कुमार अखिल
भारत की राजनीति में दल-बदल कोई नई घटना नहीं है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में जिस पैमाने और रणनीतिक तरीके से विपक्षी दलों के सांसदों, विधायकों और नेताओं को तोड़ा जा रहा है, उसने लोकतंत्र की प्रकृति और भविष्य को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। महाराष्ट्र में शिवसेना, एनसीपी और अब पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के भीतर दिखाई पड़ रही टूट-फूट को केवल राजनीतिक घटनाक्रम मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसके पीछे एक व्यापक राजनीतिक परियोजना दिखाई देती है, जिसका लक्ष्य केवल सरकार चलाना नहीं बल्कि सत्ता संरचना को इस तरह बदलना है कि राष्ट्रीय राजनीति में भाजपा का वर्चस्व लंबे समय तक कायम रहे।
2024 के लोकसभा चुनावों ने भाजपा को एक स्पष्ट संदेश दिया था। पार्टी सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी, लेकिन अपने दम पर बहुमत हासिल नहीं कर सकी। उसे जेडीयू और टीडीपी जैसे सहयोगियों के सहारे सरकार बनानी पड़ी। यह परिणाम नरेंद्र मोदी और अमित शाह की उस राजनीतिक शैली के लिए झटका था, जो पूर्ण बहुमत और केंद्रीय नियंत्रण पर आधारित रही है। ऐसे में स्वाभाविक है कि भाजपा केवल सरकार चलाने से संतुष्ट न रहे, बल्कि संसद के दोनों सदनों में अपनी संख्या बढ़ाने की कोशिश करे।
यहीं से विपक्षी सांसदों को अपने पक्ष में लाने का अभियान महत्वपूर्ण हो जाता है। भाजपा के सामने सबसे बड़ा लक्ष्य केवल चुनाव जीतना नहीं, बल्कि संसद में ऐसा बहुमत जुटाना है जिससे संवैधानिक और संरचनात्मक बदलावों का रास्ता आसान हो सके। “वन नेशन वन इलेक्शन”, परिसीमन, चुनावी सुधार और प्रशासनिक ढांचे में बदलाव जैसे मुद्दों के लिए संसद में विशेष बहुमत की जरूरत होती है। यदि भाजपा भविष्य में ऐसे कदम उठाना चाहती है तो उसे केवल गठबंधन सरकार के भरोसे नहीं रहना होगा।

विपक्ष आरोप लगा रहा है कि यह अभियान लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। उनका कहना है कि जनता ने जिन सांसदों को किसी विशेष विचारधारा और पार्टी के आधार पर चुना था, उनका सत्ता पक्ष में चले जाना मतदाता के विश्वास के साथ धोखा है। सवाल यह भी उठ रहा है कि अगर किसी राज्य में जनता ने भाजपा के खिलाफ मतदान किया और बाद में उसी राज्य के चुने हुए प्रतिनिधि भाजपा के साथ खड़े हो जाएं, तो क्या यह जनादेश का सम्मान है?
हालांकि भाजपा का तर्क अलग है। पार्टी कहती है कि यदि कोई सांसद या नेता अपनी पार्टी के नेतृत्व से असंतुष्ट है और राष्ट्रीय विकास के एजेंडे के साथ जुड़ना चाहता है तो उसमें कुछ भी गलत नहीं है। भाजपा इसे राजनीतिक विस्तार और वैचारिक स्वीकार्यता के रूप में प्रस्तुत करती है। लेकिन आलोचक पूछते हैं कि यदि यह केवल वैचारिक सहमति है तो अधिकांश दल-बदल उन नेताओं का ही क्यों होता है जिन पर किसी न किसी जांच एजेंसी की कार्रवाई चल रही होती है या जिनके राजनीतिक भविष्य पर संकट मंडरा रहा होता है?
यहीं से सीबीआई, ईडी और आयकर विभाग की भूमिका को लेकर विवाद पैदा होता है। विपक्ष का आरोप है कि इन एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक दबाव के औजार के रूप में किया जा रहा है। भाजपा इन आरोपों को खारिज करती है और कहती है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई को राजनीतिक रंग दिया जा रहा है। लेकिन जब कई मामलों में जांच के दायरे में रहे नेता भाजपा में शामिल होने के बाद अपेक्षाकृत राहत पाते दिखाई देते हैं, तो संदेह और गहरा जाता है।

क्या यह लोकतंत्र का गला घोंटने का प्रयास है? इस सवाल का जवाब इतना सरल नहीं है। भारत में चुनाव अब भी हो रहे हैं, विपक्ष मौजूद है, अदालतें काम कर रही हैं और मीडिया का एक हिस्सा सरकार की आलोचना भी कर रहा है। इसलिए भारत को औपचारिक रूप से लोकतंत्र-विहीन कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा। लेकिन यह भी सच है कि लोकतंत्र केवल चुनाव का नाम नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ एक मजबूत और प्रभावी विपक्ष, सत्ता पर निगरानी और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का संरक्षण भी है। यदि विपक्ष लगातार कमजोर होता जाए और सत्ता पक्ष के सामने कोई गंभीर चुनौती न बचे तो लोकतांत्रिक संतुलन प्रभावित होता है।
नरेंद्र मोदी और अमित शाह का अंतिम मिशन क्या है? राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि उनका लक्ष्य भाजपा को कांग्रेस की तरह एक “सिस्टम पार्टी” बनाना है—ऐसी पार्टी जिसके इर्द-गिर्द पूरी राजनीति घूमे और बाकी दल क्षेत्रीय या सीमित प्रभाव वाली ताकतें बनकर रह जाएं। दूसरे शब्दों में, भाजपा केवल सरकार नहीं बल्कि राजनीतिक व्यवस्था की केंद्रीय धुरी बनना चाहती है।
जहां तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का सवाल है, उसकी दीर्घकालिक सोच हमेशा सांस्कृतिक और राजनीतिक प्रभाव के विस्तार की रही है। संघ प्रत्यक्ष रूप से सत्ता की राजनीति में भाग नहीं लेता, लेकिन वह लंबे समय से ऐसे भारत की कल्पना करता रहा है जहां उसके वैचारिक दृष्टिकोण का प्रभाव राज्य और समाज दोनों पर हो। इसलिए भाजपा के विस्तार को संघ की व्यापक वैचारिक परियोजना से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल जनता का है। क्या जनता यह सब नहीं देख रही? जनता सब देख रही है, लेकिन उसका निर्णय हमेशा नैतिकता के आधार पर नहीं होता। मतदाता अक्सर स्थिरता, नेतृत्व, विकास, पहचान और स्थानीय समीकरणों को भी महत्व देता है। इसलिए दल-बदल की राजनीति पर अंतिम फैसला संसद नहीं बल्कि चुनावी मैदान में होगा।
फिलहाल तस्वीर यही बताती है कि भाजपा केवल अगला चुनाव जीतने की रणनीति नहीं बना रही, बल्कि वह आने वाले दशक की राजनीतिक संरचना को अपने पक्ष में ढालने की कोशिश कर रही है। यह प्रयास कितना सफल होगा, यह विपक्ष की एकजुटता, संस्थाओं की स्वतंत्रता और सबसे बढ़कर जनता की राजनीतिक चेतना पर निर्भर करेगा। भारतीय लोकतंत्र के सामने असली चुनौती यही है कि क्या वह एक–दलीय प्रभुत्व और बहुदलीय प्रतिस्पर्धा के बीच संतुलन बनाए रख पाएगा, या फिर राजनीति का पूरा परिदृश्य एक ही शक्ति केंद्र के इर्द–गिर्द सिमट जाएगा।






