चौथा अक्षर एक राष्ट्रीय साप्ताहिक समाचार पत्र है 27 वर्ष पूर्व 1998 में चौथा अक्षर का पंजीयन एक साप्ताहिक समाचार पत्र के रूप में हुआ था | जिसकी पंजीयन संख्या DELHIN/1998/00314 है | अब आपका अपना यह अख़बार चौथा अक्षर (साप्ताहिक) नये तेवर और बेहतर क्लेवर के साथ आपके हाथों में होगा साथ ही राजधानी दिल्ली, मुंबई,लखनऊ और भोपाल से चौथा अक्षर हिंदी दैनिक के प्रकाशन की योजना पर काम चल रहा है | chauthaakshar.com उसी का हिंदी न्यूज़ चैनल वेबसाइट है, जहाँ देश-विदेश की ताज़ा खबरें, राजनीति, खेल, मनोरंजन, बिज़नेस और समाज से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी सरल हिंदी भाषा में प्रकाशित की जाती है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक तेज़, सटीक और भरोसेमंद समाचार पहुँचाना है, ताकि आप हमेशा अपडेट और जागरूक रह सकें।
हमारे बारे में
आज के दौर में जब पत्रकारिता के मायने बदल गये हैं, मुख्यधारा की पत्रकारिता रीढ़ विहीन सी हो गयी है, पत्रकारिता सत्ता की पैरोकार और औद्योगिक घराने की पिछलग्गू हो गई धीरे धीरे पत्रकारिता सत्ता को चुनौती देने और उसकी खामियों को उजागर करने के बजाय उसकी चरण वंदना करने लगी, खासतौर पर टीवी पत्रकारिता की हालत तो और भी गर्त में चली गयी है और हिन्दी पत्रकारिता का तो कहना ही क्या? इसके पीछे भय या लोभ कुछ भी हो सकता है। पत्रकारिता के मायने पत्रकारिता के उच्च मापदंडों का अनुपालन, बिना किसी भेदभाव के समाचार और विचारों का प्रकाशन, समाचारों में संयम और संतुलन सनसनीखेज भाषा से परहेज, राजनैतिक प्रभाव से दूर, निष्पक्ष, समाज की चिंताओं से सरोकार और जनता की आवाज का संवाहक होता है। पत्रकारिता के सही मायने में कोशिश कहीं से भी हो, किसी की भी, छोटी या बड़ी किसी भी रुप में हो आवाज कहीं से उठे सिलसिला कहीं से भी शुरू हो लेकिन शुरु होना चाहिए। हमारी कोशिश पत्रकारिता के इसी मायने को ईमानदारी के साथ सबल और सशक्त बनाने का एक छोटा सा प्रयास है।
रहा सवाल हमारे यानि श्याम लाल शर्मा के बारे में तो इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हमने स्नातक और हिन्दी में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल करने के साथ, रेडियो वार्ता, दैनिक जागरण (इलाहाबाद) में बतौर सम्पादकीय सहायक/संवाददाता से दैनिक जागरण दिल्ली, राष्ट्रीय सहारा, संध्या प्रहरी के बाद दिसम्बर 1998 से अपने अखबार चौथा अक्षर का सम्पादन और प्रकाशन.! 27 सालों का यह सफर तमाम झंझावतों और उतार चढ़ावों के बीच होकर गुजरा, कंकरीले और रेतीले रास्तों से होते हुए कभी लड़खड़ाये, गिरे, संभले उठे और फिर चल पड़े अपनी मंजिल की ओर..! इन श्रेय श्रीमती वीना शर्मा को जाता है और उनकी हौसला अफजाई और बुलंद हौसले का ही नतीजा है, कि हम सतत मंजिल की तरफ अग्रसर हैं..!
