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भारत को पाम तेल सप्लाई करेगा कोलंबिया! इंडोनेशिया-मलेशिया पर निर्भरता घटाने की तैयारी, जल्द होगा समझौता ?

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भारत में खाद्य तेलों की बढ़ती मांग के बीच पाम तेल की आपूर्ति के लिए एक नया विकल्प सामने आया है। दक्षिण अमेरिकी देश कोलंबिया भारत को पाम तेल की सप्लाई बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकता है। इसके लिए भारत के खाद्य तेल कारोबारियों का संगठन सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SEA) कोलंबिया के साथ व्यापारिक सहयोग मजबूत करने की तैयारी कर रहा है।

रिपोर्ट के अनुसार, SEA अगले साल की शुरुआत में कोलंबिया में एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल भेजने की योजना बना रहा है। संगठन को कोलंबिया के राष्ट्रीय ऑयल पाम उत्पादक महासंघ Fedepalma के साथ समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर करने की उम्मीद है। इसका उद्देश्य दोनों देशों के बीच पाम तेल की खरीद, व्यापार और दीर्घकालीन सहयोग के लिए एक ढांचा तैयार करना है।

इंडोनेशिया और मलेशिया से सप्लाई पर क्यों बढ़ रही चिंता?

भारत अपनी खाद्य तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। अभी इंडोनेशिया और मलेशिया पाम तेल के प्रमुख वैश्विक आपूर्तिकर्ता हैं। लेकिन दोनों देश जैव ईंधन यानी बायोडीजल में पाम तेल के इस्तेमाल को बढ़ाने की दिशा में काम कर रहे हैं। इससे खाद्य उपयोग के लिए उपलब्ध तेल की मात्रा प्रभावित होने और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में उतार-चढ़ाव की आशंका है।

ऐसे में भारत के लिए दूसरे देशों से आयात के अवसर तलाशना जरूरी हो गया है। अगर प्रमुख आपूर्तिकर्ता देशों में घरेलू मांग बढ़ती है या निर्यात के लिए तेल कम उपलब्ध होता है, तो वैकल्पिक स्रोत भारतीय कारोबारियों को खरीद के अधिक विकल्प दे सकते हैं।

कोलंबिया पहले भी भारत को दे चुका है 2 लाख टन पाम तेल ?

कोलंबिया दुनिया का चौथा सबसे बड़ा पाम तेल उत्पादक देश माना जाता है और लैटिन अमेरिका में इसका उत्पादन सबसे अधिक है। रिपोर्टों के अनुसार, देश में सालाना करीब 20 लाख टन पाम तेल का उत्पादन होता है। SEA के मुताबिक, हाल के समय में कोलंबिया भारत को लगभग 2 लाख टन पाम तेल की आपूर्ति कर चुका है। इसलिए दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ाने की योजना केवल शुरुआती बातचीत तक सीमित नहीं है; पहले से मौजूद व्यापारिक संबंधों को आगे बढ़ाने की संभावना भी है।

SEA और Fedepalma के समझौते से क्या बदलेगा?

प्रस्तावित समझौता ज्ञापन का उद्देश्य दोनों पक्षों के बीच सहयोग को व्यवस्थित करना है। इसके जरिए पाम तेल की खरीद, व्यापारिक संपर्क और भविष्य में आपूर्ति के अवसर तलाशे जा सकते हैं। हालांकि, MoU पर हस्ताक्षर होने का मतलब यह नहीं होगा कि भारत को तुरंत निश्चित मात्रा में तेल मिलने लगेगा। वास्तविक आयात कीमत, गुणवत्ता, परिवहन खर्च, उपलब्धता और कंपनियों के बीच होने वाले कारोबारी समझौतों पर निर्भर करेगा। SEA का कहना है कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों में भारत को आयात के स्रोतों में विविधता लाने के साथ घरेलू तिलहन उत्पादन बढ़ाने पर भी ध्यान देना चाहिए।

क्या आम लोगों को सस्ता खाद्य तेल मिलेगा?

कोलंबिया से आयात बढ़ने पर भारतीय कारोबारियों को एक अतिरिक्त विकल्प मिल सकता है। इससे लंबे समय में आपूर्ति संबंधी जोखिम कम करने में मदद मिल सकती है। लेकिन इसका सीधा असर खुदरा कीमतों पर पड़ेगा, यह अभी निश्चित नहीं है। अंतरराष्ट्रीय बाजार की कीमतें, रुपये की विनिमय दर, आयात शुल्क और माल ढुलाई की लागत भी घरेलू कीमतों को प्रभावित करती हैं।

भारत को पाम तेल की नियमित आपूर्ति बनाए रखने के लिए कोलंबिया के साथ व्यापारिक संबंध मजबूत करने की योजना बना रहा है। SEA का प्रस्तावित दौरा और Fedepalma के साथ संभावित समझौता इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं। हालांकि, आयात में कितनी वृद्धि होगी और उपभोक्ताओं को इसका कितना लाभ मिलेगा, यह आगे होने वाले समझौतों और बाजार की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।

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