अखिलेश अखिल
पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच बढ़ता सैन्य तनाव अब खुले टकराव की दिशा में जाता दिख रहा है। पाकिस्तान ने ‘ऑपरेशन गज़ब-लिल-हक’ नाम से एक बड़े सैन्य अभियान की घोषणा की है। इस अभियान के तहत काबुल, कंधार और पकतिया जैसे अहम इलाकों में हवाई हमलों का दावा किया गया है। दक्षिण एशिया पहले ही अस्थिरताओं से घिरा है। ऐसे में ‘न्याय के नाम पर प्रकोप’ यदि लंबा खिंचता है, तो इसका खामियाजा केवल दो देशों तक सीमित नहीं रहेगा। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि ‘ऑपरेशन गज़ब-लिल-हक’ एक सीमित सैन्य संदेश था या किसी बड़े भू-राजनीतिक संकट की शुरुआत। पाकिस्तान का कहना है कि इस कार्रवाई में 130 से अधिक लड़ाके मारे गए हैं और कई सैन्य ठिकाने तबाह कर दिए गए हैं। दूसरी ओर, अफगान तालिबान पलटवार का दावा करते हुए पाक चौकियों पर कब्जे और 55 सैनिकों को मार गिराने की बात कह रहा है—हालांकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
यह ऑपरेशन सिर्फ सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक और वैचारिक संदेश भी है। इसके नाम को लेकर भी व्यापक चर्चा हो रही है।
‘गज़ब’ अरबी शब्द है, जिसका अर्थ है प्रचंड क्रोध या दैवी प्रकोप।‘लिल’ का अर्थ है ‘के लिए’।‘हक’ का अर्थ है ‘सत्य’ या ‘न्याय’।इस तरह पूरा वाक्यांश हुआ—“सत्य/न्याय के लिए प्रकोप” या “न्याय का क्रोध”।
नामकरण से स्पष्ट है कि पाकिस्तान इस अभियान को वैधता और नैतिक आधार देने की कोशिश कर रहा है। यह संदेश घरेलू दर्शकों के लिए भी है और सीमा पार के लिए भी—कि यह हमला आक्रामक विस्तार नहीं, बल्कि “न्यायोचित प्रतिक्रिया” है।
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ और सूचना मंत्री अताउल्लाह तरार ने आरोप लगाया है कि अफगान तालिबान सरकार ने तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) जैसे संगठनों को पनाह दी है और सीमा पर उकसावे वाली गोलीबारी की है। इस पृष्ठभूमि में पाकिस्तान ने इसे अपनी क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा का कदम बताया है।ख्वाजा आसिफ का बयान—“अब धैर्य जवाब दे चुका है”—इस बात का संकेत है कि इस बार पाकिस्तान सीमित जवाबी कार्रवाई से आगे बढ़ने को तैयार है। “ओपन वॉर” जैसे शब्दों का प्रयोग यह दर्शाता है कि स्थिति सामान्य सीमा झड़पों से आगे निकल चुकी है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, पाक वायुसेना ने अफगानिस्तान के भीतर कथित आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया। पाकिस्तान का दावा है कि दर्जनों टैंक, हथियार डिपो और सैन्य अड्डे नष्ट किए गए।लेकिन तालिबान प्रशासन इन दावों को चुनौती देते हुए कह रहा है कि उसने पाकिस्तानी चौकियों पर कब्जा किया और भारी नुकसान पहुंचाया। दोनों पक्षों के दावों की स्वतंत्र पुष्टि फिलहाल संभव नहीं है, जिससे सूचनात्मक युद्ध भी इस संघर्ष का हिस्सा बन गया है।
बता दें कि पिछले महीनों में कतर की मध्यस्थता से संघर्ष विराम की कोशिशें हुई थीं। लेकिन बढ़ते हवाई हमले और सीमा पार जवाबी कार्रवाई से यह स्पष्ट है कि भरोसे की नींव कमजोर है। यदि यह संघर्ष लंबा खिंचता है, तो मानवीय संकट और शरणार्थी समस्या भी बढ़ सकती है, जिसका असर पूरे क्षेत्र पर पड़ेगा।
पाकिस्तान लंबे समय से ‘रणनीतिक गहराई’ की नीति के तहत अफगानिस्तान में प्रभाव बनाए रखने की कोशिश करता रहा है। लेकिन तालिबान की सत्ता वापसी के बाद भी टीटीपी की गतिविधियों में कमी नहीं आई। इससे इस्लामाबाद की सुरक्षा रणनीति पर सवाल उठे हैं।
‘गज़ब-लिल-हक’ को कुछ विश्लेषक घरेलू दबावों के जवाब के रूप में भी देखते हैं। आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता और सुरक्षा चुनौतियों के बीच एक सख्त सैन्य कार्रवाई सरकार को आंतरिक समर्थन जुटाने में मदद कर सकती है। हालांकि, इसका जोखिम भी उतना ही बड़ा है—दो मोर्चों पर अस्थिरता और अंतरराष्ट्रीय दबाव।
याद रहे अफगान-पाक सीमा पर बढ़ता संघर्ष केवल द्विपक्षीय मसला नहीं है। चीन, जिसकी बेल्ट एंड रोड परियोजनाएं पाकिस्तान में चल रही हैं, स्थिरता चाहता है। वहीं भारत, जो अफगानिस्तान में विकास परियोजनाओं में निवेश करता रहा है, इस अस्थिरता को चिंताजनक नजर से देखेगा।यदि संघर्ष व्यापक युद्ध में बदलता है, तो यह दक्षिण एशिया और मध्य एशिया की सुरक्षा संरचना को हिला सकता है।
नाम चाहे जितना भी नैतिकता का संकेत दे, जमीनी हकीकत यह है कि सैन्य कार्रवाई से तनाव कम नहीं, बढ़ा है। ‘गज़ब-लिल-हक’ एक संदेश जरूर है—कि पाकिस्तान अब सीमित प्रतिक्रियाओं से आगे बढ़ चुका है। लेकिन यह भी सच है कि सैन्य समाधान अक्सर अस्थायी राहत देते हैं, स्थायी शांति नहीं।
सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या यह अभियान सीमित उद्देश्य तक सिमटेगा या क्षेत्रीय युद्ध का रूप ले लेगा? फिलहाल, दोनों देशों के बयान सख्त हैं, कूटनीतिक संवाद कमजोर है और सीमा पर बंदूकें गरम।






