संजय कुमार सिंह/ नई दिल्ली
भाजपा अगर राहुल गांधी को पप्पू साबित करने में लगी है तो भाजपा विरोधी उसे अनपढ़ों की पार्टी कहते रहे हैं पर यह कोई मुद्दा नहीं है। मुद्दा यह संयोग है कि राहुल गांधी ने भाजपा को किताबों की राजनीति में घसीट लिया है। निशिकांत दुबे जो कर रहे हैं उससे भाजपा फंस रही है या बच रही है बाद में समझ में आएगा। फिलहाल तो तथ्य यह है कि किताब की मुद्रित कॉपी राहुल गांधी के पास है और प्रधानमंत्री लोकसभा में बोल नहीं पाए। राहुल गांधी पर सदन को गुमराह करने का आरोप लगाने वाले लोग सदन को गुमराह करते पकड़ लिए गए हैं। दिलचस्प यह कि किताब में पांच लोगों की यह प्रशंसा छपी हुई है और इससे जाहिर है कि किताब पढ़ने वालों की संख्या भी ठीक-ठाक होगी। अब इसके तथ्यों से समस्या है तो यह नीयति के चार सितारों का मामला है। पढ़िए पांच लोगों की प्रशंसा
‘लेखक के अपने जीवन के प्रत्यक्ष अनुभव के रूप में, एक आत्मकथा पाठकों को एक बेजोड़ स्तर की आत्मीयता प्रदान करती है। मनोज नरवणे की सीधी-सच्ची किताब ‘फोर स्टार्स ऑफ़ डेस्टिनी’ सिर्फ़ यही नहीं है, बल्कि यह भारत की सेना के अंदर अलग-अलग भूमिकाओं, कामकाज और चल रही बहसों की एक अंतरंग और सच्ची जानकारी भी देती है। गलवान घाटी की घटना से पहले और बाद में पूर्वी लद्दाख में भारत-चीन टकराव (ऑपरेशन स्नो लेपर्ड) का उनका विस्तृत और स्पष्ट वर्णन बहुत जानकारीपूर्ण और रोमांचक है। यह निश्चित रूप से हर पाठक का एड्रेनलाईन स्तर बढ़ा देगा। एक आत्मकथा लेखक के तौर पर, मनोज नरवणे का मानना है कि “मैं सिर्फ़ अपने लिए सफलता नहीं चाहता, मैं चाहता हूँ कि मेरी सफलता से दूसरों को भी फ़ायदा हो।”
— जनरल वीपी मलिक, पूर्व सेना प्रमुख
‘फोर स्टार्स ऑफ़ डेस्टिनी हमारे सबसे प्रमुख सेना जनरलों में से एक की प्रेरणादायक कहानी है। आकर्षक, ज्ञानवर्धक और विचारोत्तेजक, जनरल नरवणे अपने जीवन और समय के इस वृत्तांत में नेतृत्व, प्रबंधन और जीवन को पूरी तरह से जीने का क्या मतलब है, इस पर महत्वपूर्ण सबक देते हैं—सभी पीढ़ियों के पाठकों के लिए अवश्य पढ़ें!’
— शशि थरूर, तिरुवनंतपुरम से लोकसभा सांसद, रसायन और उर्वरक पर संसदीय स्थायी समिति के अध्यक्ष।
‘जनरल मनोज मुकुंद नरवणे भारतीय सेना में अपने जीवन और इसके अट्ठाईसवें प्रमुख के रूप में शीर्ष पर पहुँचने की आकर्षक झलकियाँ पेश करते हैं। एक प्रभावशाली व्यक्तिगत वृत्तांत के रूप में, फोर स्टार्स ऑफ़ डेस्टिनी हमारे सशस्त्र बलों में बढ़ती लोकप्रिय रुचि की जानकारी देगी। जनरल नरवणे की 2020 के गलवान संकट और हाल के रक्षा सुधारों पर रोमांचक चर्चा भारत की रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा नीतियों में रुचि रखने वाले सभी लोगों के लिए मूल्यवान जानकारी प्रदान करती है।’
—प्रो. सी. राजा मोहन, दक्षिण एशियाई अध्ययन संस्थान, नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ सिंगापुर
‘स्पष्ट और व्यापक, भारत के अट्ठाईसवें सेना प्रमुख, जनरल एमएम नरवणे अपने सेना करियर के इस व्यक्तिगत वृत्तांत में कोई कसर नहीं छोड़ते। एक सैनिक और अधिकारी के तौर पर अपनी चालीस साल लंबी यात्रा का ज़िक्र करते हुए, जनरल नरवणे ने सबसे ऊंचे पद पर अपने कार्यकाल (2020–22) के बारे में विस्तार से बताया है, जो मुख्य रूप से लद्दाख में सीमा संकट और कोविड से निपटने में बीता। इस किताब को सैन्य पेशेवरों और रक्षा उत्साही दोनों ही बहुत दिलचस्पी से पढ़ेंगे। ‘निश्चित रूप से यह एक बेस्टसेलर’ है।
— नितिन ए. गोखले, मीडिया उद्यमी और रणनीतिक मामलों के विश्लेषक
‘एक असाधारण रूप से बेबाक आत्मकथा जो एक प्रतिष्ठित सैन्य करियर की कठिनाइयों, परेशानियों और सफलताओं को जीवंत रूप से दर्शाती है। जनरल नरवणे की कहानी में विनम्रता, आत्म-चिंतन और बौद्धिक जिज्ञासा का एक उल्लेखनीय मिश्रण है। यह दिलचस्प विवरण एक ऐसे नेता के अनुभवों की एक दुर्लभ और आकर्षक झलक पेश करता है, जिसने सम्मान और प्रतिष्ठा के साथ, विशेष रूप से उथल-पुथल वाले एक दौर में सेना का मार्गदर्शन किया’।
—डॉ (मेजर) अनित मुखर्जी, सीनियर लेक्चरर, किंग्स कॉलेज, लंदन
यह किताब, पत्नी वीना को हर सुख-दुख में साथ देने के लिए, बेटियों ईशा और अमला को जो उनकी ताकत और प्रेरणास्रोत हैं और भारतीय सेना को समर्पित है जिसने उन्हें अनजानी ऊंचाइयों तक पहुंचाया। जनरल नरवणे यह किताब नहीं लिखते तो राज्यपाल बन ही सकते थे और यह किताब तैयार होने के बाद दो साल से ज्यादा समय से लटकी हुई है तो तनाव औऱ परेशानी समझी जा सकती है।
कंप्यूटर अनुवाद, संपादित। अंग्रेजी में कॉपीराइट @ पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया






