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90 लाख से अधिक मतदाताओं का नाम कटने का मामला, लोकतंत्र की सात मिनट की ‘अदालत’ अपमान और ‘गेट आउट’ के शोर के साथ समाप्त 

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चौथा अक्षर संवाददाता/ नई दिल्ली

​कल 9 अप्रैल को  जहाँ पश्चिम बंगाल में मतदान हो रहा होगा वहीं दूसरी तरफ़ पश्चिम बंगाल चुनाव 2026 के इतिहास में बुधवार का दिन एक काले अध्याय के रूप में दर्ज होगा। चुनाव आयोग पर SIR के नाम पर जहाँ  90.66 लाख मतदाताओं के नाम काटे जाने का गंभीर आरोप है, वहीं दूसरी ओर देश की सबसे बड़ी संवैधानिक संस्था—निर्वाचन आयोग—पर ‘पक्षपात’ और ‘अशिष्टता’ के जो आरोप लगे हैं, वे चौंकाने वाले हैं। लाखों मतदाताओं के नाम काटे जाने की शिकायत को लेकर ​तृणमूल कांग्रेस का प्रतिनिधिमंडल जब मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार से मिलने पहुँचा, तो उम्मीद थी कि इतने बड़े पैमाने पर हुए नामों के काटे जाने पर  (SIR) पर कोई ठोस चर्चा होगी। लेकिन सात मिनट के भीतर ही यह मीटिंग अपमान और आरोपों के साथ समाप्त हो गई।

​टीएमसी का आरोप:

सांसद डेरेक ओ’ब्रायन का कहना है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने उनकी बात सुनने के बजाय उन्हें “गेट लॉस्ट” (Get Lost) कहकर अपमानित किया।​जबकि आयोग का पक्ष के सूत्रों के अनुसार, मीटिंग का माहौल तब बिगड़ा जब टीएमसी सांसदों ने तीखे सवाल किए। लेकिन सवाल यह है कि क्या एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति का आचरण इतना ‘असहिष्णु’ होना चाहिए कि वह देश की दूसरी बड़ी पार्टी के प्रतिनिधियों को बाहर का रास्ता दिखा दे?

​ 90.66 लाख वोटर: एक अदृश्य बेदखली?

​विशेष गहन समीक्षा (SIR) के नाम पर पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची से 90 लाख से अधिक नामों का हटाया जाना अविश्वसनीय और भयावह है। यह संख्या किसी छोटे देश की कुल आबादी के बराबर है। ​यदि इसमें से एक छोटा हिस्सा भी त्रुटिवश हटाया गया है, तो यह ‘सामूहिक मताधिकार का अपहरण’ है। क्या चुनाव आयोग के पास इस बात का डेटा है कि ये कौन लोग हैं? क्या उन्हें अपनी नागरिकता साबित करने का पर्याप्त मौका दिया गया? या यह केवल एक ‘डिजिटल सफाई’ है जिसका उद्देश्य चुनावी नतीजों को प्रभावित करना है?

‘ट्वीट’ बनाम ‘हकीकत’: आयोग की कसम और ज़मीनी डर

मीटिंग के तुरंत बाद निर्वाचन आयोग ने ट्वीट किया कि चुनाव “भयमुक्त, हिंसा मुक्त और बूथ जामिंग रहित” होंगे। विरोधाभास: जब 90 लाख मतदाता अपनी पहचान खो चुके हों, तो चुनाव “भयमुक्त” कैसे हो सकते हैं? असली “बूथ जामिंग” तो वह है जहाँ मतदाता को पोलिंग स्टेशन तक पहुँचने से पहले ही कागज़ों पर ‘डिलीट’ कर दिया जाए।​”छापा मुक्त” चुनाव का दावा तब खोखला लगता है जब आयोग पर स्वयं एक पार्टी विशेष (भाजपा) के पक्ष में काम करने के आरोप लग रहे हों।

संवैधानिक संस्थाओं का पतन

​ज्ञानेश कुमार का कार्यकाल जिस तरह के विवादों से घिरा है, वह टीएन शेषन जैसे आयुक्तों के दौर की याद दिलाता है—लेकिन विपरीत कारणों से। जब अंपायर ही खिलाड़ियों को “गेट आउट” कहने लगे, तो खेल की निष्पक्षता समाप्त हो जाती है। चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर उठते ये सवाल अंततः भारत के ‘लोकतंत्र की जननी’ होने के गौरव को वैश्विक स्तर पर धूमिल कर रहे हैं।

नागरिकता की आखिरी जंग

​यह केवल ममता बनर्जी बनाम भाजपा की लड़ाई नहीं है। यह हर उस बंगाली और भारतीय नागरिक की लड़ाई है जिसका नाम एक क्लिक से गायब कर दिया गया। अगर 90 लाख वोटर्स की शिकायतों को सुनने के लिए आयोग के पास केवल ‘सात मिनट’ का समय है, तो समझ लेना चाहिए कि ‘लोकतंत्र’ अब केवल एक औपचारिकता बनकर रह गया है। असली क्रांति तब होगी जब जनता यह पूछेगी किक्या हमारा वोट सुरक्षित है, या वह भी किसी ‘SIR’ की भेंट चढ़ने वाला है?

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