back to top

रिलीज से पहले ही बड़े विवाद में फंस गई मनोज बाजपेयी की आगामी ओटीटी फिल्म ‘घूसखोर पंडित’

Must Read

फ़िल्म संवाददाता/मुंबई , अभिनेता मनोज बाजपेयी की आगामी ओटीटी फिल्म ‘घूसखोर पंडित’ रिलीज से पहले ही बड़े विवाद में फंस गई है। फिल्म के शीर्षक में ‘पंडित’ शब्द के इस्तेमाल को लेकर देश के विभिन्न हिस्सों में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। ब्राह्मण संगठनों ने इसे समुदाय का अपमान बताया है। इस बीच फिल्म से जुड़े निर्माताओं को नोटिस भेजे गए हैं, लखनऊ में एफआईआर दर्ज हुई है और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने भी सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को नोटिस जारी किया है। बढ़ते विरोध के बीच अभिनेता मनोज बाजपेयी और निर्माता-निर्देशक नीरज पांडे ने सार्वजनिक बयान जारी कर अपना पक्ष रखा है।

कई शहरों में विरोध फिल्म का टीजर सामने आने के बाद जयपुर, दिल्ली और उज्जैन समेत कई शहरों में विरोध शुरू हो गया। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि ‘घूसखोर पंडित’ जैसा शीर्षक सीधे तौर पर एक जाति विशेष को भ्रष्टाचार से जोड़ता है, जिससे समाज में गलत संदेश जाता है। उज्जैन में अखिल भारतीय युवा ब्राह्मण समाज के प्रतिनिधियों ने फिल्म के नाम को ब्राह्मणों का अपमान बताया। संगठन के संस्थापक पं. महेश पुजारी ने कहा कि फिल्म के शीर्षक में ही पुजारी, पुरोहित और ब्राह्मण समाज का अपमान निहित है। तीर्थ पुरोहित पं. अमर डब्बावाला ने भी सेंसर बोर्ड से हस्तक्षेप की मांग की और कहा कि समाज में वैमनस्यता पैदा करने वाली फिल्मों पर रोक लगनी चाहिए। कुछ स्थानों पर प्रदर्शनकारियों ने कड़े शब्दों में चेतावनी भी दी है कि यदि फिल्म का नाम नहीं बदला गया तो वे सख्त कदम उठाएंगे।

विवाद ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती ने केंद्र सरकार से फिल्म पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है। उन्होंने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर पोस्ट करते हुए लिखा कि फिल्मों में ‘पंडित’ शब्द का अपमानजनक संदर्भ में उपयोग चिंता का विषय है और इससे ब्राह्मण समाज में रोष है। मायावती ने कहा कि ऐसी जातिसूचक फिल्मों पर केंद्र सरकार को तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए। उनके बयान के बाद यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया।

लखनऊ के हजरतगंज पुलिस स्टेशन में फिल्म के निर्देशक और टीम के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि फिल्म का शीर्षक जातिगत भावनाओं को आहत करता है। इसके अलावा, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को नोटिस जारी किया है। आयोग को ‘जेम्स ऑफ बॉलीवुड’ के संस्थापक संजीव नेवार की ओर से शिकायत प्राप्त हुई थी, जिसमें आरोप लगाया गया कि फिल्म का नाम जातिवादी और भेदभावपूर्ण है। शिकायत में कहा गया कि यह शीर्षक पहले से संवेदनशील सामाजिक वातावरण में तनाव को बढ़ावा दे सकता है। नेटफ्लिक्स, जिस पर यह क्राइम थ्रिलर रिलीज होनी है, की ओर से इस पर तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

बढ़ते विवाद के बीच अभिनेता मनोज बाजपेयी ने सोशल मीडिया पर एक विस्तृत बयान जारी किया। उन्होंने लिखा कि वे लोगों की भावनाओं और चिंताओं का सम्मान करते हैं और उन्हें गंभीरता से लेते हैं।मनोज ने कहा कि एक अभिनेता के रूप में वे अपने किरदार और कहानी के माध्यम से ही फिल्म से जुड़ते हैं। उनके अनुसार, यह फिल्म एक गलत व्यक्ति और उसके आत्म-साक्षात्कार की यात्रा की कहानी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि फिल्म का उद्देश्य किसी भी समुदाय पर टिप्पणी करना नहीं है। उन्होंने यह भी बताया कि जनता की भावनाओं को देखते हुए फिल्म निर्माताओं ने प्रचार सामग्री हटाने का निर्णय लिया है। यह कदम इस बात का संकेत है कि निर्माताओं ने उठाई गई चिंताओं को गंभीरता से लिया है।

फिल्म के निर्मातानिर्देशक नीरज पांडे ने भी इंस्टाग्राम पर लंबा स्पष्टीकरण जारी किया। उन्होंने कहा किघूसखोर पंडितएक काल्पनिक पुलिस ड्रामा है।पंडितशब्द का उपयोग केवल एक काल्पनिक पात्र के बोलचाल के नाम के रूप में किया गया है।नीरज पांडे ने स्पष्ट किया कि कहानी एक व्यक्ति के कर्मों और उसके निर्णयों पर केंद्रित है, न कि किसी जाति, धर्म या समुदाय के प्रतिनिधित्व पर। उन्होंने कहा कि वे अपने काम को गहरी जिम्मेदारी की भावना के साथ करते हैं और उनकी मंशा हमेशा सम्मानजनक कहानी प्रस्तुत करने की रही है।

सूत्रों के अनुसार, यह फिल्म एक भ्रष्ट पुलिस अधिकारी के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसे उसके व्यवहार के कारण ‘घूसखोर पंडित’ कहा जाता है। हालांकि विरोध करने वालों का तर्क है कि चाहे कहानी काल्पनिक हो, लेकिन शीर्षक में प्रयुक्त शब्द सामाजिक रूप से संवेदनशील है और इससे समुदाय विशेष की छवि प्रभावित हो सकती है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि शीर्षक सीधे तौर पर एक जाति को भ्रष्टाचार से जोड़ता है, जिससे सामाजिक पूर्वाग्रह और बढ़ सकते हैं।

यह विवाद एक बार फिर ओटीटी प्लेटफॉर्म पर कंटेंट रेगुलेशन की बहस को सामने ले आया है। जहां सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली फिल्मों को केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) की स्वीकृति लेनी होती है, वहीं ओटीटी प्लेटफॉर्म पर सामग्री के लिए अलग स्व-नियामक व्यवस्था है। विरोध करने वाले समूहों का कहना है कि ओटीटी पर भी संवेदनशील विषयों के मामले में सख्त निगरानी होनी चाहिए। दूसरी ओर, फिल्म से जुड़े लोग रचनात्मक स्वतंत्रता और काल्पनिक कथा की बात कर रहे हैं।

फिलहाल मामला कानूनी और सामाजिक दोनों स्तरों पर जारी है। एनएचआरसी के नोटिस और एफआईआर के बाद सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की संभावित कार्रवाई पर सबकी नजर है। साथ ही यह भी देखना होगा कि क्या निर्माता फिल्म का शीर्षक बदलने या किसी अन्य संशोधन पर विचार करते हैं। मनोज बाजपेयी और नीरज पांडे की सफाई के बावजूद विरोध थमता नजर नहीं आ रहा है। यह विवाद केवल एक फिल्म के शीर्षक तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सामाजिक संवेदनशीलता और सांस्कृतिक सम्मान के व्यापक प्रश्नों को भी सामने ले आया है। फिल्म की रिलीज से पहले ही उत्पन्न यह विवाद आने वाले दिनों में और तूल पकड़ सकता है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि निर्माता, सरकार और संबंधित संस्थाएं इस मुद्दे का समाधान किस तरह निकालती हैं।

- Advertisement -spot_imgspot_img

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisement -spot_imgspot_img
Latest News

खेतों में पहरा, दिल में डर: नीलगायों ने छीनी फूलपुर के किसानों की नींद

•⁠  ⁠प्रयागराज के फूलपुर में नीलगायों ने रौंदी खून-पसीने की कमाई, फसल बचाने की जंग हार रहे किसान, रूदापुर,...
- Advertisement -spot_imgspot_img

More Articles Like This

- Advertisement -spot_imgspot_img