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तुमने कलम बेच दी शायद तुम्हारी मजबूरियाँ रही होंगी

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      राजेंद्र सिंह जादौन
तुमने कलम बेच दी
शायद तुम्हारी मजबूरियाँ रही होंगी,
घर की किस्तें, बच्चों की फीस,
या सत्ता के दरबार में
अपनी कुर्सी बचाने की बेबसी रही होगी।
तुमने नेताओं के चरण चूम लिए,
हो सकता है तुम्हें
सुरक्षित भविष्य चाहिए था,
सरकारी विज्ञापनों की छाँव
और बड़े लोगों की महफ़िलों में
अपना नाम चाहिए था।
तुम्हें ऐशो-आराम चाहिए था,
बड़ी गाड़ी, चमकता दफ्तर,
टीवी की बहसों में पहचान,
और हर शाम सत्ता के गलियारों में
अपनी मौजूदगी का अहसास।
मान लिया,
ये सब तुम्हारी मजबूरियाँ रही होंगी।
लेकिन एक सवाल
अब भी ज़िंदा है
तुम पत्रकार थे,
फिर पत्रकारिता से गद्दारी क्यों…?
अगर सच लिखने का साहस
तुम्हारे भीतर मर चुका था,
तो कम से कम
उस सच को दफन तो मत करते।
तुम राज़ नहीं खोल सकते थे,
कोई बात नहीं,
पर वह फाइल, वह सबूत,
वह कहानी किसी ऐसे हाथ में दे देते
जिस पर तुम्हें भरोसा था।
कोई तो होता
जो बिकने से बचा रहता,
कोई तो होता
जो कलम को हथियार मानता,
दलाली का ठेका नहीं।
आज अख़बारों में
स्याही कम, समझौते ज्यादा दिखते हैं,
टीवी स्क्रीन पर
सवाल कम, प्रायोजित चीखें ज्यादा सुनाई देती हैं।
और इस शोर में
मर रही है पत्रकारिता,
धीरे-धीरे,
हर उस कलम के साथ
जो सत्ता के चरणों में गिरवी रख दी गई।
याद रखना,
पत्रकार की मौत
उस दिन नहीं होती
जब उसका शरीर मिट्टी में मिलता है,
उसकी मौत तो उस दिन हो जाती है
जब वह सच देखकर भी
चुप रहना सीख जाता है।
रचना – राजेंद्र सिंह जादौन
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