनाव आयुक्तों, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों के दौरान कम से कम 14 बार आधिकारिक तौर पर अपनी आपत्तियां दर्ज कराई हैं।स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एक ही दिन में चार बार आपत्तियां दर्ज की गईं। दोनों आयुक्तों का कहना है कि कई महत्वपूर्ण फैसले उनकी जानकारी के बिना लिए गए हैं और उन्हें अंधेरे में रखा गया।ये आपत्तियां चुनाव आयोग के मुख्य कामकाज से जुड़ी हैं। इनमें नए मतदाताओं का पंजीकरण, मतदाता सूची से नामों को हटाना और जोड़ना, तथा पूरे मतदाता डेटाबेस की सुरक्षा जैसे मुद्दे शामिल हैं। आयुक्तों ने नए मतदाताओं से जुड़े कुछ कदमों को पूरी तरह से अनाधिकृत और अवैध करार दिया है।उन्होंने दिल्ली में मतदाता डेटाबेस तक पहुंच के केंद्रीकरण को लेकर भी कड़ी चेतावनी दी है, जो जमीनी स्तर के राज्य अधिकारियों की अनदेखी करता है। मतदाता सॉफ्टवेयर की अखंडता को लेकर चिंतित असंतुष्ट आयुक्तों ने अपनी शिकायत लेकर कैबिनेट सचिव तक का दरवाजा खटखटाया है।उनका आरोप है कि इन बदलावों ने मतदाता सूची के आईटी ढांचे पर निगरानी के एक महत्वपूर्ण स्तर को हटा दिया है।
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने स्पष्ट किया कि ये बदलाव उनकी जानकारी के बिना किए गए थे और उन्होंने इसे निरस्त कर दिया। इसके बाद 9 सितंबर को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दोनों आयुक्तों के बीच चार महीने में पहली पूर्ण बैठक हुई।
यह विवाद इसलिए भी अधिक ध्यान खींचता है क्योंकि तीनों अधिकारियों को एनडीए सरकार द्वारा चुना गया था। 2023 के अधिनियम के तहत इनकी नियुक्ति प्रधानमंत्री, केंद्रीय गृह मंत्री और विपक्ष के नेता की समिति द्वारा की गई थी। मार्च 2024 में संधू और ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति के समय कांग्रेस के तत्कालीन नेता अधीर रंजन चौधरी ने असहमति जताई थी।
वहीं, फरवरी 2025 में जब कुमार को सीईसी बनाया गया और जोशी की नियुक्ति हुई, तब लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने भी इस प्रक्रिया पर अपनी असहमति दर्ज की थी।
विवाद का एक प्रमुख कारण ‘फॉर्म-6’ में किया गया बदलाव है। जुलाई में नए मतदाताओं के लिए भरे जाने वाले इस फॉर्म में एक नया सवाल जोड़ा गया, जिसमें पूछा गया कि क्या आवेदक या उनके परिजनों का नाम पिछले एसआईआर की मतदाता सूची में मौजूद है।
मई महीने में ही जोशी ने फाइल पर चेतावनी दी थी कि सरकार द्वारा नियमों में संशोधन किए बिना इस फॉर्म में बदलाव नहीं किया जा सकता, जिस पर संधू ने भी सहमति जताई थी। इसके बावजूद यह बदलाव लागू कर दिया गया, जिसे 13 अगस्त को संधू ने आधिकारिक तौर पर अवैध बताते हुए तुरंत हटाने की मांग की।
मतदाता सूची तक पहुंच को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। चुनाव आयोग हमेशा से यह दावा करता रहा है कि मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया विकेंद्रीकृत है और यह इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर के नियंत्रण में होती है। लेकिन दोनों आयुक्तों ने ईआरओनेट और ईसीआईनेट सॉफ्टवेयर तक ईआरओ की पहुंच को सीमित किए जाने पर लगातार सवाल उठाया है। मई में जोशी ने और बाद में अगस्त में संधू ने इस क्रमिक केंद्रीकरण का कड़ा विरोध किया। संधू ने स्पष्ट किया कि आईटी महानिदेशक सीमा खन्ना के पास वैधानिक अधिकारियों की उचित और पूर्ण पहुंच को प्रतिबंधित करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
केंद्रीकरण की इसी समस्या के कारण गोवा में 97 योग्य मतदाता अपने अधिकार से वंचित रह गए। 29 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद जब गोवा के ईआरओ ने दस्तावेजों की जांच की, तो इन मतदाताओं को अंतिम सूची के लिए योग्य पाया। लेकिन केंद्रीकृत सॉफ्टवेयर में इस फैसले को दर्ज करने का कोई विकल्प नहीं था। 11 से 17 फरवरी के बीच गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने राज्य के प्रभारी वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त ज्ञानेश भारती और आईटी महानिदेशक को आठ बार पत्र लिखकर सुधार का विकल्प मांगा। कोई जवाब नहीं मिलने के कारण ये 97 मतदाता अंतिम सूची से बाहर रह गए।
पश्चिम बंगाल में चलाए गए एसआईआर अभियान पर भी गहरा विवाद देखने को मिला। वहां नामों को हटाने के तरीके ने सुप्रीम कोर्ट को फरवरी 2026 में हस्तक्षेप करने के लिए प्रेरित किया, जहां 60 लाख संदिग्ध मतदाताओं के मामले में न्यायिक अधिकारियों को फैसला करने का निर्देश दिया गया। इनमें से 27 लाख मतदाताओं को आयोग ने हटा दिया। बाद में आयोग ने अदालत को बताया कि ट्रिब्यूनल के समक्ष 38 लाख अपीलें लंबित हैं। इनमें से 16.10 लाख अपीलें उन मतदाताओं के खिलाफ दायर की गई थीं, जिन्हें न्यायिक अधिकारियों ने शामिल किया था। संधू ने अगस्त में अधिकारियों से सवाल किया कि चुनाव आयोग की ओर से इन अपीलों को दायर करने का अधिकार किसे दिया गया था, क्योंकि उन्हें या पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को इसकी कोई जानकारी नहीं थी।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 और 2023 के अधिनियम की धारा 18 के अनुसार, चुनाव आयोग के सभी कार्य यथासंभव सर्वसम्मति से होने चाहिए। मतभेद की स्थिति में बहुमत से निर्णय लिया जाना चाहिए। इसी नियम का हवाला देते हुए 16 अप्रैल को संधू और 24 अप्रैल को जोशी ने आयोग के वरिष्ठ अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि कोई भी आधिकारिक पत्राचार आयोग की उचित मंजूरी के बिना जारी नहीं किया जाना चाहिए।
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने इन तमाम गंभीर मुद्दों पर 21 सितंबर को आयोग और दोनों आयुक्तों को प्रश्नावली भेजकर जवाब मांगा था, लेकिन उनकी तरफ से कोई भी प्रतिक्रिया प्राप्त नहीं हुई।
एसआईआर की शुरुआत जून 2025 में बिहार से हुई थी। इसके तहत वोटर लिस्ट की समीक्षा और सुधार की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से 13 करोड़ से ज्यादा नाम हटाए गए हैं। इसी प्रक्रिया को लेकर यह बहस तेज हुई कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और बहाल करने की प्रक्रिया किस तरह संचालित हो रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, संधू और जोशी ने जिन मुद्दों पर आपत्ति दर्ज की, उनमें नए मतदाताओं का पंजीकरण, नाम हटाना और बहाल करना, एसआईआर से जुड़े आदेशों के खिलाफ अपील और वोटर डेटाबेस की सुरक्षा जैसे विषय शामिल थे।

चुनाव आयोग के प्रेस बयान का मूल पाठ।
भारत निर्वाचन आयोग
निर्वाचन सदन, अशोक रोड, नई दिल्ली–110001
क्रमांक: ECI/PN/119/2026
दिनांक: 23.09.2026
- भारत निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक संस्था है, जो संविधान के अनुच्छेद 324, वैधानिक नियमों तथा स्थापित संस्थागत परंपराओं के कड़े अधिदेश के तहत कार्य करता है। आयोग एक बहुसदस्यीय संवैधानिक निकाय के रूप में कार्य करता है। लिखित टिप्पणियां, अवलोकन, तकनीकी सुझाव तथा आंतरिक जांच-पड़ताल और संतुलन की व्यवस्थाएं पूर्ण पारदर्शिता, कानूनी अनुपालन और कार्यगत सुदृढ़ता सुनिश्चित करने के लिए आयोग की नियमित एवं सतत प्रक्रियाओं का हिस्सा हैं। आयोग की सभी कार्रवाइयां कानूनों और आयोग द्वारा जारी निर्देशों के अनुरूप रही हैं।
- आयोग द्वारा जारी सभी आधिकारिक आदेश, निर्णय और प्रशासनिक निर्देश मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें एवं कार्यकाल) अधिनियम, 2023 के तहत पूर्ण कानूनी आधार और निर्धारित वैधानिक प्रक्रियाओं के अनुरूप जारी किए जाते हैं।
- मसौदा तैयार करने के चरण में आयोग के सदस्यों द्वारा उठाए गए किसी भी संचालन संबंधी प्रश्न अथवा दिए गए सुझाव, मतदाता अधिकारों की सुरक्षा के उद्देश्य से अपनाई जाने वाली सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं। निर्वाचन आयुक्तों द्वारा दिए गए सुझाव निर्वाचन प्रक्रियाओं को और बेहतर बनाने के उद्देश्य से होते हैं।
- किसी भी संस्था में विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग मत और टिप्पणियां होना सामान्य प्रक्रिया है। अंतिम निर्णय लिए जाने से पहले ये निर्णय-निर्माण प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं। केवल तीनों निर्वाचन आयुक्त ही नहीं, बल्कि आयोग का प्रत्येक अधिकारी भी निर्वाचन प्रणाली में सुधार के लिए आयोग के समक्ष अपने सुझाव देने के लिए पूर्णतः अधिकृत है।
- दस महीने की अवधि में सामने आई कुछ चुनिंदा आंतरिक टिप्पणियों/अवलोकनों को प्रमुखता देना, जबकि आयोग द्वारा लिए गए बड़ी संख्या में अनुमोदनों, निर्णयों, निर्देशों और पहलों को नजरअंदाज कर देना, पूरे परिदृश्य का केवल एक हिस्सा प्रस्तुत करता है। हाल के महीनों में आयोग ने अनेक निर्णय लिए हैं, निर्देश जारी किए हैं, लगभग 40 नई पहल शुरू की हैं और कई चुनावी सुधार किए हैं। इनमें पूरे देश में निर्वाचक नामावली के पुनरीक्षण की प्रक्रिया, जिसमें एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण) भी शामिल है, प्रमुख है। पिछले एक वर्ष में लिए गए ये सभी निर्णय पूरे आयोग के सर्वसम्मत निर्णयों का परिणाम हैं।
- आयोग ने हाल ही में बिहार, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी, असम और पश्चिम बंगाल में प्रमुख चुनाव तथा इस अवधि के दौरान चुनाव से संबंधित विभिन्न प्रक्रियाएं सफलतापूर्वक संचालित की हैं। इस कार्य में व्यापक प्रशासनिक एवं परिचालन तंत्र के साथ-साथ आयोग के अनेक अनुमोदन और निर्देश शामिल रहे हैं।
- आयोग के डिजिटल प्लेटफॉर्म, जैसे ECINet, कड़े डेटा सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत संचालित होते हैं, ताकि अनधिकृत छेड़छाड़, हेरफेर आदि को रोका जा सके। राष्ट्रीय डेटाबेस में आईटी सुरक्षा जांच और ऑडिट नियंत्रण के मानक साइबर सुरक्षा उपाय लागू किए जाते हैं। निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ERO) और जिला निर्वाचन अधिकारी (DEO) सहित वैधानिक प्राधिकारी कानून के तहत पंजीकरण और नाम हटाने संबंधी अपने वैधानिक अधिकारों के अनुसार कार्य करते हैं।
- भारत निर्वाचन आयोग अपने संवैधानिक दायित्वों को पूर्ण निष्ठा एवं ईमानदारी के साथ निभाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है और लोकतंत्र को आगे बढ़ाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका को स्वीकार करता है।
पी. पवन
उप निदेशक
चुनाव आयोग ने इस खुलासे पर सफाई दी। उसने अपने ऊपर लगे आरोपों पर कहा है कि आयोग में फैसले मिल जुलकर लिए जाते हैं। सबकी राय सुनी जाती है। सूत्रों के मुताबिक चुनाव आयोग ने कहा, सभी फैसले, जिनमें SIR भी शामिल है, सर्वसम्मति से और दोनों चुनाव आयुक्तों तथा मुख्य चुनाव आयुक्त की मंजूरी से लिए गए हैं।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने वोट चोरी के आरोपों को लेकर भाजपा, आरएसएस और चुनाव आयोग पर निशाना साधा। राहुल गांधी ने एक्स पर एक वीडियो शेयर करते हुए कहा कि मैं चुनाव आयोग और उनके अधिकारियों को साफ कह रहा हूं। आप जो कर रहे हो, गलत कर रहे हो। ये देश के खिलाफ है। ये मत भूलिए, जब टाइम आएगा, हम आपको पकड़ेंगे, बचने वाले नहीं हो। इसके साथ ही उन्होंने पोस्ट पर लिखा कि वोट की चोरी भारत के लोगों के खिलाफ एक अपराध है। ये हमारे संविधान पर सीधा हमला है। इसे अंजाम देने वाले भाजपा, आरएसएस और चुनाव आयोग ने देशद्रोह का काम किया है। इंसाफ जरूर होगा।
इसके कुछ देर बाद अभिषेक मनु सिंघवी ने भी प्रेस वार्ता की। उन्होंने कहा कि मुख्य चनाव आयुक्त ने पूरी चुनाव आयोग को हाइजैक कर रखा है। उन्होंने अपने साथियों को भ्रम में रखा। आयोग का फैसला कोई अकेले नहीं ले सकता। उन्होंने यह भी कहा कि आज के समय संवैधानिक संस्थाएं बिल्कुल भी स्वतंत्र नहीं है।






