भारतीय शेयर बाजार के इतिहास में रिलायंस का नाम एक महत्वपूर्ण बदलाव से जुड़ा है। साल 1977 में जब धीरूभाई अंबानी की कंपनी रिलायंस टेक्सटाइल इंडस्ट्रीज पहली बार शेयर बाजार में उतरी, तब शेयरों में निवेश आम लोगों के बीच आज जितना लोकप्रिय नहीं था। इस आईपीओ ने छोटे निवेशकों को भी कंपनी की विकास यात्रा में भागीदार बनने का अवसर दिया। करीब पांच दशक बाद, रिलायंस समूह की डिजिटल और दूरसंचार कंपनी जियो प्लेटफॉर्म्स का मेगा आईपीओ एक बार फिर बाजार में चर्चा का विषय बना है।
1977 का आईपीओ: छोटे निवेशकों के लिए नई शुरुआत ?
नवंबर 1977 में रिलायंस टेक्सटाइल इंडस्ट्रीज ने अपना आईपीओ पेश किया था। कंपनी ने 28 लाख शेयर 10 रुपये प्रति शेयर की कीमत पर जारी किए और इस निर्गम से लगभग 2.8 करोड़ रुपये जुटाए। रिलायंस के आधिकारिक इतिहास के मुताबिक, इस आईपीओ को सात गुना सब्सक्रिप्शन मिला था।
उस दौर में शेयर बाजार में निवेश करने वालों का दायरा अपेक्षाकृत सीमित था। धीरूभाई अंबानी ने आम निवेशकों को कंपनी के कारोबार में हिस्सेदारी लेने के लिए प्रोत्साहित किया। इससे शेयर बाजार को केवल बड़े और अनुभवी निवेशकों तक सीमित मानने की धारणा को चुनौती मिली। रिलायंस की कहानी ने यह विचार लोकप्रिय बनाने में भूमिका निभाई कि आम नागरिक भी किसी कंपनी के शेयर खरीदकर उसके विकास में भागीदार बन सकते हैं। कंपनी ने आगे चलकर टेक्सटाइल से पॉलिएस्टर, पेट्रोकेमिकल्स, रिफाइनिंग और दूरसंचार जैसे क्षेत्रों में विस्तार किया। इस यात्रा ने निवेशकों का ध्यान कंपनी के दीर्घकालीन विकास और शेयरधारकों की भागीदारी की ओर आकर्षित किया। हालांकि, किसी कंपनी की ऐतिहासिक सफलता भविष्य में उसके शेयर से लाभ मिलने की गारंटी नहीं होती।
2026 में जियो प्लेटफॉर्म्स का ₹30,213 करोड़ का आईपीओ ?
अक्टूबर 2026 में रिलायंस समूह की जियो प्लेटफॉर्म्स ने 30,213 करोड़ रुपये का आईपीओ पेश किया। यह इश्यू 23 अक्टूबर को बंद हुआ और उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, इसे कुल मिलाकर 22.19 गुना सब्सक्रिप्शन मिला। पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, आईपीओ के लिए लगभग 1.39 करोड़ आवेदन आए। यह संख्या भारत में किसी आईपीओ के लिए दर्ज किए गए पिछले आवेदन रिकॉर्ड से अधिक थी। कुल मांग में संस्थागत निवेशकों की बड़ी भूमिका रही, जबकि खुदरा निवेशकों की श्रेणी भी निर्धारित हिस्से से अधिक सब्सक्राइब हुई।
1977 और 2026: बदल गया बाजार का आकार ?
1977 में रिलायंस ने लगभग 2.8 करोड़ रुपये जुटाए थे, जबकि जियो प्लेटफॉर्म्स का इश्यू 30,213 करोड़ रुपये का है। दोनों के बीच अंतर सिर्फ रकम का नहीं, बल्कि भारतीय पूंजी बाजार के विस्तार का भी है। आज निवेशक डिजिटल माध्यमों से आईपीओ में आवेदन कर सकते हैं। डीमैट खाते, ऑनलाइन ट्रेडिंग और संस्थागत निवेश की बढ़ती भागीदारी ने शेयर बाजार तक पहुंच आसान बनाई है। जियो के आईपीओ में बड़ी संख्या में आए आवेदन इस बदलाव की एक मिसाल हैं।
निवेशकों के लिए क्या है सीख?
आईपीओ का कई गुना सब्सक्राइब होना निवेशकों की दिलचस्पी दिखाता है, लेकिन इससे लिस्टिंग के बाद मुनाफा मिलने की गारंटी नहीं मिलती। निवेश से पहले कंपनी का मूल्यांकन, वित्तीय स्थिति, कारोबार की संभावनाएं और जोखिम समझना जरूरी है।
1977 में रिलायंस के आईपीओ ने आम निवेशकों की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 2026 में जियो प्लेटफॉर्म्स का आईपीओ भारतीय पूंजी बाजार के बड़े पैमाने और बढ़ती निवेशक भागीदारी को दर्शाता है। दोनों घटनाएं अलग-अलग दौर में भारत के शेयर बाजार के विकास की अहम मिसाल हैं।






