अखिलेश अखिल
21वीं सदी की वैश्विक राजनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई दे रहा है। लंबे समय तक अंतरराष्ट्रीय आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था पर अमेरिका और यूरोप के नेतृत्व वाले पश्चिमी देशों का वर्चस्व रहा है। लेकिन अब ग्लोबल साउथ यानी एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के विकासशील देशों की भूमिका तेजी से बढ़ रही है। ब्रिक्स और जी -20 जैसे मंच इस परिवर्तन के प्रमुख प्रतीक बनकर उभरे हैं। सवाल यह है कि क्या ये मंच वास्तव में पश्चिमी विश्व व्यवस्था को चुनौती दे रहे हैं या केवल वैश्विक शक्ति संतुलन को नया रूप दे रहे हैं।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी वैश्विक आर्थिक व्यवस्था—जैसे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष , विश्व बैंक और विश्व व्यापार संगठन मुख्य रूप से पश्चिमी देशों के प्रभाव में रही। इन संस्थाओं की नीतियां अक्सर विकसित देशों की आर्थिक प्राथमिकताओं को ध्यान में रखकर बनाई गईं।हालांकि विकासशील देशों ने इन संस्थाओं से आर्थिक सहायता और तकनीकी सहयोग प्राप्त किया, लेकिन समय के साथ यह असंतोष भी बढ़ा कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में उनकी भागीदारी सीमित है।इसी असंतोष ने ग्लोबल साउथ को नए मंचों और वैकल्पिक संस्थाओं की ओर प्रेरित किया।
ब्रिक्स का उभार
ब्रिक्स यानी ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका का समूह। इस बदलाव का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। 2009 में शुरू हुआ यह मंच आज दुनिया की लगभग 40 प्रतिशत आबादी और वैश्विक अर्थव्यवस्था के एक बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है।हाल के वर्षों में ब्रिक्स ने अपने दायरे का विस्तार भी किया है। नए सदस्य देशों के जुड़ने से यह मंच एक व्यापक दक्षिण-दक्षिण सहयोग नेटवर्क में बदलता जा रहा है।
ब्रिक्स का सबसे महत्वपूर्ण कदम न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) की स्थापना रहा है, जिसे विश्व बैंक और IMF के विकल्प के रूप में देखा जाता है। इसका उद्देश्य विकासशील देशों को बुनियादी ढांचे और सतत विकास परियोजनाओं के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करना है।
जी -20 और ग्लोबल साउथ
जी -20 एक ऐसा मंच है जहां विकसित और विकासशील दोनों प्रकार के देश शामिल हैं। यह वैश्विक अर्थव्यवस्था के लगभग 85 प्रतिशत हिस्से और दो-तिहाई आबादी का प्रतिनिधित्व करता है।हाल के वर्षों में जी -20 की भूमिका केवल आर्थिक समन्वय तक सीमित नहीं रही, बल्कि जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर भी इसका प्रभाव बढ़ा है।भारत की जी -20 अध्यक्षता (2023) के दौरान अफ्रीकी संघ को स्थायी सदस्यता दिलाना ग्लोबल साउथ के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना गया। इससे यह संदेश गया कि वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में विकासशील देशों की भागीदारी बढ़ाई जा सकती है।
क्या यह पश्चिमी व्यवस्था के लिए चुनौती है?
ब्रिक्स और जी -20 के बढ़ते प्रभाव को कुछ विश्लेषक पश्चिमी प्रभुत्व के लिए चुनौती के रूप में देखते हैं। खासकर अमेरिका और यूरोप में यह चिंता व्यक्त की जाती है कि ये मंच डॉलर आधारित वैश्विक वित्तीय व्यवस्था और पश्चिमी संस्थानों के प्रभाव को कमजोर कर सकते हैं।उदाहरण के लिए, ब्रिक्स देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की चर्चा अक्सर होती रहती है। अगर यह पहल व्यापक स्तर पर लागू होती है, तो वैश्विक व्यापार में डॉलर की भूमिका पर असर पड़ सकता है।हालांकि वास्तविकता यह भी है कि ब्रिक्स और जी -20 अभी तक पूरी तरह पश्चिमी व्यवस्था के विकल्प नहीं बने हैं। इन मंचों के सदस्य देशों के बीच भी कई मतभेद हैं—जैसे भारत और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा।
भारत की संतुलित रणनीति
इस बदलते परिदृश्य में भारत की भूमिका बेहद दिलचस्प है। भारत खुद को पश्चिम और ग्लोबल साउथ के बीच एक पुल के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहा है।भारत की विदेश नीति का आधार है मल्टी-अलाइनमेंट—यानी विभिन्न शक्तियों के साथ समानांतर संबंध बनाए रखना। भारत एक ओर अमेरिका, यूरोप और जापान के साथ रणनीतिक साझेदारी बढ़ा रहा है, वहीं दूसरी ओर ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन जैसे मंचों में भी सक्रिय है।यह संतुलन भारत को एक ऐसी स्थिति में लाता है जहां वह वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है।
ग्लोबल साउथ की राजनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि अब विकास सहयोग केवल सरकारी सहायता तक सीमित नहीं रहा। निजी निवेश, परोपकार संस्थाएं और बहुपक्षीय साझेदारियां भी इसमें बड़ी भूमिका निभा रही हैं।भारत अफ्रीका, दक्षिण एशिया और प्रशांत क्षेत्र में बुनियादी ढांचा, डिजिटल तकनीक और स्वास्थ्य क्षेत्र में सहयोग बढ़ाकर इस मॉडल को मजबूत कर रहा है।
भविष्य की दिशा
वैश्विक राजनीति में शक्ति संतुलन का यह बदलाव धीरे-धीरे हो रहा है। ब्रिक्स और जी -20 जैसे मंच पश्चिमी व्यवस्था को पूरी तरह समाप्त नहीं कर रहे, लेकिन वे उसे अधिक बहुध्रुवीय बना रहे हैं।
इस प्रक्रिया में ग्लोबल साउथ की आवाज पहले से अधिक प्रभावशाली हो सकती है।भारत के लिए यह एक महत्वपूर्ण अवसर है। यदि वह अपनी आर्थिक क्षमता, कूटनीतिक संतुलन और विकास अनुभव का सही उपयोग करता है, तो वह न केवल ग्लोबल साउथ की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व कर सकता है, बल्कि वैश्विक व्यवस्था के नए स्वरूप को भी आकार दे सकता है।आने वाले दशक में यह स्पष्ट होगा कि ब्रिक्स और जी -20 वास्तव में वैश्विक शक्ति संतुलन को कितना बदल पाते हैं। लेकिन इतना तय है कि ग्लोबल साउथ अब केवल वैश्विक राजनीति का दर्शक नहीं, बल्कि एक सक्रिय खिलाड़ी बन चुका है।






