श्याम लाल शर्मा/चौथा अक्षर / नई दिल्ली
नेहा बोरा के गोरिल्ला आंदोलन से दिल्ली पुलिस परेशान है। नेहा बोरा ने दिल्ली पुलिस को छका रखा है, कल 10 अक्टूबर को आई एन ए मार्केट दिल्ली हाट को जंतर मंतर बना कर 1 घंटे तक दिल्ली पुलिस को दौड़ती रही तो आज आर के आश्रम को जंतर मंतर बना दिया है – लेकिन यहाँ भी आर के आश्रम का कॉल देकर नेहा बोरा सारे पुलिस फोर्स को चकमा देकर कनॉट प्लेस की बेरिकेड तक पहुंच गईं। वहाँ उन्हें हिरासत में ले लिया गया।
हिरासत में लिए जाने के बाद नेहा ने एक वीडियो जारी करते हुए कहा –दिल्ली पुलिस आंदोलनकारियों को हिरासत में लेकर उनको, जाति सूचक, माँ बहन की गालियाँ क्यों दे रही है। जिस बस में हम सबको हिरासत में लिया गया है उस बस में जालियां लगी हैं, शीशे लगे हैं,बैठने की जगह नहीं है , घुटन सी हो रही है नए युवा महिला आंदोलन कारियों को उसके अंदर प्राइवेट पार्ट पर मारा जा रहा है , क्या दिल्ली पुलिस ने पहले से ही इसे जेल बना रकह है। ज्ञानेश कुमार को बचाने के लिए वर्दी पहनकर इतनी दलाली करनी पड़ रही है। जिनका काम जनता की हिफाजत करने में होना चाइए वे वोट चोर ज्ञानेश कुमार की हिफ़ाज़त में लगे हैं।
नेहा बोरा एक बार फिर पुलिस को छकाने में सफल रही हैं।दिल्ली पुलिस भी उनके हौसले के सामने बेबस नज़र आ रही है। ऐसा जज्बा, ऐसा जोश और ऐसी जीवटता! न रोना-धोना, न बहानेबाजी। हर बार उसी ताकत और जुनून के साथ पुलिस की लाठियों, डंडों और बैरिकेड्स का सामना करती है नेहा।
जब भी हौसले, हिम्मत और नेतृत्व की बात होगी, इतिहास में नेहा का नाम सबसे बुलंद अक्षरों में दर्ज किया जाएगा,जब चारों तरफ अनिश्चितता का माहौल था और लोग पूछ रहे थे कि संघर्ष की कमान किसके हाथ में है, तब नेहा एक ढाल बनकर, एक शेरनी की तरह अग्रिम पंक्ति में आकर खड़ी हो गईं। इन तस्वीरों में दिख रही उनकी यह बुलंद आवाज़ और चेहरे का यह अदम्य तेज गवाह है कि वह किसी भी विपरीत परिस्थिति के आगे झुकना नहीं जानतीं,नेहा सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि इस आंदोलन का वो अटूट भरोसा और ताकत हैं, जो हर मुश्किल मोड़ पर पूरे कारवां में नई ऊर्जा फूंक देती हैं।
जब ज़िम्मेदारियाँ सबसे बड़ी थीं, तब उन्होंने आगे बढ़कर मोर्चा संभाला और यह साबित कर दिया कि एक सच्चा मार्गदर्शक कभी पीछे नहीं हटता,जनता के अधिकारों के लिए उनका यह निडर समर्पण हर किसी के लिए एक महान प्रेरणा है!
जब चारों तरफ़ अनिश्चितता का माहौल था, जब लोग यह सवाल कर रहे थे कि इस संघर्ष की क़यादत कौन करेगा और मुश्किल हालात में आगे बढ़कर मोर्चा कौन संभालेगा, तब नेहा बोरा एक मज़बूत ढाल बनकर, शेरनी की तरह मैदान-ए-जंग में नहीं, बल्कि हक़ और इंसाफ़ की लड़ाई के अग्रिम मोर्चे पर डटकर खड़ी हो गईं।
इन तस्वीरों में उनकी बुलंद आवाज़, चेहरे का अज़्म और आँखों में नज़र आने वाला हौसला इस बात की गवाही देता है कि जिसके इरादे मज़बूत हों, उसे हालात की सख़्ती और मुश्किलों की आँधियाँ कभी झुका नहीं सकतीं।
नेहा महज़ एक नाम नहीं, बल्कि इस तहरीक का हौसला, इसकी ताक़त और इसका अटूट एतमाद हैं। जब रास्ते मुश्किल हों, जब दबाव बढ़ जाए और जब क़दम पीछे खींचने की कोशिशें की जाएँ, तब असल रहनुमा वही होता है जो अपने क़दम जमाए रखे और पूरे कारवाँ में नई रूह, नया जोश और नया हौसला पैदा करे। जब ज़िम्मेदारियाँ बड़ी थीं, तब उन्होंने क़दम आगे बढ़ाए; जब इम्तिहान सख़्त था, तब उन्होंने मैदान नहीं छोड़ा; और जब आवाज़ बुलंद करने की ज़रूरत थी, तब उन्होंने ख़ामोशी के बजाय मज़बूती से अपनी आवाज़ बुलंद की।
यही जुर्रत, यही बेबाकी और यही जज़्बा किसी भी सच्चे रहनुमा की पहचान होता है। अवाम के हुक़ूक़, इंसाफ़ और अपने उसूलों के लिए उनकी यह जद्दोजहद यक़ीनन नौजवानों के लिए एक मिसाल है।







