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मध्य-पूर्व की सबसे बड़ी आबादी कुर्दिस्तान एक बार फिर से चर्चा में 

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अखिलेश अखिल 

ईरान के खिलाफ इजरायल और अमेरिका का संयुक्त हमले बीच एक बार फिर से कुर्दिस्तान की चर्चा हो रही है। अमेरिका अब ईरान को यह भी डर दिखा रहा है कि ईरान के खिलाफ ईरान के कूर्द को भी मैदान में उतारा जा सकता है। अमेरिका ऐसा करता है तो जाहिर है कि ईरान के भीतर बड़ा गृह युद्ध छिड़ सकता है। ऐसे में यह जानने की जरूरत है कि आखिर ये कूर्द कौन हैं और फिर कुर्दिस्तान की मांग क्या है ?
मध्य-पूर्व की राजनीति में कुर्दों का सवाल एक ऐसा मुद्दा है जो सौ साल से अधिक समय से अधूरा पड़ा है। लगभग 3 से 4 करोड़ की आबादी वाले कुर्द दुनिया की सबसे बड़ी ऐसी जाति माने जाते हैं, जिनका अपना कोई स्वतंत्र देश नहीं है। उनकी पहचान, संस्कृति और भाषा अलग है, लेकिन वे चार देशों—तुर्की, इराक, ईरान और सीरिया—में बंटे हुए हैं। कुर्दों का सपना है “कुर्दिस्तान”, लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति, क्षेत्रीय हितों और इतिहास की जटिलताओं ने इस सपने को अब तक अधूरा रखा है।    कुर्द एक इंडो-यूरोपीय मूल की जाति माने जाते हैं, जिनकी भाषा कुर्दी है। यह भाषा भी कई बोलियों में बंटी हुई है—जैसे कुर्मांजी, सोरानी और पहलवानी।धार्मिक रूप से अधिकांश कुर्द सुन्नी मुसलमान हैं, लेकिन इनमें शिया, यज़ीदी, ईसाई और अन्य समुदाय भी मौजूद हैं।
कुर्दों की अपनी अलग सांस्कृतिक पहचान है—लोकगीत, पारंपरिक पोशाक, पर्व और सामाजिक ढांचा उन्हें अरब, फारसी या तुर्क समाज से अलग बनाते हैं। यही अलग पहचान उनके स्वतंत्र राष्ट्र की मांग की बुनियाद है।

कुर्दिस्तान का सपना कैसे टूटा?

कुर्दिस्तान की कहानी मुख्य रूप से पहले विश्व युद्ध (1914-1918) के बाद शुरू होती है। उस समय ऑटोमन साम्राज्य टूट रहा था। 1920 में हुए सेव्र (Treaty of Sèvres) समझौते में कुर्दों के लिए एक अलग देश बनाने की संभावना दिखाई दी थी।लेकिन तीन साल बाद 1923 की लॉज़ेन संधि (Treaty of Lausanne) में यह प्रस्ताव खत्म कर दिया गया। इसके बाद मध्य-पूर्व की सीमाएं इस तरह तय हुईं कि कुर्द चार अलग-अलग देशों में बंट गए।यही वह ऐतिहासिक मोड़ था जिसने कुर्दों को “बिना राज्य का राष्ट्र” बना दिया।

चार देशों में बंटे कुर्द

दुनिया के सबसे ज्यादा कुर्द तुर्की में रहते हैं—लगभग 1.5 से 2 करोड़।तुर्की में कुर्द आंदोलन का सबसे चर्चित संगठन PKK  है, जिसने 1980 के दशक से सशस्त्र संघर्ष शुरू किया। तुर्की सरकार PKK को आतंकवादी संगठन मानती है।कुर्दों का आरोप है कि तुर्की में उनकी भाषा और संस्कृति को लंबे समय तक दबाया गया।
इराक में कुर्दों को सबसे ज्यादा राजनीतिक स्वायत्तता मिली है।1991 के खाड़ी युद्ध के बाद और फिर 2003 में सद्दाम हुसैन के पतन के बाद इराक में Kurdistan Regional Government (KRG) स्थापित हुई।इराकी कुर्दों के पासअपनी संसद,अपनी सेना (पेशमर्गा)और अलग प्रशासन है।2017 में इराकी कुर्दों ने स्वतंत्रता जनमत संग्रह भी कराया, जिसमें 90% लोगों ने स्वतंत्र देश के पक्ष में वोट दिया। लेकिन इराक, तुर्की, ईरान और अंतरराष्ट्रीय शक्तियों के दबाव के कारण यह सपना पूरा नहीं हो पाया।
सीरिया के गृहयुद्ध के दौरान कुर्दों ने उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में अर्ध-स्वायत्त प्रशासन स्थापित कर लिया।
यह क्षेत्र अक्सर रोजावा (Rojava) के नाम से जाना जाता है।ISIS के खिलाफ लड़ाई में कुर्द लड़ाकों ने अहम भूमिका निभाई, और अमेरिका ने भी उन्हें सैन्य समर्थन दिया। इससे कुर्दों की ताकत और अंतरराष्ट्रीय पहचान बढ़ी।
और ईरान में भी लगभग 80 से 90 लाख कुर्द रहते हैं।यहां कई कुर्द संगठन सक्रिय रहे हैं, जैसे:
KDPI (Kurdistan Democratic Party of Iran),PJAK हैं। ईरान में कुर्दों और सरकार के बीच कई बार टकराव हुए हैं, हालांकि यहां आंदोलन अपेक्षाकृत सीमित रहा है।

कुर्दिस्तान बनने में सबसे बड़ी बाधाएं

कुर्दिस्तान को लेकर  क्षेत्रीय देशों का विरोध है। तुर्की, ईरान, इराक और सीरिया—चारों देश कुर्दिस्तान के गठन के खिलाफ हैं।उन्हें डर है कि अगर एक जगह कुर्द देश बन गया तो उनके अपने क्षेत्रों में अलगाववाद बढ़ सकता है। इसके साथ ही अमेरिका और पश्चिमी देश कई बार कुर्दों का समर्थन करते हैं, लेकिन स्वतंत्र देश के सवाल पर खुलकर साथ नहीं देते।कारण साफ है—मध्य-पूर्व में स्थिरता और सहयोगी देशों के साथ रिश्ते ज्यादा महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
फिर  कुर्दों के अंदर भी विभाजन है। कुर्द आंदोलन खुद भी कई राजनीतिक और वैचारिक गुटों में बंटा हुआ है।उदाहरण के लिए:इराक में KDP और PUK,तुर्की में PKK और सीरिया में YPG इनके बीच कई बार मतभेद भी सामने आते हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि निकट भविष्य में पूर्ण स्वतंत्र कुर्दिस्तान बनना मुश्किल है।लेकिन कुर्दों की राजनीतिक ताकत और स्वायत्तता धीरे-धीरे बढ़ रही है। इराक में स्वायत्त क्षेत्र ,सीरिया में अर्ध-स्वायत्त प्रशासन, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बढ़ती पहचान ये सभी संकेत देते हैं कि कुर्द सवाल अभी खत्म नहीं हुआ है।
कुर्दिस्तान का सपना केवल एक राजनीतिक मुद्दा नहीं बल्कि पहचान, इतिहास और आत्मनिर्णय के अधिकार का प्रश्न है।सौ साल पहले अंतरराष्ट्रीय समझौतों ने कुर्दों को चार देशों में बांट दिया था, लेकिन उनकी राष्ट्रीय चेतना खत्म नहीं हुई।मध्य-पूर्व की राजनीति में जब भी बड़े बदलाव होते हैं—युद्ध, सत्ता परिवर्तन या नई सीमाओं की चर्चा—तब कुर्दिस्तान का सवाल फिर उठ खड़ा होता है।इसीलिए कई विश्लेषक कहते हैं कि कुर्द समस्या मध्य-पूर्व की राजनीति का “अधूरा अध्याय” है, जो भविष्य में कभी भी नया मोड़ ले सकता है।

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