नई दिल्ली: तेल विपणन कंपनियों (OMCs) की ओर से एथेनॉल आपूर्ति वर्ष 2026-27 के लिए जारी नए टेंडर के बाद अनाज आधारित एथेनॉल उद्योग में कच्चे माल की कीमतों और खरीद आवंटन को लेकर बहस तेज हो गई है। ग्रेन एथेनॉल मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (GEMA) ने केंद्र सरकार और तेल कंपनियों से खरीद मूल्य तथा आवंटन के नियमों की समीक्षा करने की मांग की है। एसोसिएशन का कहना है कि मौजूदा व्यवस्था से मक्का और चावल से एथेनॉल बनाने वाली इकाइयों के बीच प्रतिस्पर्धा का संतुलन बिगड़ सकता है।
चावल आधारित एथेनॉल को मिल सकता है अधिक लाभ ?
GEMA के अनुसार, नए टेंडर में अलग-अलग कच्चे माल से तैयार एथेनॉल के लिए निर्धारित कीमतों के कारण कंपनियों के बीच आवंटन को लेकर असमान स्थिति बन सकती है। एसोसिएशन को आशंका है कि कम कीमत वाले चावल आधारित विकल्पों को प्राथमिकता मिलने से मक्का आधारित एथेनॉल निर्माताओं को पर्याप्त खरीद ऑर्डर नहीं मिल पाएंगे।
टेंडर के तहत अधिशेष खाद्यान्न से बने एथेनॉल की कीमत ₹60.32 प्रति लीटर तय की गई है। क्षतिग्रस्त खाद्यान्न से तैयार एथेनॉल के लिए ₹64 प्रति लीटर और मक्का आधारित एथेनॉल के लिए ₹66 प्रति लीटर की मूल कीमत के साथ ₹2.79 प्रति लीटर का अतिरिक्त प्रोत्साहन निर्धारित किया गया है। GEMA का मानना है कि अलग-अलग कच्चे माल की लागत और उत्पादन संबंधी खर्च को ध्यान में रखते हुए खरीद मूल्य तथा आवंटन नीति की समीक्षा की जानी चाहिए।
मक्का उत्पादकों और एथेनॉल उद्योग पर क्या होगा असर?
मक्का का इस्तेमाल एथेनॉल उत्पादन के अलावा पशु आहार, स्टार्च और खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों में भी किया जाता है। ऐसे में इसकी मांग और उपलब्धता का संतुलन किसानों से लेकर औद्योगिक इकाइयों तक कई क्षेत्रों को प्रभावित कर सकता है।
GEMA को आशंका है कि यदि चावल आधारित एथेनॉल को अधिक खरीद आवंटन मिलता है और मक्का के लिए प्रोत्साहन सीमित रहता है, तो मक्का आधारित उत्पादन की व्यावसायिक व्यवहार्यता प्रभावित हो सकती है। इससे मक्का की औद्योगिक मांग और किसानों को मिलने वाले बाजार अवसरों पर भी असर पड़ने की संभावना है। हालांकि, इसका वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि तेल कंपनियां अलग-अलग कच्चे माल से तैयार एथेनॉल के लिए कितना आवंटन करती हैं और बाजार में संबंधित अनाज की उपलब्धता कैसी रहती है।
चीनी आधारित एथेनॉल पर प्रतिबंध से बढ़ी अनाज की अहमियत ?
एथेनॉल आपूर्ति वर्ष 2026-27 के लिए गन्ने के रस, चीनी और बी-हैवी मोलासेस से बनने वाले एथेनॉल को नए टेंडर में शामिल नहीं किया गया है। इसके चलते मक्का और चावल जैसे अनाज आधारित विकल्पों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। सी-हैवी मोलासेस से तैयार एथेनॉल को खरीद के लिए पात्र रखा गया है। भारत में पेट्रोल के साथ एथेनॉल मिलाने का उद्देश्य कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटाना और घरेलू स्तर पर वैकल्पिक ईंधन को बढ़ावा देना है। लेकिन इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए कच्चे माल की उपलब्धता, किसानों के हितों और खाद्य सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखना भी जरूरी है।
सरकार से पारदर्शी आवंटन व्यवस्था की मांग ?
GEMA ने सरकार और तेल विपणन कंपनियों से मांग की है कि एथेनॉल खरीद के नियमों को अधिक स्पष्ट बनाया जाए। एसोसिएशन के मुताबिक, उत्पादकों को यह जानकारी मिलनी चाहिए कि मक्का, अधिशेष चावल और क्षतिग्रस्त खाद्यान्न से बने एथेनॉल के बीच खरीद आवंटन किस आधार पर किया जाएगा। इसके साथ ही, खाद्य और पशु आहार की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए अनाज की वास्तविक उपलब्धता का आकलन करना भी जरूरी है। यदि खरीद व्यवस्था में सभी प्रमुख कच्चे माल को उचित अवसर मिलता है, तो उद्योग को निवेश और उत्पादन की बेहतर योजना बनाने में मदद मिल सकती है।
एथेनॉल उद्योग के सामने इस समय चुनौती केवल उत्पादन बढ़ाने की नहीं, बल्कि कच्चे माल की आपूर्ति को टिकाऊ बनाए रखने की भी है। सरकार और तेल कंपनियों के सामने ऐसा खरीद ढांचा तैयार करने की जरूरत है, जो लागत, उपलब्धता, खाद्य सुरक्षा और किसानों के हितों को ध्यान में रखे। GEMA की मांग है कि मक्का और चावल आधारित एथेनॉल के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए कीमतों और आवंटन नियमों की संयुक्त रूप से समीक्षा की जाए। अब इस मुद्दे पर सरकार और तेल कंपनियों का अगला कदम महत्वपूर्ण होगा।
एथेनॉल खरीद नीति में संतुलन से उद्योग को स्थिरता मिल सकती है, जबकि अनाज की उपलब्धता और खाद्य सुरक्षा पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों का आकलन भी जरूरी है। आने वाले समय में खरीद आवंटन और मूल्य निर्धारण के फैसले भारत के एथेनॉल उद्योग की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।






