अखिलेश अखिल
सबसे पहले ईरान पर इजरायल और अमेरिका के संयुक्त हमले के बाद मध्यपूर्व और दक्षिण एशिया की भू राजनीति में कोहराम मचा हुआ है। इस हमले में अब बहस इस बात को लेकर शुरू हो गई है कि जब अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु मसले पर बातचीत चल रही थी और शांति के प्रयास किये जा रहे थे तब अचानक ईरान पर हमले क्यों किये गए। यह बहस अब चलती रहेगी। लेकिन हालिया हमले के बाद जो जानकारी अभी तक सामने आयी हैं वह रुला देने वाली है। इजरायली हमले में ईरान के 40 से ज्यादा स्कूली लड़कियों की जान चली गई है और कई दर्जन लड़कियों की हालत गंभीर बनी हुई है। ईरान के चारो तरफ आग ही आग है और कुल मिलकर ईरान को बड़ा नुक्सान हुआ है। उधर ईरान भी अमेरिकी सैन्य अड्डों समेत कई अमेरिकी केन्द्रो पर हमलावर है। ईरान इजरायल पर भी मिसाइल से लगातार हमला कर रहा है। लेकिन बड़ी बात यह है कि अमेरिका और इस्राइल के साथ जारी सैन्य टकराव के बीच ईरान की निर्वासित विपक्षी संस्था नेशनल काउंसिल ऑफ रेजिस्टेंस ऑफ ईरा यानी एनसीआरआई द्वारा “अस्थायी सरकार” के गठन का ऐलान महज प्रतीकात्मक राजनीतिक बयान नहीं है—यह एक बड़ा भू-राजनीतिक दांव भी है। मरियम राजवी के नेतृत्व में गठबंधन ने दावा किया है कि उसका उद्देश्य मौजूदा धर्मतांत्रिक शासन के पतन के बाद सत्ता को जनता के हाथों में सौंपना और छह महीने के भीतर स्वतंत्र चुनाव कराना है। लेकिन सवाल है—क्या यह यथार्थवादी संभावना है या युद्धकालीन अवसरवाद?
एनसीआरआई : इतिहास और विवाद
इसकी की जड़ें 1980 के दशक में पड़ीं, जब इस्लामिक क्रांति के बाद नई सत्ता व्यवस्था से असंतुष्ट समूहों ने विदेश में संगठित विरोध शुरू किया। इसका प्रमुख घटक संगठन मोजाहिदीन-ए-ख़ल्क़ रहा है, जिसे कभी ईरान में सशस्त्र संघर्ष के लिए जाना जाता था।1990 और 2000 के दशक में अमेरिका और यूरोप ने MEK को आतंकवादी सूची में रखा था।बाद में कानूनी और कूटनीतिक प्रक्रियाओं के बाद इसे इन सूचियों से हटाया गया।यही इतिहास एनसीआरआई की स्वीकार्यता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। ईरान के भीतर इसकी वास्तविक लोकप्रियता कितनी है—इस पर स्वतंत्र आकलन मुश्किल है, क्योंकि देश में विपक्षी गतिविधियों पर कड़ा नियंत्रण है।
युद्ध का समय: अवसर या रणनीति?
हालिया युद्ध ने ईरान के भीतर आर्थिक और सामाजिक दबाव बढ़ाया है।पश्चिमी प्रतिबंध पहले से अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रहे थे।अब सैन्य हमलों और जवाबी कार्रवाइयों ने असुरक्षा और असंतोष की नई परत जोड़ दी है।ऐसे समय एनसीआरआई का “प्रोविजनल गवर्नमेंट” एलान अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह संकेत देने का प्रयास भी हो सकता है कि यदि मौजूदा शासन कमजोर पड़ता है तो एक “संगठित विकल्प” मौजूद है।राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि युद्ध की परिस्थितियों में सत्ता परिवर्तन की संभावनाएं बढ़ती हैं, लेकिन यह भी सच है कि बाहरी हमले अक्सर राष्ट्रवाद को मजबूत करते हैं, जिससे मौजूदा सत्ता को अस्थायी समर्थन मिल सकता है।

राजवी की 10-सूत्री योजना
मरियम राजवी की 10-सूत्रीय योजना में लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, लैंगिक समानता, मृत्युदंड की समाप्ति और परमाणु-मुक्त ईरान जैसे बिंदु शामिल हैं। यह दस्तावेज़ पश्चिमी लोकतांत्रिक मूल्यों से मेल खाता है।
लेकिन प्रश्न यह है कि क्या ईरान की बहुस्तरीय सामाजिक संरचना—जिसमें रूढ़िवादी धार्मिक तबका, रिवोल्यूशनरी गार्ड और क्षेत्रीय शक्ति नेटवर्क शामिल हैं—इतनी आसानी से इस बदलाव को स्वीकार करेगी?क्या सेना या सुरक्षा प्रतिष्ठान का कोई धड़ा विपक्ष के साथ जाएगा?इन सवालों के जवाब अस्पष्ट हैं।
पश्चिमी देशों से रिश्ते एनसीआरआई ने वर्षों से अमेरिका और यूरोपीय संसदों में लॉबिंग की है।कई पूर्व अमेरिकी और यूरोपीय अधिकारी इसके सम्मेलनों में शामिल होते रहे हैं।ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी कुछ शुरुआती सूचनाएं भी मेक नेटवर्क के माध्यम से सामने आई थीं।हालांकि आलोचक इसे “विदेशी समर्थन पर निर्भर आंदोलन” बताते हैं। ईरानी शासन लगातार एनसीआरआई को “पश्चिमी एजेंडा” का हिस्सा कहता रहा है।
हालिया युद्ध के संदर्भ में यह पहल अमेरिका और इस्राइल के लिए कूटनीतिक रूप से उपयोगी हो सकती है—क्योंकि यह “रेजीम चेंज” के सीधे सैन्य हस्तक्षेप के बजाय एक स्थानीय राजनीतिक विकल्प की बात करती है।
सबसे बड़ा सवाल
ईरान में पिछले कुछ वर्षों में हिजाब कानून, आर्थिक संकट और राजनीतिक दमन के खिलाफ बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए हैं।युवाओं और महिलाओं में असंतोष स्पष्ट है।लेकिन इन आंदोलनों का नेतृत्व बिखरा हुआ रहा है।NCRI क्या इन असंतुष्ट समूहों को एक साझा मंच दे सकता है? या यह केवल प्रवासी ईरानी समुदाय तक सीमित रहेगा?विश्लेषकों का मानना है कि यदि सत्ता परिवर्तन की वास्तविक संभावना बनती है तो देश के भीतर से उभरने वाला नेतृत्व अधिक निर्णायक होगा।

क्षेत्रीय और वैश्विक असर
यदि NCRI जैसी किसी व्यवस्था के माध्यम से सत्ता परिवर्तन होता है, तो इसके व्यापक प्रभाव होंगे। जैसे परमाणु कार्यक्रम पर विराम – पश्चिम के साथ नए समझौते की संभावना।मध्य-पूर्व की शक्ति-संतुलन में बदलाव – हिज़्बुल्लाह, हमास और अन्य समूहों को समर्थन पर असर।तेल बाजार में स्थिरता या अस्थिरता – संक्रमण की प्रकृति पर निर्भर।लेकिन यदि यह घोषणा केवल प्रतीकात्मक रहती है, तो यह ईरान के भीतर और अधिक दमन और बाहरी टकराव को जन्म दे सकती है।
प्रतीकात्मक घोषणा या वास्तविक विकल्प?
युद्धकाल में राजनीतिक घोषणाएं अक्सर इतिहास की दिशा बदल देती हैं—लेकिन उतनी ही बार वे इतिहास के फुटनोट बनकर रह जाती हैं। NCRI का यह कदम दोनों संभावनाओं के बीच झूलता दिखता है।यह स्पष्ट है कि ईरान में असंतोष मौजूद है और बाहरी दबाव बढ़ रहा है। परंतु सत्ता परिवर्तन केवल बाहरी युद्ध से नहीं, बल्कि आंतरिक राजनीतिक सहमति और संस्थागत बदलाव से संभव होता है।
फिलहाल, मरियम राजवी की “प्रोविजनल गवर्नमेंट” एक राजनीतिक संदेश है—ईरान की जनता के लिए भी और अंतरराष्ट्रीय शक्तियों के लिए भी। आने वाले सप्ताह तय करेंगे कि यह संदेश जमीन पर आंदोलन बनता है या वैश्विक कूटनीति की शतरंज में एक और चाल साबित होता है।






