श्याम लाल शर्मा/नई दिल्ली
आज नरेंद्र मोदी और अमित शाह की अघोषित आपात काल की तानाशाही सरकार ने घोषित आपातकाल की घटनाओं को काफ़ी पीछे छोड़ दिया। आज जिस तरह जंतर -मंतर पर वोट चोरी के आरोपों से घिरे ज्ञानेश कुमार के त्यागपत्र को लेकर हो रहे आंदोलन को कवर कर रहे पत्रकारों और स्वतंत्र पत्रकारों, यूट्यूबरों को पुलिस ने घसीट – घसीट कर बसों में ठूंसा वह बर्बरता की सारी हदें पार कर गया।पुलिस ने यह काम अपने आप नहीं किया उन्हें बाकायदा ऐसा करने को कहा गया क्योंकि अगर पत्रकारों के मन में दहशत भर दी गई तो आंदोलन की कोई खबर बाहर नहीं आएगी।
आज पूरे दिन एक तरफ़ जहाँ जंतर – मंतर और उसके आसपास से आंदोलनकारियों को घसीट घसीट बसों में ठूँस कर उनको हिरासत में लिया जाता रहा वहीं दूसरी तरफ़ पत्रकारों, स्वतंत्र पत्रकारों, महिला पत्रकारों, यूट्यूबरों को जो आंदोलनकारियों की ख़बर को कवर करते दिखे, पुलिस से सवाल करते दिखे उनको घसीट-घसीट कर बसों में ठूँस दिया गया।वे चिल्लाते रहे कि वे पत्रकार हैं, अपना प्रेस का आई कार्ड दिखाते रहे लेकिन पुलिस को ना सुनना था ना सुना।लखनऊ से आयीं उल्टा चश्मा की पत्रकार प्रज्ञा मिश्रा को टांग लिया वे चिल्लाती रहीं मैं पत्रकार हूँ मुझे छोड़ दो मैं चल सकती हूँ लेकिन महिला पुलिस ने एक भी ना सुनी और उनको ले जाकर बस में ठूँस दिया उनका कसूर बस इतना था कि वे पुलिस से सवाल कर रही थीं कि जो लोग आंदोलनकारियों के साथ मारपीट कर रहे हैं उनको कुछ नहीं कहा जा रहा है और मार खाने वालों को हिरासत में लिया जा रहा है।बस उनका यही सवाल एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को नागवार गुजरा और उसने इशारा किया और प्रज्ञा मिश्रा को उठा लिया गया।
रेड माइक के सौरभ शुक्ला ने एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से जब सवाल किया कि यह क्या हो रहा है तो वे बिना जवाब दिए अपनी गाड़ी से आगे बढ़ गए। उनका कहना था कि उनके सामने आर के आश्रम में आंदोलन को कवर कर रही महिला पत्रकार उसके साथ दूसरी महिला पत्रकार थी जिसे हिरासत में ले लिया गया । एक पत्रकार को 6 पुलिस वाले घसीट रहे हैं और वह महिला पत्रकार भी कितनी जीवट वाली थी उसने अपना माइक नहीं छोड़ा। जब बस की खिड़की से बात करने लगी तो उसका बाल पकड़कर खींचकर अंदर किया गया। जब वहां मौजूद आई.पी.एस. अंगद मिश्रा से सवाल किया तो वे बिना जवाब दिए आगे चले गए।उसके बाद वहाँ मौजूद तमाम पत्रकारों को घसीट कर, टांग कर बसों में ठूँस दिया गया।दिल्ली पुलिस पत्रकारों पर टूट पड़ी है।आज अब तक आधा दर्जन से ज्यादा पत्रकारों को हिरासत में ले लिया गया है।
बी.बी.सी. के राघवेन्द्र राव, दिलनवाज पाशा और सेराज अली जैसे पत्रकारों को भी समय-समय पर परेशान किया गया! पता नहीं वह किस स्तर का पुलिस अफसर था, बार-बार वह इन पत्रकारों को घटनास्थल से बहुत दूर जाकर खड़ा होने का निर्देश देता रहा! राघवेंद्र राव के साहसिक प्रतिरोध के बाद वह चुप हुआ! पत्रकार-उत्पीडन की ऐसी अनेक घटनाएं आज हुईं पर अपने को मीडिया बताने वाले टीवीपुरम या गोदी मीडिया के अन्य संस्थानों के लिए इनमें कोई खबर नहीं थी! इसी तरह वरिष्ठ पत्रकार समिता शर्मा और सौरभ शुक्ला के साथ भी पुलिस वाले तीखी नोक-झोंक करते देखे गए! पुलिस वालों को पत्रकारों के परिचय पत्रों से तसल्ली नहीं हो रही थी. वे इनका फोटो भी लेना चाहते थे!
इन कुछ प्रमुख पत्रकारों के अलावा बहुत सारे नये या अपेक्षाकृत युवा रिपोर्टरों के साथ पुलिस ने बहुत अशोभनीय बर्ताव किया. हिरासत में लिए जाने वाले पत्रकारों की संख्या निश्चय ही अधिक रही. पत्रकारों के साथ ऐसा अशोभनीय बर्ताव क्या पुलिस या किसी थाने के स्तर से तय हुआ होगा या इसका निर्देश ‘ऊपर’ से आया होगा! इसका एक ही कारण दिखता है कि ऊपर के लोग नहीं चाहते कि इस आंदोलन की खबरें प्रमुखता से छपें या प्रसारित हों!
श्याम मीरा सिंह को भी हिरासत में ले लिया गया है। आज लोकतंत्र का काला दिन है। लानत है दिल्ली पुलिस को, जिसके सामने भाजपा के गुंडे पत्रकार को धमका रहे हैं, गाली दे रहे हैं।
पहले पत्रकार श्याम मीरा सिंह को आर.एस.एस. के गुंडों ने घेरा, बदसलूकी की। फिर उन्हीं गुंडों ने दिल्ली पुलिस को इशारा किया कि पत्रकार को हिरासत में लो और दिल्ली पुलिस ने क्या किया? गुंडों पर कार्रवाई करने के बजाय पत्रकार को ही हिरासत में ले लिया! दिल्ली पुलिस आखिर किसके आदेश पर चल रही है? अमित शाह के ? या अमित शाह ने अब इन गुंडों को दिल्ली पुलिस का नया बॉस बना दिया है? पत्रकार सवाल पूछेगा तो गुंडे घेरेंगे और पुलिस उसे उठा ले जाएगी?
उल्लेखनीय है कि जस्टिस सूर्यकान्त ने कहा कि–पत्रकारों को कवरेज से नही रोका जाएगा तो अमित शाह की दिल्ली पुलिस ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकान्त के उस आदेश की धज्जियाँ उड़ाते हुए पत्रकारों को टांग कर घसीट घसीट कर बसों में ठूँस कर हिरासत में ले लिया। सरकार को सुप्रीमकोर्ट का डर खत्म हो चुका है, इसके जिम्मेदार वो जज है, जिन्होंने अपना जमीर बेच दिया, जिसका नतीजा है कि न्यायिक ऑर्डर को सरकारी अधिकारी अपने बूट से मसल दे रहे है।
जंतर मंतर पर भाजपा के लोग गाड़ियों में लाठी डंडे लेकर घूम रहे थे जब न्यूज लांड्री के पत्रकार ने यस बात वहां मौजूद पुलिस को बताई तो पुलिस उस गाड़ी की जाँच करने के बजाय उसे जाने का रास्ता दे दिया।






