नई दिल्ली। अमेरिका में दवाओं की बढ़ती कीमतों को कम करने की दिशा में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने एक और बड़ा कदम उठाया है। प्रशासन ने 9 और दवा कंपनियों के साथ दवा कीमतों को लेकर समझौते किए हैं। खास बात यह है कि इस सूची में भारत की प्रमुख फार्मा कंपनी सन फार्मास्युटिकल इंडस्ट्रीज भी शामिल है। इन समझौतों के साथ अमेरिका की ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ यानी MFN प्राइसिंग नीति का दायरा और बढ़ गया है।
क्या है मोस्ट फेवर्ड नेशन यानी MFN मॉडल?
MFN का सामान्य अर्थ ऐसी कीमत से है जो दूसरे विकसित देशों में उपलब्ध सबसे कम कीमत के बराबर या उसके आसपास हो। ट्रंप प्रशासन अमेरिकी मरीजों और सरकारी स्वास्थ्य कार्यक्रमों के लिए दवाओं की कीमतों को दूसरे विकसित देशों में मिलने वाली कम कीमतों के अनुरूप लाना चाहता है। नए समझौतों के तहत संबंधित कंपनियां राज्य Medicaid कार्यक्रमों को अपनी दवाओं पर MFN कीमत उपलब्ध कराने पर सहमत हुई हैं। साथ ही भविष्य में आने वाली कुछ नई और इनोवेटिव दवाओं की कीमतों को भी अन्य विकसित देशों में मिलने वाली कम कीमतों के करीब रखने की प्रतिबद्धता जताई गई है।
9 कंपनियों में कौन-कौन शामिल ?
नए समझौते में Sun Pharma, Alcon, Astellas, BeOne Medicines, BridgeBio, CSL, Kyowa Kirin, Teva और UCB शामिल हैं। इन कंपनियों के साथ हुए करार के बाद MFN समझौते करने वाली फार्मा कंपनियों की कुल संख्या 26 हो गई है। व्हाइट हाउस के मुताबिक ये कंपनियां अमेरिका के ब्रांडेड दवा बाजार के करीब 89 प्रतिशत हिस्से को कवर करती हैं।
सन फार्मा के लिए क्यों अहम है यह समझौता?
भारतीय कंपनी सन फार्मा के लिए यह समझौता अमेरिका में कारोबार के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कंपनी अमेरिकी Medicaid कार्यक्रमों के लिए MFN कीमतों पर दवाएं उपलब्ध कराने की दिशा में आगे बढ़ेगी। इसके बदले कंपनी को अमेरिकी फार्मा टैरिफ से राहत भी मिलेगी। रिपोर्टों के मुताबिक सन फार्मा को अमेरिकी Section 232 के तहत लगने वाले संभावित फार्मास्युटिकल टैरिफ से दो साल से अधिक अवधि तक राहत मिल सकती है। यह राहत कंपनी के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका उसके प्रमुख अंतरराष्ट्रीय बाजारों में से एक है।
कंपनियों पर क्या पड़ेगा असर?
इस समझौते का सीधा असर दवा कंपनियों की कीमत तय करने की रणनीति पर पड़ सकता है। अमेरिकी सरकार जहां कम कीमतों के जरिए मरीजों और Medicaid पर वित्तीय दबाव घटाना चाहती है, वहीं कंपनियों को कम कीमतों के बदले टैरिफ राहत, अमेरिकी निवेश और बाजार तक बेहतर पहुंच जैसे लाभ मिल सकते हैं। नए समझौते में शामिल कंपनियों ने अमेरिका में विनिर्माण और निवेश बढ़ाने की प्रतिबद्धताएं भी जताई हैं। व्हाइट हाउस के अनुसार इन 9 कंपनियों की ओर से निकट अवधि में अमेरिका में कम से कम 19.6 अरब डॉलर के सामूहिक निवेश की प्रतिबद्धता है।
भारत की फार्मा इंडस्ट्री के लिए संकेत ?
सन फार्मा का इस समझौते में शामिल होना भारतीय फार्मा क्षेत्र के लिए भी महत्वपूर्ण संकेत है। अमेरिका भारतीय दवा कंपनियों के लिए बड़ा बाजार है। ऐसे में कीमतों और टैरिफ से जुड़ी अमेरिकी नीतियों में बदलाव का भारतीय कंपनियों की लागत, मार्जिन और भविष्य की निवेश योजनाओं पर असर पड़ सकता है। कुल मिलाकर ट्रंप प्रशासन का यह कदम दवा कीमतों को अंतरराष्ट्रीय स्तर की कम कीमतों से जोड़ने की उसकी नीति को और मजबूत करता है। हालांकि कंपनियों पर कीमत घटाने का कितना वास्तविक वित्तीय प्रभाव पड़ेगा और अमेरिकी मरीजों को कितनी बचत होगी, इसका आकलन आने वाले समय में ही स्पष्ट होगा।






