आदित्य विश्वकर्मा
राजनीति कोई समाज अकेले अपने दम पर नहीं कर सकता राजनीति के लिए जातियों के गठबंधन बनाने पडते हैं उसके लिए बड़ा दिल और बडी सोच यानि वाईड थिंकिंग की जरूरत होती है और हम संकीर्णता मे बुरी तरह से उलझे समाज है हम विश्वकर्मा वंशज ही एकजुट नही हो पाते दूसरी जातियों को जोडना तो दूर की कौड़ी है । बढई लुहार सोनार धीमान जांगिड पांचाल टांक मैथिल सुतार से आगे की सोच हम रखते ही नही है तो अपने लगभग बराबर सामाजिक स्थिति की कारीगर जातियों को कैसे जोड़ पाएंगे?
कांग्रेस मे ब्राह्मणों ने सत्ता मे आने के लिए मुस्लिमो और दलितों तक का साथ ले लिया जिन्हें वो फूटी आँख भी नहीं सुहाते । चौधरी चरण सिंह ने अजगर समीकरण बनाया और मुसलमानों तथा उन जातियों को भी साथ लिया जिन्हें जाट पसंद नहीं करते । लेकिन हमारी सोच है कि छोटी मानी जाने वाली जातियों के साथ जाकर हम छोटे हो जाएँगे । ब्राह्मण मायावती के साथ तक चले गए समाजवादी पार्टी के साथ भी गये ।यह परिपक्व सोच कहलाती है और हमारे समाज जैसी सोच अपरिपक्व सोच कहलाती हैं ।
पिछले कुछ सालों में निसंदेह हमने हर क्षेत्र में उन्नति की है लेकिन राजनीति में बहुत पिछड़ गये हैं ।लोकतंत्र में फैसले संसद विधानसभाओं में होते है और वहाँ हमारे नुमाइंदे ही नहीं है तो हमारे हितों की बात कौन करेगा केवल पन्द्रह हज़ार रूपए के टूल किट से ही संतोष करना पड़ेगा ।समाज का एक व्यक्ति यदि राजनीति में उच्च स्तर तक पहुँच जाए तो पूरे समाज की स्थिति बदल जाती है जाट यादव गुर्जर कुर्सी जाटव लोधी आदि जातियों को देख लीजिए ।
दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमारे समाज की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार तब होगा जब कर्पूरी ठाकुर करूणानिधि की तरह अतिपिछडे अत्यंत पिछड़े वर्ग के प्रभुत्व वाली सरकार बनेगी ।इसके लिए हमे जन्म और कर्म से जो लोग कारीगर शिल्पकार का काम करते हैं उन्हें साथ लेना होगा और इसके साथ वंचित वर्ग को साथ लेना होगा अकेले विश्वकर्मा समाज राजनीति में कुछ ख़ास नही कर सकता ।






