म्यूचुअल फंड में निवेश करने वाले लोगों के सामने अक्सर यह सवाल रहता है कि बड़ी रकम को एक ही फंड में लगाया जाए या कई अलग-अलग स्कीम में बांट दिया जाए। खासतौर पर जब निवेश की राशि ₹10 लाख हो, तो निवेशक जोखिम कम करने के लिए 8-10 फंड चुनने लगते हैं। लेकिन ज्यादा फंड खरीद लेना हमेशा ज्यादा सुरक्षा की गारंटी नहीं देता। कई बार जरूरत से ज्यादा डायवर्सिफिकेशन पोर्टफोलियो को जटिल बना देता है और एक जैसे शेयरों में अप्रत्यक्ष रूप से बार-बार निवेश हो जाता है।
3 से 5 फंड का संतुलित पोर्टफोलियो क्यों बेहतर हो सकता है?
निवेश विशेषज्ञों बलवंत जैन और पंकज मठपाल की सलाह का मूल विचार यही है कि निवेशक को बिना जरूरत बहुत ज्यादा म्यूचुअल फंड रखने से बचना चाहिए। यदि आपके पास ₹10 लाख निवेश करने के लिए हैं, तो हर फंड में केवल ₹1 लाख लगाने के बजाय 3 से 5 अच्छी तरह चुनी गई स्कीम में राशि बांटना ज्यादा व्यावहारिक हो सकता है। इसका उद्देश्य फंड की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि अलग-अलग एसेट और निवेश रणनीतियों के बीच उचित संतुलन बनाना होना चाहिए।
मान लीजिए कोई निवेशक ₹10 लाख को 10 फंड में बराबर बांटता है। ऐसे में प्रत्येक फंड में ₹1 लाख जाएगा। दूसरी तरफ 4 फंड का पोर्टफोलियो बनाया जाए तो औसतन ₹2.50 लाख प्रति फंड निवेश किया जा सकता है। इससे निवेश की निगरानी आसान रहती है और प्रत्येक स्कीम का पोर्टफोलियो में वास्तविक योगदान भी महत्वपूर्ण रहता है। उदाहरण के तौर पर ₹10 लाख को चार हिस्सों में बांटने की एक सामान्य संरचना बनाई जा सकती है। ₹3 लाख किसी बड़े और स्थिर लार्ज-कैप या फ्लेक्सी-कैप फंड में, ₹2.5 लाख किसी दूसरे फ्लेक्सी-कैप या मल्टी-कैप विकल्प में, ₹2.5 लाख मिड-कैप कैटेगरी में और ₹2 लाख किसी अपेक्षाकृत कम जोखिम वाले डेट या हाइब्रिड विकल्प में रखे जा सकते हैं। यह केवल उदाहरण है, व्यक्तिगत निवेश सलाह नहीं। वास्तविक वितरण निवेशक की उम्र, जोखिम क्षमता, आय और लक्ष्य के अनुसार बदल सकता है। अब रिटर्न का गणित समझिए। अगर ₹10 लाख का निवेश औसतन 10% सालाना चक्रवृद्धि रिटर्न देता है, तो 5 साल बाद रकम लगभग ₹16.11 लाख हो सकती है। 12% सालाना रिटर्न की स्थिति में यही रकम करीब ₹17.62 लाख और 8% रिटर्न पर लगभग ₹14.69 लाख हो सकती है। ध्यान रहे कि म्यूचुअल फंड में रिटर्न निश्चित नहीं होता और वास्तविक परिणाम बाजार की परिस्थितियों पर निर्भर करेंगे।
यदि निवेश की अवधि 5 साल से अधिक है, तो केवल फंडों की संख्या देखने के बजाय सही कैटेगरी, जोखिम और निवेश लक्ष्य पर ध्यान देना ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। इक्विटी फंडों में बाजार गिरने पर उतार-चढ़ाव काफी हो सकता है, इसलिए छोटी अवधि के पैसों को केवल ज्यादा रिटर्न की उम्मीद में इक्विटी में लगाना उचित नहीं माना जाता। सबसे जरूरी बात यह है कि 10 फंड रखने से जोखिम अपने आप 10 गुना कम नहीं होता। अलग-अलग स्कीमों के पोर्टफोलियो में एक ही कंपनियां शामिल हो सकती हैं, जिससे वास्तविक डायवर्सिफिकेशन उम्मीद से कम रह जाता है। इसलिए ₹10 लाख के निवेश में कम लेकिन अच्छी तरह चुनी गई 3-5 स्कीम कई निवेशकों के लिए ज्यादा सरल और प्रभावी रणनीति हो सकती है। निवेश से पहले फंड की कैटेगरी, खर्च, जोखिम, पोर्टफोलियो और अपने वित्तीय लक्ष्य की जांच जरूर करें।






